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Saturday, January 29, 2011

बुद्धि बढ़ाने कि कुछ आयुर्वेदिक औषधियाँ

1) जड़-पत्तों सहित ब्राह्मी को उखाडकर एवं जल से धोकर ओखली में कुटे और कपडे में छाल ले. तत्पश्चात उसके एक तोले रस में छह माशे गौ घृत डालकर पकावे और हल्दी, आँवला, कूट, निसोत, हरड, चार-चार तोले, पीपल, वायविडंग, सेंधा नमक, मिश्री और बच एक-एक तोले इन सबकी चटनी उसमे डालकर मंद आग पर पकावे. जब पानी सुख जाए और घृत शेष रहे, तो उसे छानकर, लेवे और प्रतिदिन प्रातः काल एक तोला घृत चाटे. इसके सेवन से वाणी शुद्ध होती है. सात दिन तक सेवन करने से अनेक शास्त्रों को धारण कराता है. १८ प्रकार के कोढ़, ६ प्रकार के बवासीर, २ प्रकार के गुल्मी, २० प्रकार के प्रमेह और खाँसी दूर होती है. बंध्या स्त्री और अल्प वीर्य वाले मनुष्टों के लिए यह सारस्वत घृत वर्ण, वायु और बल को बढाता है. –चक्रदत्त.

२) बच का एक माशा चूर्ण जल, दूध या घृत के साथ एक मास सेवन करने से मनुष्य पंडित और बुद्धिमान बन जाता है. –वृहन्नीघण्टु

३) बेल कि जड़ का छाल और शतावरी का क्वाथ प्रतिदिन दूध के साथ स्नान और हवन के पश्चात पीजिए. इससे आयु और बुद्धि कि वृद्धि होती है. –सुश्रुत

४) गिलोय, ओंगा, वायविडंग, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, बच, सोंठ और शतावर इन सबको बराबर लेकर कूट-छानकर चूर्ण बनावे और प्रातःकाल चार माशे मिश्री के साथ चाटे, तो तीन हजार श्लोक कंठस्थ करने कि शक्ति हो जाती है.

Monday, January 24, 2011

फेस पैक व स्क्रब


कोई भी महंगा रेडीमेड फेस पैक लगाने के बजाय घर में कुछ अनोखे और खास फेस पैक व स्क्रब तैयार कीजिए। विवाह से 1 महीने पहले इनका प्रयोग करना शुरू करें, तो चेहरे को कांतिमय बनाने में मदद मिलेगी।
नायाब पैक व स्क्रब की रेसिपीज:-
1. तैलीय त्वचा के लिए पैक सामग्री : 2 बडे चम्मच मुलतानी मिट्टी,1 बडा चम्मच पोदीना पाउडर और 1/2 बडा चम्मच मेथीदाना पाउडर।
विघि : सारी सामग्री को गुलाबजल या ताजे गुलाब क पेस्ट में मिला कर चेहरे पर 10 मिनट तक लगा कर रखें। ठंडे पानी से चेहरा घो लें। यह बढिया एस्ट्रिजेंट का भी काम करता है और तैलीय त्वचा में कसावट लाता है। इस पैक को आप हफ्ते में 3 दिन लगा सकती है।
2. झुर्रीदार त्वचा के लिए पैक सामग्री : 2 बडे चम्मच मुलतानी मिट्टी, 1 बडा चम्मच मसूर दान पाउडर, 1 बडा चम्मच पोदीना पाउडर और 1 बडा चम्मच तुलसी पाउडर।
विघि : सारी सामग्री को मिला कर किसी एअरटाइट डिब्बे में रखें। जब भी इस्तेमाल करना हो, तो ताजे फलों के रस या गुनगुने दुघ के साथ मिला कर चेहरे और गर्दन पर लगाएं। इसे 15 मिनट तक लगा रहने दें और सोदे पानी से चेहरा घो लें। इस पैक को आप हफ्ते में 3 दिन लगा सकती हैं। लगातार 3 दिन के बजाय 1-2 दिन के अंतराल में इस पैक का इस्तेमाल करें।
3. मुंहासेयुक्त त्चचा के लिए पैक सामग्री : 1 बडा चम्मच चंदन पाउडर, 1 बडा चम्मच नीम पाउडर, 1 बडा चम्मच तुलसी पाउडर और 1 बडा चम्मच समुद्री झाग।
विघि : सारी सामग्री को अनार के रस या गुलाबजल के साथ मिला कर पेस्ट बनाएं। इसे चेहरे पर 15 मिनट तक लगाने के बाद ठंडे पानी से घो लें। हफ्ते में 2 बार इस पैक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
4. शुष्क त्चचा के लिए पैक सामग्री : 2 बडे चम्मच मसूर दान पाउडर, 1 बडा चम्मच चिरौंजी पाउडर, 3 बडे चम्मच मिल्क पाउडर और चुटकी भर हल्दी पाउडर।
विघि : सारी सामग्री को थोडे से दुघ में मिला कर पेस्ट बनाएं। इस्रे चेहरे पर 10 मिनट तक लगा कर रखें। ठंडे पानी से घो लें। हफ्ते में इस 1-2 दिन के अंतराल मे 3 बार प्रयोग कर सकती हैं।
5. घुप से झुलसी त्वचा के लिए सामग्री : 2 बडे चम्मच ज्वार का आटा, 1 बडा चम्मच तुलसी पाउडर और 3 बडे चम्मच तरबूज के बीज का पाउडर।
विघि : जब भी जरूरत हो, तो थोडे से दही में सारी सामग्री मिलाएं और चेहरे, गरदन और बांहो पर इस पैक को 20 मिनट तक लगा कर रखें। ठंडे पानी से घो लें। ऎसा दिन में 2 बार करें।
6. आंखों के निचे काले घेरे सामग्री : 2 बडे चम्मच सूखे लाल गुलाब का पाउडर, 1 बडा चम्मच खीरे के बीज का पाउडर और 1/2 बडा चम्मच मसूर दाल पाउडर।
विघि : सारी सामग्री को चाय के ठंडे पानी के साथ मिला कर 10-15 मिनट तक आंखों के नीचे काले घेरों पर लगाएं और ठंडे पानी से घो लें। इसके बाद बादाम के तेल की हल्की माशिल करें।
7. स्पेशल पैक सामग्री : 1 बडा चम्मच खीरे के बीज का पाउडर, 1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर, 1 बडा चम्मच पोदीना पाउडर, 1 बडा चम्मच तुसली पाउडर, 2 बडे चम्मच मसूर दान का पाउडर, 1/2 बडा चम्मच नीम पाउडर, 1 बडा चम्मच चंदन पाउडर और 1 छोटा चम्मच मुलतानी मिट्टी।
विघि : सारी सामग्री को मिला कर एअरटाइट डिब्बे में रखें। शुष्क त्वचा पर इसे दही के साथ मिला कर इस्तेमाल करें और त्वचा तैलीय हो, तो टमाटर या सेब के पल्प के साथ प्रयोग कर सकती है।
8. ब्लैडहेड रिमुविंग पैक सामग्री : 1 बडे चम्मच सूजी, 1/4 बडा चम्मच चीनी और 11/4 बडे चम्मच सूखे लाल गुलाब का पाउडर।
विघि : सारी सामग्री को मलाई में मिला कर 15 मिनट तक रखें। उंगलियों की सहायता से इस पेस्ट को चेहरे पर 15मिनट तक घीरे घीरे मलें। गुनगुने पानी से चेहरा घो लें। हफ्ते में 1 बार प्रयोग करें।
9. खस स्क्रब सामग्री :3 बडे चम्मच चावल का पाउडर, 1 बडा चम्मच खसखस का पाउडर और 1 बडा चम्मच मौसमी फल का पल्प।
विघि : सारी सामग्री को मिला कर चेहरे पर 10 मिनट तक उंगलियों की सहायता से स्क्रबिंग करें। ठंडे पानी से चेहरा घें। हफ्ते में 1 बार इस स्क्रब का प्रयोग करें। स्क्रबिग के बाद के मुताबिक पैक लगाएं। मुंहासे हो, तो इस स्क्रब का प्रयोग ना करें।
10. चोकर स्क्रब सामग्री : 1 बडा चम्मच चोकर, 1 बडा चम्मच चना दाल पाउडर, 1 बडा चम्मच उडद दाल का पाउडर, 1/2 बडा चम्मच मैदा, 1/2 बडा चम्मच चंदन पाउडर, 1/2 बडा चम्मच तुलसी पाउडर और 1/2 बडा चम्मच गि्लसरीन।
विघि : सारी सामग्री को दही के साथ मिला कर पेस्ट बनाएं। चेहरे पर इस पेस्ट से 10 मिनट तक स्क्रबिंग करें। ठंडे पानी से चेहरा घो लें। सामान्य त्वचावाली युवतियां इस स्क्रब का इस्तेमाल कर सकती है। हफ्ते में 1 बार इस स्क्रब का इस्तेमाल करें।
11. नीम -तुलसी बॉडी स्क्रब सामग्री : 2 बडे चम्मच सूखे नीम के फलों का पाउडर, 1 बडा चम्मच तुलसी के पत्तों का पाउडर पेस्ट, 3 बडे चम्मच जौ आटा, चुटकी भर हल्दी पाउडर व नमक और 2 बडे चम्मच दही और 1 छोटा चम्मच दुघ।
विघि : सारी सामग्री को मिला कर 5 मिनट तक रखे। नहाने से पहले इसे बदन पर लगाएं और 5 मिनट तक लगा रहने दें। पांच मिनट तक घीरे-घीरे स्क्रबिंग करें और नहा कर बॉडी लोशन लगाएं।
12. फू्रट स्क्रब सामग्री : 1 बडा चम्मच सूखे संतरे के छिलकों का पाउडर, 1 बडा चम्मच नीबू के सूखे छिलकों का पाउडर, 1 छोटा चम्मच चंदन पाउडर, 1 छोटा चम्मच जोै का आटा, 1 बडा चम्मच गेहुं का आटा, 1/2 कप कच्चाा दुघ और कुछ बूंदे नीबू का रस।
विघि : सारी सामग्री को दुघ में मिला कर 10 मिनट तक रखे। नहाने से पहले इस बदन पर 10 मिनट तक स्क्रब करने के बाद कुछ बूंदे नीबू का रस मिले पानी से नहा लें।
13. चंदन स्क्रब सामग्री : 2 बडे चम्मच सफेद चंदन पाउडर, 1 छोटा चम्मच लाल चंदन पाउडर, चुटकी भर हल्दी पाउडर, कपूर पाउडर, 2 बडे चम्मच मिल्क पाउडर, 4 बडे चम्मच गाढा दही, 1 छोटा चम्मच सूजी, 2 बडे चम्मच खसखस दरदरी पिसी हुई और कुछ बूंदे गुलाबजल ।
विघि : सारी सामग्री को मिला कर 2 मिनट तक रखें । बदन पर 10 मिनट तक लगा कर रखें। हल्के हाथों से स्क्रब को मलें और ठंडे पानी से थोडा सा गुलाबजल डालकर नहाएं।
14. ऑरेज स्क्रब सामग्री : 2 बडे चम्मच संतरे का जूस, 1 बडे चम्मच सूख संतरे का पाउडर, 1 बडा चम्मच शहद 1-1 बडा चम्मच गुलाबजल व कच्चा दुघ और 1 ताजा संतरे का छिलका।
विघि : ताजे संतरे के छिलकों को पानी में उबालें। पानी ठंडा हो जाए, तो छिलकों को मिला लें और 15 मिनट तक बदन पर स्क्रबिंग करें। नहाने के पानी में संतरे के छिलकेवाले पानी को मिला कर नहाएं।
15. स्ट्रॉबेरी स्क्रब सामग्री: 3 बडी चम्मच स्ट्रॉबेरी, 1 बडे टमाटर का पल्प, 3 बडे चम्मच जौ का आटा, 3 बडे चम्मच बादाम का पाउडर, 2 बडे चम्मच दही और 1 छोटा चम्मच शहद।
विघि : टमाटर और स्ट्रॉबेरी अच्छी तरह से मिला लें। बादाम का पाउडर, शहद, दही और जौ का पाउडर डाल कर रखें और 5 मिनट तक स्क्रब कर ठंडे पानी से नहा लें। नहाने के पानी में चंदन के तेल की कुछ बूंदे डाल सकती है।

ब्यूटी टिप्स

1. तेज गंघवाले शैंपू का इस्तेमाल करने के बजाय अपने हेअर ब्रश के दांतो का परफ्यूम छिडकें और इससे कंघी करें। सारे दिन आपके बालों से गजब की महक आएगी। तेज गंघवाले शैंपू बालों को हानि पहुँचाते है। बाल भी सलामत रहेंगे और दिनभर आपको मनपसंद खुशबू भी मिलती रहेगी।
2. एडियों पर नियमित पेट्रोलियम जैली लगाने के बाद 20 मिनट तक सूती मोजे पहन कर रखें। आपकी एडियां कभी नहीं फटेंगी।
3. गहरे रंग की लिपस्टिक सादी रूई से पोंछने के बाद भी नहीं निकलती। रूई की बजाय टिशू पेपर का पेकअप रिमूवर में डुबों कर इस्तेमाल करें।
4. रात को सोते समय भवों पर भी आईस्क्रीम लगाएं। भवों में खुश्की नहीं होगी और वे मुलायम रहेंगी।
5. अगर लगता है कि हेअर स्ट्रीकिंगवाले में चमक नहीं आ रही हो, लूफा पर थोडा सा बेकिग सोडा छिडके और स्ट्रीकिंगवाले बालों पर इसे थोडा सा स्क्रब करें। हेअर स्ट्रीकिंग चमक उठेंगे।
6. बालों को ब्लो ड्राई का फाइनल टच देते वक्त हेअर ब्रश क दांतो पर हेअर स्प्रे करें। फिर बालों की जडो से 1 मिनट के लिए ब्रश करें। इससे बालों पर हेअर स्पे्र की मोटी परत नहीं चढेगी, लेकिन बालों का वॉल्यूम और चमक देखते ही बनेगी।
7. बॉडी लोशन लगाने के बाद भी हाथ-पैरों पर चमक नहीं आती हो, तो बॉडी लोशन में थोडा सा बेबी ऑइल डालकर इस्तेताल करें।
8. बाल काफी तैलीय हों, तो इसके लिए मोटे मेकअप ब्रश को लूज पाडडर में डिप करें और बालों की जडो पर लगाएं। यह बालों से अतिरिक्त तेल सोख लेगा। कंघी के दांतो में रूई फंसा कर बालों में ब्रश करें। बाल महक उठेंगे। पहले की तुलना में साफ और तेल रहित दिखायी देंगे।
9. अपने क्यूटिकल को मजबूत, मुलायम और स्वस्थ्य बनाने के लिए एप्रिकॉट ऑइल (आड का तेल) का प्रयोग करें। यह किसी फूड स्टोर में मिल सकता है।
10. बिना मेकअप के भी बरौनियों के आकर्षक बनाया जा सकता है। उंगनियों पर हल्का बादाम या जैतून का तेल मल कर बरौनियों पर लगाएं। यह किसी नेचुरल मस्कारा से कम नहीं।
11. बच्चों की क्रीम से फटी व रूखी कोहनियां व पैर मुलायम बनाए जा सकते हैं।
12. घुलाई का साबुन अगर अलमारी में रख दिया जाएं, तो पूरी अलमारी उसी से महक जाती है। अपने अंडरगारमेंट रखने की जगह पर तेज महकवाले बाथिंग सोप बिना रेपर खोले रख कर देखिए। यकीनन आप फे्रश महसूस करेगी।
13. टूथब्रश पर थोडा सा हेअर स्पे्र कर अपनी भवों पर इससे कंघी करें। भवों पर चमक दिखायी देगी और वे सजी-संवरी भी रहेंगी।
14. मुंहासे बहुत परेशान कर रहे हैं, तो प्रभावित स्थान पर थोडा बिना जैलवाला टूथपेस्ट 15 मिनट तक लगा कर रखिएं और फिर ठंडे पानी से वह स्थान घो डालिए। फर्क महसूस करेगी।
15. आई लाइनर पेसिंल की टिप अगर शार्प हो, तो पलकों पर लाइनर बढिया लगता है। इसके लिए आप आई लाइनर पेंसिल प्रयोग करेने से पहले कुछ देर उसे फ्रीजर में रख दें।
16. ठंड के मौसम में कई बार हाथ-पैरों की उंगलियों पर कोल्ड सोर (ठंड से घाव) हो जाते है। माँइशराइजर में डुबो कर प्रभावित स्थान पर लगाएं। इससे घाव नहीं होगा।
17. अगर आपकी बरौनियां सीघी है, लेकिन आप कर्ल लुक चाहती है, तो आई लैश कर्लर को कुछ सेकेंड के लिए हेअर ड्रायर से गरम कर बरौनियां आसानी से कर्ल हो जाएंगी। उसके बाद वॉटरप्रूफ मस्कारा का इस्तेमाल करें।
18. अगर आप अपनी टांगों को शेव करती है, तो शेविंग क्रीम के साथ थोडे हेअर कंडीशनर का प्रयोग करें।
19. बॉडी सॉफ्टर लोशन ना हो, तो एवोकैडो फल को किसी बरतन में कदूकस कर लें। इसे अपने बदन में 20 मिनट तक मलें और शावर बाथ लें। एवोकैडो प्राकृतिक मॉइpराइजर है।
20. प्रदूषण से प्रभावित बालों में नयी जान डालने के लिए 1 कप पानी मे 3 बडे चम्मच सफेद सिरका मिलाएं और बालों में लगा कर 15 मिनट तक छोड दें। शैंपू से बाल घो लें।
21. स्लीवलेस ब्लाउज पहनने से पहले नहाते समय बांहों और बगलों पर फेस स्क्रबर का इस्तेमाल करें। इससे बांहे और बगलें पहले की तुलना में साफ और मुलायम दिखायी देंगी।
22. रात को पार्टी से लौटने बाद ब्रश करने का समय ना हो, तो माउथवॉश से कुल्ला करने के बाद बिना पेस्ट लगाए टूथपेश से दांत और मसूडों पर ब्रश करें। आप फ्रेश महसूस करेंगी।
23. थकी और निस्तेज त्वचा की आभा लौटाने के लिए अंडेके सफेदी में बिना कुछ मिलाए त्वचा पर 10 मिनट तक लगा कर रखें और ठंडे पानी से चेहरा घो लें।
24. शादी समारोह मे जा रही हों, तो खुले अंगों पर भी हल्का मेकअप करें। इसके लिए हैंड एंड बॉडी लोशन में थोडा सा बॉडी ब्रोंजर मिला कर लगाएं।
25. फटाफट फ्रेश महसूस करने के लिए ज्यादा पसीना आनेवाले स्थान पर बेबी पाउडर लगाएं।
26. पलकों पर आई लाइनर देर तक टिके रहें, इसके लिए पलकों पर प्राइमर का एक कोट लगाएं मैट बेस आई मेकअप का भी प्रयोग आई लाइनर या आई पेंसिल को पलकों पर देर तक टिकाए रखने में मदद करता है।
27. बहुत देर तक सांसे महकती रहे, इसके लिए हाइड्रोजन पैराक्साइड टूथपेस्ट का प्रयोग करें। यह मुंह के अंदर बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया को खत्म करता है।
28. हेअर डाई करती हो, तो बार- बार शैंपू करने से बचें। डाई में मौजूद अमोनिया बालों को रूखा और हेअर क्यूटिकल्स को हानि पहुंचाता है। डाई के बाद बार-बार शैंपू करने से बालौं की जडों का रहा-सहा नेचुरल ऑईल खत्म हो जाता है। हफ्ते में एक बार कंडीशनर युक्त शेपू का प्रयोग करें।
29. कई बार बहुत पसीना आने की शिकायत होने पर डियोडरेंट भी प्रभावी नहीं होता। तनाव और गरमी के अलावा हाइपहाइड्रोसिस भी पसीने की वजह हो सकती है। इसके लिए अल्यूमीनियम युक्त एंटीपर्सपिरेंट का इस्तेमाल किया जा सकता है।
30. नेचुरल मेकअप के लिए फाउंडेशन लगाने के बाद उसे 2 मिनट तक त्वचा पर सोखने दें। उसके बाद पाउडर लगाएं। इससे फाउंडेशन के चकत्ते नहीं दिखेंगे।
 

Wednesday, January 19, 2011

डायबिटीज(मधुमेह) पर विजय के कुदरती नुस्खे

मधुमेह रोग में खून में शर्करा स्तर बढ जाता है भारत में शुगर रोगियों की संख्या में बडी तेजी से  वृद्धि देखने में आ रही है।इस रोग का कारण प्रमुख रूप से इन्सूलिन हार्मोन की की गड्बडी को माना जाता है।तनाव और अनियंत्रित जीवन शैली से इस रोग को बढावा मिलता है।इस लेख में मैं कुछ घरेलू सरल नुस्खे प्रस्तुत कर रहा हूं जो इस रोग को पूरी तरह नियन्त्रित करने मे कारगर साबित हुए हैं।
१॥आंवला और हल्दी का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम ५ ग्राम की मात्रा में पानी के साथ लें। बढे हुए रोग में भी अच्छे परिणाम मिलते हैं।

 २॥मैथी के बीज ५ ग्राम रात भर पानी में भिगो दें ,फ़िर मिक्सर में चलाकर छानकर पियें। अवश्य लाभ होगा।

३॥करेला का ५० ग्राम रस नित्य पीना अति गुणकारी माना गया है।

४॥दाल चीनी४० ग्राम एक लिटर पानी में रात भर भिगो दें , फ़िर मिक्सर में चलाकर छानकर दिन में पियें। यह नुस्खा शुगर कम करने की महौषधि है। जरूर आजमाएं।

 ५॥जमुन के ताजा ५ पत्ते पानी में पीसकर छानकर सुबह-शाम पीने से मधुमेह में बेहद फ़ायदा होता है।

६॥तुलसी,नीम और बेल के सूखे पत्ते बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनालें और शीशी में भर लें  यह चूर्ण ५ ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ लेने से अधिकांश रोगियों को लाभ मिलता है।

 ७॥ अंगूर  का रस और पके टमाटर का रस नियमित लेने से मधुमेह में लाभ होताहै।

८॥सोयाबीन,जौ और चने के मिश्रित आटे की रोटी खावें,इससे शुगर का स्तर कम करने में काफ़ी मदद मिलती है।

९॥मांस और वसायुक्त भोजन हानिकारक है।

१०॥प्रतिदिन २४ घन्टे में ३-४ लिटर पानी पीने की आदत डालें।

११॥हरी सब्जीयां,फ़ल और रेशे वाली चीजें भोजन में प्रचुर मात्रा में लें। शकर, मीठे फ़ल से परहेज करें।

१२॥अपनी आयु के हिसाब से २ से ४ किलोमिटर नित्य घूमना जरूरी है।

    उपरोक्त जीवन चर्या अपनाकर आप मधुमेह से होने वाले हानिकारक प्रभावों से बच सकते हैं। जिन मधुमेह  रोगियों को नित्य इन्सुलिन के इन्जेक्शन लग रहे है उनके लिये हर्बल चिकित्सा उपादेय होती है। मार्ग दर्शन हेतु नि:संकोच संपर्क करें।

पित्त-पथरी? बिना आपरेशन सफ़ल चिकित्सा

 १) गाजर और ककडी का रस प्रत्येक १०० मिलिलिटर की मात्रा में मिलाकर दिन में दो बार पीयें। अत्यन्त लाभ दायक उपाय है।

 २)  नींबू  का रस ५० मिलिलिटर की मात्रा में सुबह खाली पेट पीयें। यह उपाय एक सप्ताह तक जारी रखना उचित है।

३)  सूरजमुखी या ओलिव आईल ३० मिलि खाली पेट पीयें।इसके तत्काल बाद में १२० मिलि अन्गूर का रस या निम्बू का रस पीयें। यह विधान कुछ हफ़्तों तक जारी रखने पर अच्छे परिणाम मिलते हैं।
 
 ४)  नाशपती का फ़ल खूब खाएं। इसमें पाये जाने वाले रसायनिक तत्व से पित्ताषय के रोग दूर होते हैं।

  ५)  विटामिन सी याने एस्कोर्बिक एसिड के प्रयोग से शरीर का इम्युन सिस्टम मजबूत बनता है।यह कोलेस्ट्रोल को पित्त में बदल देता है। ३-४ गोली नित्य लें।

 ६)  पित्त पथरी रोगी भोजन में प्रचुर मात्रा में हरी सब्जीयां और फ़ल शामिल करें। ये कोलेस्ट्रोल रहित पदार्थ है।

 ७)  तली-गली,मसालेदार चीजों का परहेज जरुरी है।

 ८)  शराब,चाय,काफ़ी एवं शकरयुक्त पेय हानिकारक है।

९)  एक बार में ज्यादा भोजन न करें। ज्यादा भोजन से अधिक मात्रा में कोलेस्ट्रोल निर्माण होगा जो हनिकारक है।

१०) गाल ब्लाडर की बडी पथरियां हर्बल इलाज से नष्ट हो जाती हैं।

हार्ट अटैक के बाद जीवन शैली और घरेलू उपचार.

हार्ट अटैक के बाद की जीवन शैली और घरेलू उपचार
    एक बार हार्ट अटैक झेल चुके हृदय के मरीजों को अत्यन्त सावधानी के साथ अपनी जीवन शैली में ऐसे बदलाव अपनाने चाहिये जिससे दूसरी बार अटैक से बचे रहें। मैं ऐसे रोगियों के लिये परामर्ष के तौर पर कुछ लाभदायक बातें और निर्देश यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। अपने चिकित्सक के परामर्श से अमल में लाकर लाभ उठावें।
१) हार्ट अटैक के बाद रोगी २-३ सप्ताह पूर्ण विश्राम करें।
२)  विश्राम अवधि के बाद धीरे-धीरे चलने का अभ्यास  करें। हां ,ज्यादा थकावट मेहसूस नहीं होनी चाहिय। शारीरिक सक्रियता लगातार बढाते जाएं। तकलीफ़ मालुम ना  हो तो तेज चलने का उपक्रम भी करते रहें।
३)  मन में निराशा,चिंता,टेंशन बिल्कुल न आने दें। प्रसन्न रहना हार्ट रोगियों के लिये टानिक का काम करता है। अटैक पडने के एक दो माह बाद तबीयत  ठीक हो  तो सेक्स करने मे भी  कोइ अडचन नही है।
४)  अपने ब्लड प्रेशर की नियमित जांच करवाते रहना चाहिये। खून में कोलेस्ट्रोल के लेविल की जांच भी नियमित अंतराल पर करवाते रहें।
५)  हार्ट  के मरीजों के भोजन में हरी सब्जीयां और फ़लों की अधिकता जरूरी है। अंकुरित किये हुए मैथी बीज सोयाबीन बीज मूंग,अलसी बीज खाने की आदत डालना आवश्यक है।
६)  आंवला विटामिन सी का उत्तम स्रोत है। यह हृदय के लिये अमृत समान फ़ल है।  नित्य १० मिलि. आंवला रस पीना लाभदायक है।
७)  अदरक का हार्ट पर उत्तम प्रभाव देखा गया है।  इससे कोलेस्त्रोल का लेविल घटता है। और अदरक के प्रभाव से खून में  थक्का भी नहीं जमता है।
८)   नींबू  के नियमित सेवन से खून की नलियों मे कोलेस्ट्रोल नहीं जम पाता है। एक नींबू का रस मामूली गरम जल में रोजाना लेते रहें।
९)  आयुर्वेदिक चिकित्सक हृदय रोगियों में अर्जुनारिषट का बहुतायत से प्रयोग करते हैं ।
इससे परिसंचरण तन्त्र मजबूत होता है। हार्ट की सुरक्छा के लिये यह औषधि प्रसिद्ध हो चुकी है।
१०)  शहद १५ ग्राम एक नींबू के रस में मिलाकर लेने से हृदय की ताकत में इजाफ़ा होता है।
११)  ताजा अनुसंधान में पता चला है कि लहसुन की ४ कली चाकू से बारीक काटकर १०० ग्राम दूध में उबालकर लेने से  खून  में थक्का नहीं जमता है और कोलेस्ट्रोल का लेविल भी कम हो जाता है।
     हार्ट के मरीज ऊपर बताये गये उपाय अपनाकर अपने हृदय को सुरक्छित रखते हुए दूसरे हार्ट अटैक से  बचे रहेंगे और उनका इम्युन सिस्टम भी शक्तिशाली बन जाएगा।

माईग्रेन(आधाशीशी) रोग का सरल उपचार

१)  बादाम १०-१२ नग प्रतिदिन खाएं। यह माईग्रेन का बढिया उपचार है।
२)  बन्ड गोभी को कुचलकर एक सूती कपडे में बिछाकर  मस्तक (ललात) पर बांधें। रात को सोते वक्त या दिन में भी सुविधानुसार कर सकते हैं। जब गोभी का पेस्ट सूखने लगे तो नया पेस्ट बनाककर पट्टी बांधें। मेरे अनुभव में यह माईग्रेन का सफ़ल उपाय हैं।
३)  अंगूर का रस २०० मिलि सुबह -शाम पीयें। बेहद कारगर नुस्खा है।
४)  नींबू के छिलके  कूट कर पेस्ट बनालें।  इसे ललाट पर बांधें । जरूर फ़ायदा होगा।
५)  गाजर का रस और पालक का रस दोनों करीब ३०० मिलि  पीयें आधाशीशी में गुणकारी है।
६) गरम जलेबी २०० ग्राम नित्य सुबह खाने से भी कुछ रोगियों को लाभ हुआ है।
७)   आधा चम्मच सरसों के बीज का पावडर ३ चम्मच पानीमें घोलक्रर नाक में रखें । माईग्रेन का सिरदर्द कम हो जाता है।
७) सिर को कपडे से मजबूती से बांधें। इससे खोपडी में रक्त का प्रवाह कम होकर सिरदर्द से राहत मिल जाती है।
८) माईग्रेन रोगी देर से पचने वाला और मसालेदार भोजन न करें।
९) विटामिन बी काम्प्लेक्स का एक घटक नियासीन है। यह विटामिन आधाशीशी रोग में उपकारी है। १०० मिलि ग्राम की मात्रा में रोज लेते रहें।
१०) तनाव मुक्त जीवन शैली अपनाएं।
 ११) हरी सब्जियों और फ़लों को अपने भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।

कान दर्द निवारक कुदरती उपचार

१)  दर्द वाले कान में हायड्रोजन पेराक्साइड की कुछ बूंदे  डालें। इससे कान में जमा मैल( वाक्स) नरम होकर बहार निकल जाता है।  अगर कान में कोइ संक्रमण होगा तो भी यह उपचार उपकारी रहेगा। हायड्रोजन में उपस्थित आक्सीजन जीवाणुनाशक होती है।
२)  लहसुन संस्कारित तेल कान पीडा में हितकर है। १० मिलि तिल के तेल में ३ लहसुन की कली पीसकर डालें और इसे  किसी बर्तन में गरम करें। छानकर शीशी में भरलें। इसकी  ४-५ बूंदें रुग्ण कान में टपकादें। रोगी १० मिनिट तक लेटा रहे। फ़िर इसी प्रकार दूसरे कान में भी दवा डालें। कान दर्द में लाभ प्रद नुस्खा है।
३)  जेतुन का तेल मामूली गरम करके कान में डालने से दर्द में राहत होती है।
४)  मुलहठी कान दर्द में उपयोगी है। इसे घी में भूनें । बारीक पीसकर पेस्ट बनाएं। इसे कान के बाह्य भाग में लगाएं। कुछ ही मिनिट में दर्द समाप्त होगा।
५)  बच्चों के कान में पीप होने पर स्वस्थ स्त्री  के दूध की कुछ बूंदें कान में टपकादें। स्त्री के दूध में प्रतिरक्छा तंत्र को मजबूत करने के गुण विध्यमान होते हैं। उपकारी उपचार है।
६)  कान में पीप होने पर प्याज का रस लाभप्रद उपाय है। प्याज का रस गरम करके कान में २-४ बूंदे डालें। दिन में ३ बार करें। आशातीत लाभकारी उपचार है।
७) अजवाईन का तेल  और तिल का तेल १:३ में मिक्स करें। इसे मामूली गरम करके कान में २-४ बूंदे टपकादें। कान दर्द में उपयोगी है।
८) पांच ग्राम मैथी के बीज एक बडा चम्मच तिल के तेल में गरम करें। छानकर  शीशी में भर लें। २ बूंद दवा और २ बूद दूध कान में टपकादें। कान पीप का उम्दा इलाज माना गया है।
९)  तुलसी की कुछ पत्तिया और लहसुन की एक कली पीसकर पेस्ट बनालें। इसे गरम करें। कान में इस मिश्रण का रस २-३ बूंद टपकाएं। कान में डालते समय रस सुहाता गरम होना चाहिये। कान दर्द का तत्काल लाभप्रद उपचार है।
१०)  कान दर्द और पीप में पेशाब की उपयोगिता सिद्ध हुई है। ताजा पेशाब ड्रापर में भरकर कान में डालें,उपकार होगा।
११)  मूली कान दर्द में हितकारी है। एक मूली के बारीक टुकडे करलें । सरसों के तेल में पकावें। छानकर शीशी में भर लें ।कान दर्द में इसकी २-४ बूंदे टपकाने से आराम मिल जाता है।
१२) गरम पानी में सूती कपडा भिगोकर निचोडकर ३-४ तहें बनाकर कान पर सेक के लिये रखें।  कान दर्द परम उपकारी उपाय है।
१३)  सरसों का तेल गरम करें । सुहाता गरम तेल की २-४ बूंदे कान में टपकाने से कान दर्द में तुरंत लाभ होता है।
१४)  सोते वक्त सिर के नीचे बडा तकिया रखें। इससे युस्टेशियन नली में जमा श्लेष्मा नीचे खिसकेगी और नली साफ़ होगी। मुंह में कोई चीज चबाते रहने से भी नली का अवरोध हटाने में मदद मिलती है।
१५)   केले की पेड की हरी छाल निकालें। इसे गरम करें  सोते वक्त इसकी ३-४ बूंदें कान में डालें । कान दर्द  की उम्दा दवा है।

शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम करने के कुदरती उपचार-

१)  चर्बी घटाने के लिये व्यायाम बेहद आवश्यक उपाय है।एरोबिक कसरतें लाभप्रद होती हैं। आलसी जीवन शैली से मोटापा बढता है। अत: सक्रियता बहुत जरूरी है।

२) शहद मोटापा निवारण के लिये अति महत्वपूर्ण पदार्थ है। एक चम्मच शहद आधा चम्मच नींबू का रस गरम जल में मिलाकर लेते रहने से शरीर की अतिरिक्त चर्बी नष्ट होती है। यह दिन में ३ बार लेना कर्तव्य है।

३)  पत्ता गोभी(बंद गोभी) में चर्बी घटाने के गुण होते हैं। इससे शरीर का मेटाबोलिस्म ताकतवर बनता है। फ़लत: ज्यादा केलोरी का दहन होता है।  इस प्रक्रिया में चर्बी समाप्त होकर मोटापा निवारण में मदद मिलती है।

४)  पुदीना में मोटापा विरोधी तत्व पाये जाते हैं। पुदीना रस एक चम्मच २ चम्मच शहद में मिलाकर लेते रहने से  उपकार होता है।

५)  सुबह उठते ही २५० ग्राम टमाटर का रस २-३ महीने तक पीने से  शरीर की वसा  में कमी होती है।

६) गाजर का रस मोटापा कम करने में उपयोगी है। करीब ३०० ग्राम गाजर का रस दिन में किसी भी समय लेवें।

७) एक अध्ययन का निष्कर्ष आया है कि वाटर थिरेपी मोटापा की समस्या हल करने में कारगर सिद्ध हुई है। सुबह उठने के बाद प्रत्येक घंटे के फ़ासले पर २ गिलास पानी पीते रहें। इस प्रकार दिन भर में कम से कम २० गिलास पानी पीयें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे और चयापचय प्रक्रिया(मेटाबोलिस्म) तेज होकर ज्यादा केलोरी का दहन होगा ,और शरीर की चर्बी कम होगी। अगर २  गिलास के बजाये ३ गिलास पानी प्रति घंटे पीयें तो और भी तेजी से मोटापा निवारण होगा।

८)  कम केलोरी वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग करें। जहां तक आप कम केलोरी वाले भोजन की आदत नहीं डालेंगे ,मोटापा निवारण दुष्कर कार्य रहेगा। अब मैं ऐसे भोजन पदार्थ निर्देशित करता हूं जिनमें नगण्य केलोरी होती है। अपने भोजन में ये पदार्थ ज्यादा शामिल करें--

नींबू
जामफ़ल (अमरुद)
अंगूर
सेवफ़ल
खरबूजा
जामुन
पपीता
आम
संतरा
पाइनेपल
टमाटर
तरबूज
बैर
स्ट्राबेरी
सब्जीयां जिनमें नहीं के बराबर केलोरी होती है--
पत्ता गोभी
फ़ूल गोभी
ब्रोकोली
प्याज
मूली
पालक
शलजम
सौंफ़
लहसुन
९)  कम नमक,कम शकर उपयोग करें।

१०) अधिक वसा युक्त भोजन पदार्थ से परहेज करें।  तली गली चीजें इस्तेमाल करने से चर्बी बढती है। वनस्पति घी हानिकारक है।

११) सूखे मेवे (बादम,खारक,पिस्ता) ,अलसी के बीज,ओलिव आईल में उच्चकोटि की वसा होती है। इनका संतुलित उपयोग उपकारी है।

१२)  शराब और दूध निर्मित पदार्थ का उपयोग वर्जित है।

१३)  अदरक चाकू से बरीक काट लें ,एक नींबू की चीरें काटकर  दोनो पानी में ऊबालें। सुहाता गरम पीयें। बढिया उपाय है।

१४)  रोज  पोन किलो फ़ल और सब्जी का उपयोग करें।

१५)  ज्यादा कर्बोहायड्रेट वाली वस्तुओं का परहेज करें।शकर,आलू,और चावल में अधिक कार्बोहाईड्रेट होता है। ये चर्बी बढाते हैं। सावधानी बरतें।

१६)  केवल गेहूं के आटे की रोटी की बजाय गेहूं सोयाबीन,चने के मिश्रित आटे की रोटी ज्यादा फ़यदेमंद है।

१७)  शरीर के वजने को नियंत्रित करने में योगासन का विशेष महत्व है। कपालभाति,भस्त्रिका का  नियमित अभ्यास करें।।

१८) सुबह आधा घंटे तेज चाल से घूमने जाएं।  वजन घटाने का सर्वोत्तम तरीका है।

१९) भोजन मे ज्यादा रेशे वाले पदार्थ शामिल करें। हरी सब्जियों ,फ़लों  में अधिक रेशा होता है। फ़लों को छिलके सहित खाएं। आलू का छिलका न निकालें। छिलके में कई  पोषक तत्व होते हैं।

कोलेस्टरोल कम करने के आसान उपाय.

१) एल.डी एल.कोलेस्टरोल- ---यह हानिकारक कोलेस्टरोल रक्त वाहिकाओं में जमता रहता है, जिससे वे भीतर से संकरी हो जाती है और उनमें दौडने वाले खून के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होने से हार्ट अटैक और हाई ब्लड प्रेशर जैसे हृदय रोग  जन्म लेते हैं।
२) एच.डी.एल.कोलेस्टरोल-- यह लाभदायक कोलेस्टरोल माना जाता है । खून में इसका वांछित स्तर बना रहने से हृदय रोगों की संभावना कम हो जाती है। यह खराब और  हानिकारक कोलेस्टरोल को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया में मददगार होता है।
३) ट्राईग्लिसराईड कोलेस्टरोल भी हानिकारक होता है। हार्ट अटैक रोग में इसकी जिम्मेदारी  काफ़ी  अहम मानी गई है।
कोलेस्टरोल नियंत्रित और कम करने के लिये निम्न उपाय करना उचित है--

१) पर्याप्त रेशे वाली खाद्य वस्तुएं दैनिक भोजन में शामिल करें।हरी पत्तेदार सब्जियों में प्रचुर रेशा होता है। इनका ज्युस भी लाभदायक है। सब्जियों में कोलेस्टरोल नहीं होता है।

२) सभी तरह के फ़ल खाएं। कोलेस्टरोल घटाने में इनका विशेष महत्व है।

३) साबुत अनाज,भूरे चावल जई,सोयाबीन का उपयोग करना लाभप्रद है। सोयाबीन में उच्चकोटि का प्रोटीन होताहै।। आलू और चावल में कोलेस्टरोल और सोडियम नहीं होते हैं और कोलेस्टरोल नियंत्रण के लिये इनके उपयोग की अनदेखी नहीं करना चाहिये।

४) टमाटर ,गाजर,सेवफ़ल,नारंगी,पपीता आदि फ़ल खूब खाएं।

५) एक अनुसंधान में यह तथ्य सामने आया है कि काली और हरी चाय का उपयोग कोलेस्टरोल नियंत्रण का सशक्त उपाय है। ज्यादा चाय पीने वालों को हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है। लेकिन यह  चाय  दूध और शकर रहित होनी चाहिये।

६)  तेल और वनस्पति घी में तली वस्तुएं खाने से खराब कोलेस्टरोल तेजी से बढता है। इनसे बचें।सब्जी, दाल का स्वाद मसालों से बढाएं। तेल,घी न्युनतम व्यवहार करें। कचोरी समोसे तो कभी न खाएं। लेकिन इस जगह यह लिखना भी जरूरी है कि जेतुन का तेल कोलेस्टरोल कम करता है। मंहगा जरूर है पर बहुत ज्यादा फ़ायदेमंद भी है।

७)  मांस खाने से खराब कोलेस्टरोल बढता है। यह हृदय रोग उत्पन्न करता है। मांस खाना छोड दें।

८)  लहसुन का प्रयोग कोलेस्टरोल घटाता है। सुबह ३-४ लहसुन की कली  कच्ची चबाकर खाएं। इसमें खून को पतला करने के तत्व हैं जो खून मे थक्का जमने से बचाव करते हैं। भोजन में भी पर्याप्त लहसुन का प्रयोग करें।

९) कच्चा प्याज ,बादाम, अखरोट,खारक का समुचित उपयोग उत्तम है। इनमें उच्चकोटि की वसा पायी जातीहै।

१०) शकर से कोलेस्टरोल की वृद्धि होती है। अत: न्युनतम उपयोग करें।

११) मछली का तेल बुरे कोलेस्टरोल को नियंत्रित करता है। काड लिवर आईल भी उत्तम है।

१२)  नियमित रुप से व्यायाम( घूमने,सीढी चढने) करने से कोलेस्टरोल नियंत्रण में रहता है।

 योगासन और प्राणायाम कोलेस्टरोल घटाने मे आशातीत लाभप्रद परिणाम प्रस्तुत करते  हैं।

१३) एलोपैथी के चिकित्सक कोलेस्टरोल कम करने के लिये स्टेटिन दवा का व्यवहार करते हैं।

१४) आयुर्वेदिक वैध्य  अर्जुन की छाल का काढा,त्रिफ़ला,पुनर्नवा मंडूर ,आरोग्यवर्धिनी वटी तथा चन्द्रप्रभा वटी का उपयोग करते हैं।

१५) कोलेस्टरोल कम करने के लिये जीवनशैली में बदलाव बेहद जरूरी है। मोटापा कम करने से भी कोलेस्टरोल नियंत्रण में मदद मिलती है। आलसी जीवन से कोलेस्टरोल बढता है।

थकान उतारने के आसान तरीके

अधिक परिश्रम करने से शरीर में थकान आ जाती है, शरीर सुस्त हो जाता है। फिर कुछ काम करने का मन नहीं करता, सिर्फ आराम की जरूरत महसूस होती है।

थकान उतारने के लिए आप कुछ इस तरह प्रयास करें-

अपनी दो अँगुलियों के पोरों से चेहरे की हल्की मालिश करें। इससे ब्लड सर्कूलेशन बढ़ेगा, जिससे आप महसूस करेंगे कि आपकी थकान रफूचक्कर हो गई है।

* नाक के दोनों ओर हल्की मालिश करते हुए धीरे-धीरे दोनों आँखों के बीच वाले भाग से लेकर आँखों के नीचे भी हल्की मालिश करें। फिर इसी तरह से भौहों तक पहुँचें।

* भौहों पर हल्का दबाव डालते हुए अंदर से बाहर की ओर मालिश करें।

* अब आँखों के बाहरी किनारों पर मालिश करते हुए ललाट तक पहुँचें।

* इसके बाद आँखों के एकदम नीचे की ओर आएँ। गालों के बीच हल्की मालिश करते हुए फिर ऊपर से ही मसूड़ों की भी मालिश करें। इसके बाद जबड़ों को अंगुलियों की पकड़ में लें और जबड़ों के किनारों पर हल्का दबाव डालें।

* कई बार सुगंधित तेल के प्रयोग से भी शरीर की थकावट को भगाया जा सकता है। सुगंधित तेल से प्रभावित अंग की हल्की मालिश करने से ताजगी महसूस होती है, इसके लिए सुगंधित तेल की कुछ बूँदें वनस्पति तेल में मिलाकर मालिश करनी चाहिए। 

Tuesday, January 18, 2011

तुलसी एक दिव्य पौधा है।

तुलसी की २१ से ३५ पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिलबट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भांति पीस लें और १० से ३० ग्राम मीठी दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खायें। ध्यान रहे दही खट्टा न हो और यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें। छोटे बच्चों को आधा ग्राम दवा शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भुलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं। दवा दिनभर में एक बार ही लें परन्तु कैंसर जैसे असह्य दर्द और कष्टप्रद रोगो में २-३ बार भी ले सकते हैं।

इसके तीन महीने तक सेवन करने से खांसी, सर्दी, ताजा जुकाम या जुकाम की प्रवृत्ति, जन्मजात जुकाम, श्वास रोग, स्मरण शक्ति का अभाव, पुराना से पुराना सिरदर्द, नेत्र-पीड़ा, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, ह्रदय रोग, शरीर का मोटापा, अम्लता, पेचिश, मन्दाग्नि, कब्ज, गैस, गुर्दे का ठीक से काम न करना, गुर्दे की पथरी तथा अन्य बीमारियां, गठिया का दर्द, वृद्धावस्था की कमजोरी, विटामिन ए और सी की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, सफेद दाग, कुष्ठ तथा चर्म रोग, शरीर की झुर्रियां, पुरानी बिवाइयां, महिलाओं की बहुत सारी बीमारियां, बुखार, खसरा आदि रोग दूर होते हैं।

यह प्रयोग कैंसर में भी बहुत लाभप्रद है।

Friday, January 14, 2011

घरेलू तेल के लाजवाब नुस्खे

अलसी का तेल : इसके तेल में विटामिन 'ई' पाया जाता है। कुष्ठ रोगियों को इसके तेल का सेवन करने से अत्यंत लाभ होता है। आग से जले हुए घाव पर इसके तेल का फाहा लगाने से जलन और दर्द में तुरंत आराम मिलता है। अलसी को भूनकर बकरी के दूध में पकाकर पुल्टिस बाँधने से फोड़े का दर्द बंद हो जाता है और फोड़ा फूट जाता है।

एरंड का तेल : रेड़ी के तेल को एरंड और केस्टर ऑइल कहते हैं। इस तेल का सेवन हृदय रोग, पुराना बुखार, पेट के वायु संबंधी रोग, अफरा, वायुगोला, शूल, कब्जियत और कृमि को दूर कर देता है। यह भूख को बढ़ाने वाला तथा यौवन को स्थिर रखने वाला होता है। शुद्ध तेल को एक छँटाक अथवा आधी छँटाक पीने से यह जुलाब का काम करता है। बेसन में इसके तेल को मिलाकर शरीर पर उबटन करने से चमड़ी का रंग साफ हो जाता है।

जैतून का तेल : जैतून के तेल को ऑलिव ऑइल कहते हैं। शरीर पर इसकी मालिश सर्दी को दूर करने वाली, सूजन मिटाने वाली, लकवा, गठिया, कृमि और वात रोगों से छुटकारे के लिए अत्यंत हितकारी होती है।

नारियल का तेल : नारियल के तेल में भी विटामिन 'ई' पाया जाता है। यह तेल ठंडा, मधुर, भारी, ग्राही, पित्त नाशक तथा बालों को बढ़ाने वाला होता है। इसे बालों में लगाने से बाल चिकने, काले, लंबे हो जाते हैं।

सरसों का तेल : सरसों के तेल में विटामिन ए, बी व ई पाए जाते हैं। यह गर्म होता है। इसमें नमक मिलाकर दाँतों में मलने से दाँत दर्द, पायरिया रोग दूर होता है और दाँत मजबूत होते हैं।

बिनौला तेल : इसके सेवन से स्तनों में अधिक दूध उत्पन्न होता है। फोड़ा, फुँसी, खुजली, सूजन, जोड़ों का दर्द, गठिया आदि रोगों को यह दूर करता है।

राई का तेल : यह चर्म रोग को दूर करने वाला होता है। इसे सरसों के तेल की तरह ही खाने के उपयोग में लिया जाता है।

तिल का तेल : तिल का तेल स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। यह मधुर, सूक्ष्म, कसैला, कामशक्ति बढ़ाने वाला होता है। इसके तेल में हींग और सौंठ मिलाकर गर्म करके शरीर पर मालिश करने से कमर, जोड़ों का दर्द, लकवा रोग मिट जाता है। यह खाने से ज्यादा मालिश में गुणकारी होता है।

Tuesday, January 11, 2011

अवलेह पाक (चाटी जाने वाली दवा)

सुपारी पाक : बच्चा होने के बाद महिलाओं को इसका सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से गर्भावस्था और प्रसवकाल की दुर्बलता दूर होकर शरीर पुष्ट व स्वास्थ्य उन्नत होता है। रक्तपित्त, क्षय, उरक्षत, प्रमेह नाशक, व वीर्यवर्धक, प्रदर रोग नाशक, मूत्रघात नाशक, गर्भाशय संबंधी रोगों में लाभकारी। मात्रा 10 से 15 ग्राम-प्रातः सायं दूध से।

हरिद्राखंड : शीत पित्त (पित्ती), चकत्ते, खुजली, विस्फोट (फफोले), दाद, एलर्जी, आदि रोगों की प्रसिद्ध औषधि। नियमित प्रयोग से शरीर की कांति बढ़ाता है। मात्रा 5 से 10 ग्राम दूध अथवा जल से।

सिद्ध घृ

फलकल्याण घृत (फल घृत) : स्त्रियों के शरीर या कमर का दर्द तथा कमजोरी दूर करता है, गर्भ का पोषण करता है, गर्भिणी स्वस्थ रहती है तथा सुंदर संतान की जननी बनती है। गर्भाशय के रोगों में गुणकारी एवं बन्धया स्त्रियों को हितकारी। मात्रा 5 से 10 ग्राम प्रातः-सायं दूध के साथ।

त्रिफला घृत : इसके सेवन से आंख की ज्योति बढ़ती है तथा रतौंध, आंखों से पानी बहना, खुजली पड़ना, रक्त दृष्टि, नेत्र पीड़ा और नेत्र विकार दूर होते हैं। त्रिफला के पूर्ण गुण होने के साथ-साथ स्निग्धता भी आती है अतः पेट साफ रहता है। मात्रा 5 से 10 ग्राम प्रातः-सायं दूध के साथ।
ब्रह्म रसायन : शारीरिक व मानसिक दुर्बलता दूर कर नवशक्ति का संचार करने वाला अपूर्व रसायन। श्वास, कास में लाभप्रद तथा दिमागी कार्य करने वालों के लिए उपयुक्त। मात्रा 3 से 10 ग्राम गर्म दूध के साथ सुबह-शाम लेना चाहिए।

मूसली पाक (केशरयुक्त) : अत्यंत पौष्टिक है। असंयमजनित रोगों को दूर कर शरीर को पुष्ट बनाता है। बल, वीर्यवर्धक, बाजीकारक एवं शक्तिदायक। शरद ऋतु में शक्ति संचय हेतु उपयुक्त। मात्रा 10 से 15 ग्राम प्रातः-सायं दूध से।

वासावलेह : सभी प्रकार की खांसी, श्वास, दमा, क्षय, रक्तपित्त, पुरानी खांसी के साथ खून आना, फेफेड़ों की कमजोरी आदि रोगों को नष्ट करता है। मात्रा 10 से 25 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ।
चित्रक हरीतिकी : पुराने और बार-बार होने वाले सर्दी-जुकाम (नजला) की अनुभूत दवा है। पीनस, श्वास, कास तथा उदर रोगों में गुणकारी एवं अग्निवर्धक। मात्रा 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम।

बादाम पाक (केशर व भस्मयुक्त) : दिल और दिमाग को ताकत देता है। नेत्रों को हितकारी तथा शिरा रोग में लाभकारी। शरीर को पुष्ट करता है और वजन बढ़ाता है। सर्दियों में सेवन करने योग्य उत्तम पुष्टि दायक है। सभी आयु वालों के लिए पौष्टिक आहार। मात्रा 10 से 20 ग्राम प्रातः-सायं दूध से।

कुष्मांड (खंड) अवलेह : रक्तपित्त, कांस, श्वास, उल्टी, प्यास व ज्वर, नाशक, मुंह, नाक, गुदा इन्द्रियों आदि से खून आने पर लाभकारी। नेत्रों को हितकारी, बल, वीर्यवर्धक एवं पौष्टिक। स्वर शुद्ध करता है। मात्रा 15 ग्राम सुबह-शाम चाटना चाहिए।

च्यवनप्राश अवलेह (अष्टवर्गयुक्त) : सप्त धातुओं को बढ़ाकर शरीर का काया कल्प करने की प्रसिद्ध औषधि। फेफेड़े के विकार, पुराना श्वास, खांसी, शारीरिक क्षीणता, पुराना बुखार, खून की कमी, कैल्शियम की कमी, क्षय, रक्तपित्त, रक्त क्षय, मंदाग्नि, धातु क्षय आदि रोगों की प्रसिद्ध औषधि। इसमें स्वाभाविक रूप से विटामिन 'सी' पर्याप्त मात्रा में होता है। बल, वीर्यवर्धक है। मात्रा 10 से 25 ग्राम (2-4 चम्मच) दूध के साथ सुबह-शाम सोते समय।

आयुर्वेद भस्म व पिष्टी

अकीक भस्म : हृदय की निर्बलता, नेत्र विकार, रक्त पित्त, रक्त प्रदर आदि रोग दूर करती है। (नाक-मुंह से खून आना) मात्र 1 से 3 रत्ती।

अकीक पिष्टी : हृदय और मस्तिष्क को बल देने वाली तथा वात, पित्त नाशक, बल वर्धक
और सौम्य है।

अभ्रक भस्म (साधारण) : हृदय, फेफड़े, यकृत, स्नायु और मंदाग्नि से उत्पन्न रोगों की सुप्रसिद्ध दवा है। श्वास, खांसी, पुराना बुखार, क्षय, अम्लपित्त, संग्रहणी, पांडू, खून की कमी, धातु दौर्बल्य, कफ रोग, मानसिक दुर्बलता, कमजोरी आदि में लाभकारी है। मात्रा 3 से 6 रत्ती शहद, अदरक या दूध से।

अभ्रक भस्म (शतपुटी पुटी) (100 पुटी) : इसमें उपर्युक्त गुण विशेष मात्रा है। मात्रा 1 से 2 रत्ती।

अभ्रक भस्म (सहस्त्र पुटी) (1000 पुटी) : इसमें साधारण भस्म की अपेक्षा अत्यधिक गुण मौजूद रहते हैं। मात्रा 1/4 से 1 रत्ती।

कपर्दक (कौड़ी, वराटिका, चराचर) भस्म : पेट का दर्द, शूूल रोग, परिणाम शूल अम्लपित्त, अग्निमांद्य व फेफड़ों के जख्मों में लाभकारी। मात्रा 2 रत्ती शहद अदरक के साथ सुबह व शाम को।

कसीस भस्म : रक्ताल्पता में अत्यधिक कमी, पांडू, तिल्ली, जिगर का बढ़ जाना, आम विकार, गुल्म आदि रोगों में भी लाभकारी। मात्रा 2 से 8 रत्ती।

कहरवा पिष्टी (तृणकांतमणि) : पित्त विकार, रक्त पित्त, सिर दर्द, हृदय रोग, मानसिक विकार, चक्कर आना व सब प्रकार के रक्त स्राव आदि में उपयोगी। मात्रा 2 रत्ती मक्खन के साथ।

कांतिसार (कांत लौह फौलाद भस्म) : खून को बढ़ाकर सभी धातुओं को बढ़ाना इसका मुख्य गुण है। खांसी, दमा, कामला, लीवर, प्लीहा, पांडू, उदर रोग, मंदाग्नि, धातुक्षय, चक्कर, कृमिरोग, शोथ रोगों में लाभकारी तथा शक्ति वर्द्धक। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती।

गोदन्ती हरताल (तालक) भस्म : ज्वर, सर्दी, खांसी, जुकाम, सिर दर्द, मलेरिया, बुखार आदि में विशेष लाभकारी। मात्रा 1 से 4 रत्ती सुबह व शाम को शहद व तुलसी के रस में।

जहर मोहरा खताई भस्म : शारीरिक एवं मानसिक बल को बढ़ाती है तथा विषनाशक है। अजीर्ण, कै, उल्टी, अतिसार, यकृत विकार, घबराहट, जीर्ण ज्वर, बालकों के हरे-पीले दस्त एवं सूखा रोग में लाभकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद में।

जहर खताई पिष्टी : गुण, जहर मोहरा खताई भस्म के समान, किंतु अधिक शीतल, घबराहट व जी मिचलाने में विशेष उपयोगी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शर्बत अनार से।
टंकण (सुहागा) भस्म : सर्दी, खांसी में कफ को बाहर लाती है। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से।

ताम्र (तांबा) भस्म : पांडू रोग, यकृत, उदर रोग, शूल रोग, मंदाग्नि, शोथ कुष्ट, रक्त विकार, गुर्दे के रोगों को नष्ट करती है तथा त्रिदोष नाशक है। मात्रा 1/2 रत्ती शहद व पीपल के साथ।

नाग (सीसा) भस्म : वात, कफनाशक, सब प्रकार के प्रमेह, श्वास, खांसी, मधुमेह धातुक्षय, मेद बढ़ना, कमजोरी आदि में लाभकारी। मात्रा 1 रत्ती शहद से।

प्रवाल (मूंगा) भस्म : पित्त की अधिकता (गर्मी) से होने वाले रोग, पुराना बुखार, क्षय, रक्तपित्त, कास, श्वास, प्रमेह, हृदय की कमजोरी आदि रोगों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद अथवा शर्बत अनार के साथ।

प्रवाल पिष्टी : भस्म की अपेक्षा सौम्य होने के कारण यह अधिक पित्त शामक है। पित्तयुक्त, कास, रक्त, रक्त स्राव, दाह, रक्त प्रदर, मूत्र विकार, अम्लपित्त, आंखों की जलन, मनोविकार और वमन आदि में विशेष लाभकारी है। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद अथवा शर्बत अनार से।

पन्ना पिष्टी : रक्त संचार की गति को सीमित करके विषदोष को नष्ट करने में उपयोगी है। ओज वर्द्धक है तथा अग्निप्रदीप्त कर भूख बढ़ाती है। शारीरिक क्षीणता, पुराना बुखार, खांसी, श्वास और दिमागी कमजोरी में गुणकारी है। मात्रा 1/2 रत्ती शहद से।

वंग भस्म : धातु विकार, प्रमेह, स्वप्न दोष, कास, श्वास, क्षय, अग्निमांद्य आदि पर बल वीर्य बढ़ाती है। अग्निप्रदीप्त कर भूख बढ़ाती है तथा मूत्राशय की दुर्बलता को नष्ट करती है। मात्रा 1 से 2 रत्ती सुबह व शाम शहद या मक्खन से।

मण्डूर भस्म : जिगर, तिल्ली, शोथ, पीलिया, मंदाग्नि व रक्ताल्पता की उत्तम औषधि। मात्रा 2 रत्ती शहद से।

मयूर चन्द्रिका भस्म : हिचकी और श्वास (दमा) में अत्यंत गुणकारी है। वमन (उल्टी) व चक्कर आदि में लाभकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से।

माणिक्य पिष्टी : समस्त शारीरिक और मानसिक विकारों को नष्ट कर शरीर की सब धातुओं को पुष्ट करती है और बुद्धि को बढ़ाती है। मात्रा 1/2 रत्ती से 2 रत्ती तक।
मुक्ता (मोती) भस्म : शारीरिक और मानसिक पुष्टि प्रदान करने वाली प्रसिद्ध दवा है। चित्त भ्रम, घबराहट, धड़कन, स्मृति भंग, अनिद्रा, दिल-दिमाग में कमजोरी, रक्त पित्त, अम्ल पित्त, राजयक्षमा, जीर्ण ज्वर, उरुःक्षत, हिचकी आदि की श्रेष्ठ औषधि। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती
तक।

मुक्ता शुक्ति भस्म : रक्त पित्त, जीर्ण ज्वर, दाह, धातुक्षय, तपेदिक, मृगी, खांसी, यकृत, प्लीहा व गुल्म नाशक। मात्रा 2 रत्ती शहद से प्रातः व सायं।

मुक्ता (मोती) पिष्टी : मुक्ता भस्म के समान गुण वाली तथा शीतल मात्रा। 1/2 से 1 रत्ती शहद या अनार के साथ।

मुक्ता शुक्ति पिष्टी : मुक्ता शुक्ति भस्म के समान गुणकारी तथा प्रदर पर लाभकारी।

मृगश्चृ (बारहसिंगा) भस्म : निमोनिया, पार्श्वशूल, हृदय रोग, दमा, खांसी में विशेष लाभदायक, बालकों की हड्डी बनाने में सहायक है। वात, कफ, प्रधान ज्वर, (इन्फ्लूएंजा) में गुणकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से।

यशद भस्म : कफ पित्तनाशक है। पांडू, श्वास, खांसी, जीर्णज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, संग्रहणी आदि रोगों में लाभदायक। मात्रा 1 रत्ती शहद से।

रजत (रौप्य, चांदी) भस्म : शारीरिक व मानसिक दुर्बलता में लाभदायक है। वात, पित्तनाशक, नसों की कमजोरी, नपुंसकता, प्रमेह, धारुत दौर्बल्य, क्षय आदि नाशक तथा बल और आयु को बढ़ाने वाली है। मात्रा 1 रत्ती प्रातः व सायं शहद या मक्खन से।

लौह भस्म : खून को बढ़ाती है। पीलिया, मंदाग्नि, प्रदर, पित्तविकार, प्रमेह, उदर रोग, लीवर, प्लीहा, कृमि रोग आदि नाशक है। व शक्ति वर्द्धक है। मात्रा 1 रत्ती प्रातः व सायं शहद और मक्खन के साथ।

लौह भस्म (शतपुटी) : यह साधारण भस्म से अधिक गुणकारी है।

शंख (कंबू) भस्म : कोष्ठ शूल, संग्रहणी, उदर विकार, पेट दर्द आदि रोगों में विशेष उपयोगी है। मात्रा 1 से 2 रत्ती प्रातः व सायं शहद से।

स्वर्ण माक्षिक भस्म : पित्त, कफ नाशक, नेत्रविकार, प्रदर, पांडू, मानसिक व दिमागी कमजोरी, सिर दर्द, नींद न आना, मूत्रविकार तथा खून की कमी में लाभदायक। मात्रा 1 से 2 रत्ती प्रातः व सायं शहद से।

स्वर्ण भस्म : इसके सेवन से रोगनाशक शक्ति का शरीर में संचार होता है। यह शारीरिक और मानसिक ताकत को बढ़ाकर पुराने से पुराने रोगों को नष्ट करता है। जीर्णज्वर, राजयक्षमा, कास, श्वास, मनोविकार, भ्रम, अनिद्रा, संग्रहणी व त्रिदोष नाशक है तथा वाजीकर व ओजवर्द्धक है। इसके सेवन से बूढ़ापा दूर होता है और शक्ति एवं स्फूर्ति बनी रहती है। मात्रा 1/8 से 1/2 रत्ती तक।

संगेयशव पिष्टी : दिल व मेदे को ताकत देती है। पागलपन नष्ट करती है तथा अंदरूनी जख्मों को भरती है। मात्रा 2 से 8 रत्ती शर्बत अनार के साथ।

हजरूल यहूद भस्म : पथरी रोग की प्रारंभिक अवस्था में देने से पथरी को गलाकर बहा देती है। पेशाब साफ लाती है और मूत्र कृच्छ, पेशाब की जलन आदि को दूर करती है। मात्रा 1 से 4 रत्ती दूध की लस्सी अथवा शहद से।

हजरूल यहूद पिष्टी : अश्मीर (पथरी) में लाभकारी तथा मूत्रल।

हाथीदांत (हस्तिदंतमसी) भस्म : बालों का झड़ना रोकती है तथा नए बाल पैदा करती है। प्रयोग विधि : खोपरे के तेल के साथ मिलाकर लगाना चाहिए।

त्रिवंग भस्म : प्रमेह, प्रदर व धातु विकारों पर। गदला गंदे द्रव्ययुक्त और अधिक मात्रा में बार-बार पेशाब होने पर इसका उपयोग विशेष लाभदायक है। धातुवर्द्धक तथा पौष्टिक है। मात्रा 1 से 3 रत्ती।

आयुर्वेद रस-रसायन, वटी व गोलियाँ

अगस्ति सूतराज रस : संग्रहणी अतिसार, आमांश शूल व मंदाग्नि में। मात्रा 1 रत्ती प्रातः व सायं भुना जीरा, मठा या शहद में।

अग्नि तुंडी वटी : मंदाग्नि, पेट फूलना व हाजमे के लिए तथा अजीर्ण के दस्त बंद करती है। मात्रा 1 से 3 रत्ती।

अग्नि कुमार रस : अजीर्ण, मंदाग्नि एवं पेट दर्द आदि में। मात्रा 1 से 3 रत्ती।

अजीर्ण कंटक रस : अजीर्ण व हैजे में। मात्रा 1 से 3 रत्ती तक प्याज व अदरक रस के साथ।

अर्श कुठार रस : बवासीर व पद्धकोष्ठ में हल्का दस्तावर है। मात्रा 2 रत्ती शहद में।

आनंद भैरव रस : सन्निपात ज्वर, अतिसार, जीर्ण ज्वर, सर्दी, जुकाम, खाँसी व आमवातादि रोगों में। मात्रा 1 से 2 गोली शहद व पान के रस में।

आमवतारि रस : आमवात विकार के कारण शरीर के दर्द में लाभकारी। मात्रा 1 से 4 गोली गर्म पानी में अथवा दूध से।

आरोग्यवर्द्धिनी वटी नं.1 : पाचक, दीपक, मेदनाशक, मलावरोध, जीर्ण ज्वर, रक्त विकार, शोथ व यकृत रोगों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 गोली रात्रि को ठंडे जल के साथ।

इच्छाभेदी रस : यह तीव्र दस्तावार है, शूल रोग मल का रुकना तथा पेट फूलने आदि पर लाभकारी है। तीन-चार दस्त लाकर पेट साफ करती है। मात्रा 1 से 2 गोली रात्रि को ठंडे जल के साथ।

एकांगवीर रस : गृध्रसी, विकलांगता आदि तीव्र वात विकारों में लाभदायक। अंगों में आई अशक्तता को दूर करने में लाभदायक। मात्रा 1 से 2 रत्ती।

एलादि वटी : सूखी खांसी, पुरानी खांसी, दमा, रक्त पित्त (मुंह से खून गिरना), वमन, स्वरभेद (गला बैठना), प्यास आदि में लाभकारी यह संग्राहक, वेदनाशामक तथा निद्राप्रदायक है। गले की खराबी, टांसिल फूलने में फायदेमंद। मात्रा 2 से 4 गोली चूसना चाहिए।

कफकुठार रस : कफ के अधिक गिरने तथा खाँसी और दमा में लाभकारी। सर्दी व जुकाम के बुखार में मात्रा 1 रत्ती शहद व पानी के साथ।

कफकेतू रस : कफजन्य बुखार, दमा, खाँसी, पीनस, गले के रोग, दाँत-कान व नेत्र रोगों पर, जुकाम आदि में लाभकारी। मात्रा 1 रत्ती शहद व पानी के रस में।

कर्पूर रस : पतले दस्त, संग्रहणी, ज्वरातिसार आदि में लाभकारी। यह संग्राहक तथा निद्राप्रदायक दवा है। मात्रा 1 -1 रत्ती तीन बार छोटे बच्चों को 1/4 रत्ती।
कल्पतरू रस : खाँसी, क्षय, श्वास, बुखार, अजीर्ण, मुख रोग व कफ ज्वर नाशक है। मात्रा 2 रत्ती शहद व अदरक के साथ।

काम दूधा रस : रक्त पित्त, अम्ल पित्त, वमन, पित्त वृद्धि, भ्रम आदि पित्त विकारों में लाभकारी। मात्रा 2 से 6 रत्ती।

काम दुधा (मौक्तिक युक्त) : पित्तजन्य समस्त रोगों में लाभदायक। रक्त पित्त, अम्ल पित्त, गर्भवती के वमन एवं रक्त स्राव आदि में लाभकारी। मात्रा 1-1 रत्ती दिन में तीन समय।

कामिनी विद्रावण रस : शुक्रवर्द्धक एवं स्तंभन शक्तिवर्द्धक। मात्रा 1 से 2 गोली रात को दूध में।

कुमार कल्याण रस (स्वर्णयुक्त) : बच्चों के सभी रोग, जैसे ज्वर, खाँसी, श्वास, उल्टी, दस्त होना, दूध डालना, सूखा रोग, पसली चलना आदि में शीघ्र लाभकारी तथा बच्चों को बलवान बनाता है। मात्रा 1/4 रत्ती सुबह व शाम मां के दूध के साथ।

कुटजघन वटी : ज्वर, अतिसार और संग्रहणी में पतले दस्त होने पर लाभकारी। मात्रा 2 से 4 रत्ती।

क्रव्याद रस (वृहत) : मंदाग्नि मूलक रोगों एवं उदर रोगों में लाभदायक। अत्यंत अग्निदीपक, शूल, बादी से पैदा गाँठें व कब्जियत पर लाभकारी। मात्रा 2 से 4 रत्ती।

कृमि कुठार रस : पेट के कीड़ों को नष्ट करता है। मात्रा 2 से 4 रत्ती सुबह-शाम वायविडंग के काढ़े के साथ।

कांकयन वटी : खूनी बवासीर व बादी दोनों में लाभकारी। मात्रा 2 गोली सुबह-शाम।

खादिरादि वटी : स्वर भंग, खाँसी, मुँह में छाले पड़ना, होठों के विकार में गोली चूसने पर आराम मिलता है। खून की गर्मी नष्ट करती है।

गर्भपाल रस : गर्भपात एवं गर्भ के कारण होने वाले वमन, अरुचि आदि में लाभकारी तथा गर्भ पोषक है। मात्रा 1 से 2 रत्ती सुबह-शाम शहद से।

गर्भ चिंतामणि रस वृहत (स्वार्णयुक्त) : असमय तथा बार-बार गर्भ का गिरना, गर्भ के कारण उत्पन्न रोगों में लाभकारी। इससे गर्भ की रक्षा तथा पोषण होता है। गर्भिणियों के ज्वर, दाह, आदि के लिए उपयुक्त। मात्रा 1 से 2 रत्ती।

गुडुत्ती (गिलोय) सत्व : जीर्ण ज्वर, रक्तपित्त, प्रमेह, पांडू तथा जलन आदि में लाभप्रद। मात्रा 2 से 6 रत्ती।
गंधक वटी : रक्त शोधक, अजीर्ण, अतिसार, संग्रहणी, हैजा, वायुगोला व पेट के रोगों में लाभकारी। मात्रा 2 से 4 गोली भोजन के बाद गर्म जल के साथ।

गंधक रसायन : सब प्रकार के रक्त विकार, कुष्ठ रोग, खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी, चकत्ता, वातरक्त आदि रक्त एवं चर्म रोगों को दूर करता है। रसायन पुष्टिकारक तथा पाचन अग्नि बढ़ाने में उपयोगी है। मात्रा 1 से 4 रत्ती सुबह-शाम दूध से।

ग्रहणी कपाट रस : संग्रहणी, अतिसार, मंदाग्नि, आमातिसार व अजीर्ण के दस्त दूर करता है। मात्रा 1 से 2 रत्ती सुबह-शाम जीरा, जायफल व शहद से।

चन्दनादि वटी : प्रमेह आदि में, पेशाब की जलन को दूर कर पेशाब खुलकर लाती है। पेशाब में मवाद आना, पुराना सुजाक आदि रोगों में लाभकारी। मात्रा 1-1 गोली दिन में तीन बार पानी अथवा दूध की लस्सी से।

चन्द्रप्रभा रस : असंयमजनित सभी प्रकार के विकार, मूत्राशय की दुर्बलता, स्नायु दौर्बल्य, सब प्रकार के प्रमेह, पथरी, सुजाक, मूत्र दोष, धातु क्षीणता, पेशाब में धातु जाना, प्रदर व रजोधर्म संबंधी रोगों में अत्यंत लाभकारी। मात्रा 1 से 2 गोली प्रातः व सायं दूध के साथ

चन्द्रकला रस (मौक्तिक युक्त) : रक्त पित्त, रक्त स्राव, दाह, वमन एवं अन्यान्य पित्त विकारों में लाभकारी। मात्रा 1/2 सुबह व शाम।

चन्द्रामृत वटी : जुकाम व गले की खराब से खाँसी, श्वास, रक्तपित्त, प्यास, जीर्ण ज्वर आदि में मात्रा 1 से 3 रत्ती।

चन्द्रोदय वर्ती : तिमिर, मांस, वृद्धि, मोतियाबिंद, रतौंधी, फूला, नेत्र के दाने व पटलनाशक में लें। गुलाब जल या पानी में घिसकर लगाना।

चतुर्मुख रस (स्वर्णयुक्त) : समस्त प्रकार के वायु स्नायु रोग, दौर्बल्य, मानसिक विकार, शारीरिक क्षीणता, मूत्र विकार, पुराना बुखार, खांसी, अम्लपित्त, प्रसूत ज्वर आदि में लाभकारी। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती दिन में दो बार।

चिंतामणि रस (स्वर्णयुक्त) : मानसिक विकार को दूर कर रक्त संचार को नियमित करता है। अनिद्रा, घबराहट, भ्रम आदि में उपयोगी। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती दिन में दो बार।

चित्रकादि वटी : पाचन शक्ति की कमी, अरुचि, आंव, पेचिश, संग्रहणी, रोसेज आदि रोगों को दूर करती है। मात्रा 2 से 4 गोली भोजन के बाद।

ज्वरांकुश रस : नया बुखार, विषम ज्वर, पारी से आने वाले बुखार में अत्यंत लाभकारी एवं मल शोधक। मात्रा 1 से 2 रत्ती नीबू के रस या शहद में।

जलोदरारि रस : जलोदर रोग से शरीर में एकत्रित जल को सुखाती तथा बाहर निकालती है और फिर संचय नहीं होने देती है तथा दस्तावर भी है। यकृत वृद्धि व उदर रोगों पर लाभकारी। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद में।

जयमंगल रस (स्वर्णयुक्त) : जीर्ण ज्वर, धातुगत ज्वर और कठिन बुखारों में अत्यंत लाभकारी। मात्रा 1 से 2 रत्ती सतगिलोय, सितोपलादि चूर्ण व शहद के साथ।

जवाहर मोहरा (स्वर्णयुक्त) : दिल व दिमाग को ताकत देता है। घबराहट, चक्कर आना तथा बेचैनी में लाभकारी। मात्रा 1/2 रत्ती दिन में 2-3 बार शहद या फल के रस के साथ।

तालकेश्वर रस : रक्त विकार, खाज, खुजली, वात रक्त, उपदंश आदि में मात्रा 1/2 से 1 रत्ती शहद अथवा मक्खन के साथ।

तारकेश्वर रस : बार-बार पेशाब लगने अथवा पेशाब के साथ-साथ विभिन्न पदार्थों के निकलने की अवस्था में रस, रक्तादि धातुओं को बढ़ाकर शरीर को पुष्ट करता है। मात्रा 1 से 2 रत्ती।

आयुर्वेदिक काढ़े

आयुर्वेदिक दवाओं की जानकारी के अंतर्गत इस बार हम आयुर्वेदिक काढ़े की जानकारी दे रहे हैं।

दशमूल काढ़ा : विषम ज्वर, मोतीझरा, निमोनिया का बुखार, प्रसूति ज्वर, सन्निपात ज्वर, अधिक प्यास लगना, बेहोशी, हृदय पीड़ा, छाती का दर्द, सिर व गर्दन का दर्द, कमर का दर्द दूर करने में लाभकारी है व अन्य सूतिका रोग नाशक है।

महामंजिष्ठादि काढ़ा : समस्त चर्म रोग, कोढ़, खाज, खुजली, चकत्ते, फोड़े-फुंसी, सुजाक, रक्त विकार आदि रोगों पर विशेष लाभकारी है।

महासुदर्शन काढ़ा : विषम ज्वर, धातु ज्वर, जीर्ण ज्वर, मलेरिया बुखार आदि समस्त ज्वरों पर विशेष लाभकारी है, भूख बढ़ाता है तथा पाचन शक्ति बढ़ाता है। श्वास, खांसी, पांडू रोगों आदि में हितकारी। रक्त शोधक एवं यकृत उत्तेजक ।

महा रास्नादि काढ़ा : समस्त वात रोगों में लाभकारी। आमवात, संधिवात, सर्वांगवात, पक्षघात, ग्रध्रसी, शोथ, गुल्म, अफरा, कटिग्रह, कुब्जता, जंघा और जानु की पीड़ा, वन्ध्यत्व, योनी रोग आदि नष्ट होते हैं।

रक्त शोधक : सब प्रकार की खून की खराबियां, फोड़े-फुंसी, खाज-खुजली, चकत्ते, व्रण, उपदंश (गर्मी), आदि रोगों पर लाभकारी है तथा खून साफ करता है।

सामान्य मात्रा : 10 से 25 मिली तक बराबर पानी मिलाकर भोजन करने के बाद दोनों समय पिए जाते हैं।

विविध
अर्क अजवायन : पेट व आंतों के दर्द में लाभकारी। बदहजमी, अफरा, अजीर्ण, मंदाग्नि में लाभप्रद। दीपक तथा पाचक व जिगर की बीमारियों को दूर करता है।

अर्क दशमलव : प्रसूत ज्वर एवं सब प्रकार के वात रोगों में लाभदायक है।

अर्क सुदर्शन : अनेक तरह के बुखारों में लाभदायक है। पुराने बुखार, विषम ज्वर, त्रिदोष ज्वर, इकतारा, तिजारी बुखारों को नष्ट करता है।

अर्क सौंफ : भूख बढ़ाता है। आंव-पेचिस आदि में लाभदायक है। मेदा व जिगर की बीमारियों में फायदेमंद है। प्यास व अफरा कम करता है। पित्त, ज्वर, बदहजमी, शूल, नेत्ररोग आदि में लाभकारी है।

खमीरा गावजवां : दिल-दिमाग को ताकत देता है। घबराहट व चित्त की परेशानी दूर करता है। प्यास कम करता है, नेत्रों को लाभदायक है। खांसी, श्वास (दमा), प्रमेह आदि में लाभकारी। मात्रा 10 से 25 ग्राम सुबह-शाम चाटना चाहिए।

खमीरा सन्दल : अंदरूनी गर्मी को कम करता है, प्यास को कम करता है, दिल को ताकत देता है व खास तौर पर दिल की धड़कन को कम करता है। पैत्तिक दाह, मुंह सूखना, घबराहट, जलन, गर्मी से जी मिचलाना तथा मूत्र दाह में लाभकारी। शीतल व शांतिदायक। गर्भवती स्त्रियों के लाभदायक। मात्रा 10 से 25 ग्राम सुबह, दोपहर व शाम अर्क गावजवां के साथ या केवल चाटना चाहिए।

गुलकन्द प्रवाल युक्त : अत्यंत शीतल है। कब्ज दूर करता है व पाचन शक्ति बढ़ाता है। दिल, फेफड़े, मैदा व दिमाग को ताकत देता है। जिगर की सूजन व हरारत कम करता है। गर्भवती स्त्रियों के लिए विशेष लाभदायक है। गर्मी के मौसम में बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सबको इसका सेवन करना चाहिए। मात्रा 10 से 25 ग्राम सुबह शीतल जल या दूध के साथ लेना चाहिए।

माजून मुलैयन : हाजमा करके दस्त साफ लाने के लिए प्रसिद्ध माजून है। बवासीर के मरीजों के लिए श्रेष्ठ दस्तावर दवा। मात्रा रात को सोते समय 10 ग्राम माजून दूध के साथ।

सिरका गन्ना : पाचक, रुचिकारक, बलदायक, स्वर शुद्ध करने वाला, श्वास, ज्वर तथा वात नाशक। मात्रा 10 से 25 मि.ली. सुबह व शाम भोजन के बाद।

सिरका जामुन : यकृत (लीवर) व मेदे को लाभकारी। खाना हजम करता है, भूख बढ़ाता है, पेशाब लाता है व तिल्ली के वर्म को दूर करने की प्रसिद्ध दवा। मात्रा 10 से 25 मि.ली. सुबह व शाम भोजन के बाद।

आयुर्वेदिक औषधीय तेल

आयुर्वेदिक दवाओं की जानकारी में हम अभी तक अनेक प्रकार की दवाएँ तथा विभिन्न रोगों की दवाएँ बता चुके हैं। इसी कड़ी के अंतर्गत हम आयुर्वेदिक औषधीय तेलों की उपयोगी जानकारी दे रहे हैं।

अणु तेल : सिर का दर्द, आधा सीसी, पीनस, नजला, अर्दित, मन्यास्तम्भ आदि में लाभप्रद।

इरमेदादि तेल : दंत रोगों में लाभदायक। मसूढ़ों के रोग, मुंह से दुर्गन्ध आना, जीभ, तालू व होठों के रोगों में लाभप्रद। ब्रणोपचार के लिए उत्तम। प्रयोग विधि : मुख रोगों में मुंह में भरना अथवा दिन में तीन-चार बार तीली से लगाना।

काशीसादि तेल : व्रण शोधक तथा रोपण है। इसके लगाने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं। नाड़ी व्रण एवं दूषित व्रणों के उपचार हेतु लाभकारी। प्रयोग विधि : बवासीर में दिन में तीन चार बार गुदा में लगाना अथवा रूई भिगोकर रखना।

गुडुच्यादि तेल : वात रक्त, कुष्ठ रोग, नाड़ी व्रण, विस्फोट, विसर्प व पाद दाहा पर उपयुक्त।

चंदनबला लाशादि तेल : इसके प्रयोग से सातों धातुएं बढ़ती हैं तथा वात विकार नष्ट होते हैं। कास, श्वास, क्षय, शारीरिक क्षीणता, दाह, रक्तपित्त, खुजली, शिररोग, नेत्रदाह, सूजन, पांडू व पुराने ज्वर में उपयोगी है। दुबले-पतले शरीर को पुष्ट करता है। बच्चों के लिए सूखा रोग में लाभकारी। सुबह व रात्रि को मालिश करना चाहिए।

जात्यादि तेल : नाड़ी व्रण (नासूर), जख्म व फोड़े के जख्म को भरता है। कटे या जलने से उत्पन्न घावों को व्रणोपचार के लिए उत्तम। प्रयोग

विधि : जख्म को साफ करके तेल लगावें या कपड़ा भिगोकर बांधें।

नारायण तेल : सब प्रकार के वात रोग, पक्षघात (लकवा), हनुस्म्भ, कब्ज, बहरापन, गतिभंग, कमर का दर्द, अंत्रवृद्धि, पार्श्व शूल, रीढ़ की हड्डी का दर्द, गात्र शोथ, इन्द्रिय ध्वंस, वीर्य क्षय, ज्वर क्षय, दन्त रोग, पंगुता आदि की प्रसिद्ध औषधि। सेवन में दो-तीन बार पूरे शरीर में मालिश करना चाहिए। मात्रा 1 से 3 ग्राम दूध के साथ पीना चाहिए।

पंचगुण तेल : संधिवात, शरीर के किसी भी अवयव के दर्द में उपयोगी। कर्णशूल में कान में बूंदें डालें। व्रण उपचार में फाहा भिगोकर बांधे।

महाभृंगराज तेल : बालों का गिरना बंद करता है तथा गंज को मिटाकर बालों को बढ़ाता है। असमय सफेद हुए बालों को काला करता है। माथे को ठंडा करता है। प्रयोग विधि : सिर पर धीरे-धीरे मालिश करना चाहिए।
महानारायण तेल : नारायण तेल से अधिक लाभदायक है।

महामरिचादि तेल : खाज, खुजली, कुष्ठ, दाद, विस्फोटक, बिवाई, फोड़े-फुंसी, मुंह के दाग व झाई आदि चर्म रोगों और रक्त रोगों के लिए प्रसिद्ध तेल से त्वचा के काले व नीले दाग नष्ट होकर त्वचा स्वच्छ होती है। सुबह व रात्रि को मालिश करना चाहिए।

महामाष (निरामिष) : पक्षघात (लकवा), हनुस्तम्भ, अर्दित, पंगुता, शिरोग्रह मन्यास्तम्भ, कर्णनाद तथा अनेक प्रकार के वात रोगों पर लाभकारी।

महाविषगर्भ तेल : सब तरह के वात रोगों की प्रसिद्ध औषधि। जोड़ों की सूजन समस्त शरीर में दर्द, गठिया, हाथ-पांव का रह जाना, लकवा, कंपन्न, आधा सीसी, शरीर शून्य हो जाना, नजला, कर्णनाद, गण्डमाला आदि रोगों पर। सुबह व रात्रि मालिश करें।

महालाक्षादि तेल : सब प्रकार के ज्वर, विषम ज्वर, जीर्ण ज्वर व तपेदिक नष्ट करता है। कास, श्वास, प्रतिशाय (जुकाम), हाथ-पैरों की जलन, पसीने की दुर्गन्ध शरीर का टूटना, हड्डी के दर्द, पसली के दर्द, वात रोगों को नष्ट करता है। बल, वीर्य कांति बढ़ाता है तथा शरीर पुष्ट करता है। सुबह व रात्रि मालिश करना चाहिए।

मरिचादि तेल : महामरिचादि तेल के समान न्यून गुण वाला।

रोपण तेल : सब प्रकार के व्रणों (घाव) में ब्रणोपचार के लिए उत्तम। योनि रोग में उत्तर वस्ति में गुणकारी।

लाक्षादि तेल : महालाक्षादि तेल के समान न्यून गुण वाला।

विषगर्भ तेल : महाविषगर्भ तेल के समान न्यून गुण वाला।

षडबिंदु तेल : इस तेल के व्यवहार से गले के ऊपर के रोग जैसे सिर दर्द, सर्दी, (जुकाम), नजला, पीनस आदि में लाभ होता है। सेवन : दिन में दो-तीन बार 5-6 बूंद नाक में डालकर सूंघना चाहिए।

सैंधवादि तेल : सभी प्रकार के वृद्धि रोगों में इस तेल के प्रयोग से अच्छा लाभ होता है। आमवात, कमर व घुटने के दर्द आदि में उपयोगी है।

सोमराजी तेल : इस तेल की मालिश से रक्त विकार, खुजली, दाद, फोड़ा-फुंसी, चेहरे पर कालिमा आदि में फायदा होता है।

एरण्ड तेल : पेट के सुद्दों को दस्त के जरिये निकालता है। जोड़ों के दर्द में लाभकारी है।

जैतून तेल : त्वचा को नरम करता है तथा चर्म रोगों में जलन आदि पर लाभप्रद है।

नीम तेल : कृमि रोग, चर्म रोग, जख्म व बवासीर में लाभकारी।

बादाम तेल असली : दिमाग को ताकत देता है, नींद लाता है, सिर दर्द व दिमाग की खुश्की दूर करता है। मस्तिष्क का कार्य करने वालों को लाभप्रद है। अर्श रोगियों तथा गर्भवती स्त्रियों को लाभकारी। सेवन : सिर पर मालिश करें तथा 3 से 6 ग्राम तक दूध में डालकर पीना चाहिए।

दयाल तेल : गठिया का दर्द, पक्षघात (लकवा), कुलंगवात, अर्द्धगवात, चोट लगना, जोड़ों
का दर्द, कमर का दर्द तथा सब प्रकार के वात संबंधी दर्दों को शीघ्र दूर करता है।

बावची तेल : सफेद दाग (चकत्ते) तथा अन्य कुष्ट रोगों पर।

मालकंगनी तेल : वात व्याधियों में उपयुक्त।

लौंग तेल : सिर दर्द व दांत दर्द में अक्सीर है।

विल्व तेल कान दर्द, कान में आवाज तथा सनसनाहट होने पर बहरापन दूर करने में विशेष उपयोगी।

बीमारी के अनुसार दवाएँ

प्रत्येक मौसम में सेवन योग्य (शीतर, शांतिदायक, दिल व दिमाग को स्फूर्तिदायक, अधिक प्यास, गर्मी व सिर दर्द आदि से बचने के लिए) :गुलकन्द प्रवालयुक्त, मोती पिष्टी, प्रवाल पिष्टी, खमीरा संदल, शर्बत संदल, शर्बत अनार।

शरद ऋतु में विशेष रूप से सेवन योग्य (पौष्टिक) : बादाम पाक, बसंत, कुसुमाकर रस, च्यवनप्राश अवलेह (स्पेशल) दयाल तेल, दशमूलारिष्ट।

विषम ज्वर (मलेरिया) : पु.प. विषम ज्वरांतक लौह, सुदर्शन चूर्ण, महा सुदर्शन काढ़ा, अमृतारिष्ट, ज्वरांकुश रस, सत्व गिलोय।

वात श्लेष्मिक ज्वर (एन्फ्लूएन्जा) : त्रिभुवन कीर्ति रस, लक्ष्मी विलास रस, संजीवनी वटी, पीपल 64 प्रहरी, अमृतारिष्ट।

श्लीपद (हाथी पाँव) : नित्यनंद रस, मल्ल सिंदूर।

जीर्ण ज्वर व अन्य : स्वर्ण वसंत मालती, सितोपलादि चूर्ण, अमृतराष्टि, मत्युंजय रस, आनंद भैरव, गोदंती भस्म, सर्वज्वरहर लौह, संजीवनी, ज्वरांकुश रस, महालाक्षादि तेल।

तमक श्वास (दवा) : कफकेयर, च्यवनप्राश अवलेह, सितोपलादि चूर्ण, श्वासकास, चिंतामणि कनकासव, शर्बत वासा, वासारिष्ट, वासावलेह, मयूर चन्द्रिका भस्म, अभ्रक भस्म तेल।

कास रोग (कफ खांसी) : कफकेयर शर्बत वासा, वासावलेह, वासारिष्ट खदिरादि वटी, मरिचादि वटी, लवंगादि वटी, त्रिकुट चूर्ण, द्राक्षारिष्ट, एलादि वटी, कालीसादि चूर्ण, कफकेतु रस, अभ्रक भस्म, श्रृंगारभ्र रस, बबूलारिष्ट।

उर्ध्व रक्तपित्त (कफ के साथ अणवा उल्टी में खून आना) : कफकेयर, शर्बत वासा, कामदुधा रस मौ.यु. कहरवा पिष्टी, वासावलेह, प्रवाल पिष्टी, वासारिष्ट, बोलबद्ध चूर्ण, बोल पर्पटी, रक्त पित्तांतक लौह कुष्माण्ड अवलेह।

राजयक्षमा (टीबी) : स्वर्ण वसंत मालती, लक्ष्मी विलास रस, मृगांक रस, वृहत्‌ श्रृंगारभ्र रस, राजमृगांक रस, वासावलेह, द्राक्षासव, च्यवनप्राश अवलेह, महालक्ष्मी विलास रस।

पार्श्व शूल (प्लूरिसरी, फेफेड़ों में पानी भरना) : नारदीय लक्ष्मी विलास रस, स्वर्ण वसंत मालती, मृगश्रृंग भस्म, रस सिंदूर।

हिक्का रोग (हिचकी आना) : सूतशेखर स्वर्णयुक्त, मयूर चन्द्रिका भस्म, एलादि वटी, एलादि चूर्ण।

खालित्य (बालों का गिरना, गंजापन) : महाभृंगराज तेल, हस्तिदंतमसी, च्यवनप्राश अवलेह।

पालित्य (बाल सफेद होना) : महाभृंगराज तेल, भृंगराजसव, च्यवनप्राश।

विचर्चिका (छाजन, एग्जिमा) : चर्म रोगांतक मरहम, गुडुच्यादि तेल, रस माणिक्य, महामरिचादि तेल गंधक रसायन, त्रिफला चूर्ण, पुभष्पांजन, रक्त शोध, खदिरादिष्ट, महामंजिष्ठादि काढ़ा।

दद्रु (दाद, रिंगवर्म) : सोमराजी तेल, गंधक रसायन।

कुष्ठ (सफेद दाग) : सोगन बावची, खदिरादिष्ट, आरोग्यवर्द्धिनी वटी, रस माणिक्य, गंधक रसायन, चालमोगरा तेल, महामंजिष्ठादि क्वाथ।

शीत पित्त (पित्ती) : हरिद्राखंड, कामदुधा रस, आरोग्यवर्द्धिनी वटी, सूतशेखर रस।

पिदक (गर्मी की मरोरी, पसीना) : खमीरा संदल, प्रवालयुक्त, गुलकन्द, प्रवाल पिष्टी, जहर मोहरा पिष्टी, सारिवाद्यासव।

खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी, रक्त विकार : रक्त शोधक, खदिराष्टि, महामंजिष्ठादि काढ़ा, सारिवाद्यासव, महामरिचादि तेल, रोगन नीम, गंधक रसायन, केशर गूगल, आरोग्यवर्द्धनी, जात्यादि तेल, चर्मरोगांतक मरहम,पुष्पांजन।

ऐरोमाथैरेपी खुशबू से उपचार

पेट के ऊपर दर्द
पेट के ऊपरी भाग में दर्द की स्थिति में तीन बूँदें पिपरमेंट ऑइल, दो बूँदें क्लोव ऑइल तथा एक बूँद यूकेलिप्टस ऑइल के मिश्रण में एक चम्मच वेजीटेबल ऑइल मिलाकर मालिश करने से लाभ होता है। दर्द यदि पेट के निचले हिस्से में हो तो दो बूँद जिरेनियम ऑइल, दो बूँद रोजमेरी ऑइल व एक बूँद जिंजर ऑइल में एक चम्मच वेजीटेबल ऑइल डालकर दर्द वाले भाग पर हल्के हाथ की मालिश की जा सकती है।

दाँतों का पोषण
दाँतों की उचित सफाई न रखने व अच्छे पोषण के अभाव से कई बार दाँतों में खून लगता है। इस स्थिति में एक लीटर गुनगुने पानी में एक चम्मच ब्रैंडी, दो बूँद लेमन ऑइल, एक बूँद लेवेंडर ऑइल व एक बूँद यूकेलिप्टस ऑइल मिलाकर कुल्ला करने से फायदा होगा। इस मिश्रण को पिएँ नहीं।

नकसीर फूटनागर्मियों में नकसीर फूटना या नाक से खून आना एक आम समस्या है। इसके लिए पीठ के बल सीधे लेट जाएँ और एक टिशु पेपर पर एक बूँद साइप्रस ऑइल, एक बूँद लेवेन्डर ऑइल, दो बूँद लेमन ऑइल व एक बूँद रोज ऑइल डालकर सूँघने से राहत मिलेगी। छोटे-मोटे साधारण घाव व फोड़े-फुंसियों के उपचार के लिए दो बूँद लैवेंडर ऑइल, एक बूँद कैमोमाइल ऑइल व एक बूँद टी ट्री ऑइल के मिश्रण को एक कप गुनगुने पानी में मिलाकर दिन में दो बार घाव को धोएँ। घाव या फुंसी को धूल-मिट्टी से जरूर बचाएँ।

फिशर
गुदा का फिशर होने पर दो लीटर गुनगुने पानी में पाँच बूँदें लेवेंडर, दो बूँदें जिरोनियम व दो बूँदें लेमन ऑइल डालकर गुदा वाले भाग को धोएँ। उसके बाद ये सभी एसेंशियल ऑइल एलोवीरा जेल में मिलाकर प्रभावित भाग के चारों ओर मालिश करें। घर में भारी सामान उठाते समय, नृत्य या व्यायाम करते समय, हाथ या पैरों की मांसपेशियाँ खिंच जाने से हाथ या पैर में मोच आ सकती है। ऐसी स्थिति में किसी भी बेस ऑइल की तीस मि.ग्रा. मात्रा लेकर उसमें पाँच बूँद ब्लैक पेपर ऑइल, पंद्रह बूँद यूकेलिप्टस ऑइल, पाँच बूँद जिंजर ऑइल व नट मेग ऑइल मिलाकर दिन में तीन बार मालिश करें। साथ ही ठंडी मसाज भी फायदेमंद होगी।

रजोनिवृत्तिरजोनिवृत्ति के समय महिलाओं के स्वभाव में परिवर्तन हो जाना एक आम समस्या है। वास्तव में रजोनिवृत्ति के समय रक्त नलिकाओं में अनियमितता आ जाने के कारण या तेज गर्मी की वजह से अक्सर महिलाएँ चिड़चिड़ी व बेचैन हो जाती हैं। 30 मिलीग्राम बेस ऑइल में छः बूँद लेमन ऑइल, दस बूँद क्लैरी सेज ऑइल, 9 बूँद जिरेनियम ऑइल व पाँच बूँदें इवनिंग प्राइमरोज ऑइल मिलाएँ व संपूर्ण शरीर की मालिश करें। नहाने के पानी में भी इस मिश्रण का प्रयोग करें। ऐसे वक्त में चाय-कॉफी व अन्य गर्म पेय पदार्थों का सेवन बंद कर देना चाहिए।

नींद न आना
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद न आना भी एक आम समस्या है। इसके कारण शारीरिक या मानसिक दोनों हो सकते हैं। शरीर की मालिश या नहाने के पानी में कुछ तेलों के प्रयोग से यह समस्या दूर हो सकती है। तीस मिलीग्राम बेस ऑइल में पाँच बूँद कैमोमाइल ऑइल, पाँच बूँद मेजोरम ऑइल, पंद्रह बूँद सैंडल वुड ऑइल तथा पाँच बूँद क्लैरीसेज ऑइल मिलाकर मालिश करने से आराम मिलता है। मालिश करते समय ध्यान दें कि मालिश पूरी पीठ, गले तथा कंधों आदि पर अच्छी तरह करें। नहाने के पानी में इस मिश्रण का प्रयोग करते समय जाँच लें कि नहाने के पानी का तापमान साधारण हो, न तो गर्म और न ही ठंडा।

चूँकि प्रत्येक व्यक्ति न केवल मानसिक अपितु शारीरिक क्षमता में भी दूसरों से भिन्न होता है इसलिए जरूरी है कि उपरोक्त किसी भी चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करने से पूर्व अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

तेल बहुत उपयोगी
घर में प्रयोग किए जा सकने वाले तेल विभिन्न प्रकार से इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जैसे मालिश में, नहाने के पानी में या भाप के पानी में आदि। शरीर से दूषित पदार्थों के निष्कासन में ये तेल बहुत उपयोगी होते हैं जैसे एंटीसेप्टिक, एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगस, एंटीन्यूरालाजिक, एंटीडिपरेसेंट, रक्टी, रूमेटिक, डियोडराइजिंग आदि। एसेंशियल ऑइल को भाप विधि के द्वारा निकाला जाता है। जैसे लैवेंडर के लगभग एक सौ किलो पौधे से लगभग तीन किलो तेल प्राप्त किया जा सकता है। इन एसेंशियल तेलों का प्रयोग सदैव बेस ऑइल के साथ मिलाकर किया जाता है।

विभिन्न प्रकार के तेलों को बेस ऑइल के रूप में लिया जा सकता है जैसे वेजीटेबल ऑइल, एप्रीकाट ऑइल, मीठा बादाम तेल आदि। एसेंशियल ऑइल की मात्रा के अनुसार बेस ऑइल की मात्रा भी बदलती रहती है। जैसे एक बूँद एसेंशियल ऑइल में एक मि.ली. बेस ऑइल, चार से दस बूँद में दस मि.ली. बेस ऑइल और छः से पंद्रह बूँद में पंद्रह मि.ली. बेस ऑइल का प्रयोग किया जाता है।

आयुर्वेदिक चूर्ण

हम इससे पहले आयुर्वेदिक दवाओं में गोलियों, वटियों भस्म व पिष्टी की जानकारी आपको दे चुके हैं। आयुर्वेद के कुछ चूर्ण, जो दैनिक जीवन में बहुत उपयोगी हैं, की जानकारी दी जा रही है-

अश्वगन्धादि चूर्ण : धातु पौष्टिक, नेत्रों की कमजोरी, प्रमेह, शक्तिवर्द्धक, वीर्य वर्द्धक, पौष्टिक तथा बाजीकर, शरीर की झुर्रियों को दूर करता है। मात्रा 5 से 10 ग्राम प्रातः व सायं दूध के साथ।

अविपित्तकर चूर्ण : अम्लपित्त की सर्वोत्तम दवा। छाती और गले की जलन, खट्टी डकारें, कब्जियत आदि पित्त रोगों के सभी उपद्रव इसमें शांत होते हैं। मात्रा 3 से 6 ग्राम भोजन के साथ।

अष्टांग लवण चूर्ण : स्वादिष्ट तथा रुचिवर्द्धक। मंदाग्नि, अरुचि, भूख न लगना आदि पर विशेष लाभकारी। मात्रा 3 से 5 ग्राम भोजन के पश्चात या पूर्व। थोड़ा-थोड़ा खाना चाहिए।

आमलकी रसायन चूर्ण : पौष्टिक, पित्त नाशक व रसायन है। नियमित सेवन से शरीर व इन्द्रियां दृढ़ होती हैं। मात्रा 3 ग्राम प्रातः व सायं दूध के साथ।

आमलक्यादि चूर्ण : सभी ज्वरों में उपयोगी, दस्तावर, अग्निवर्द्धक, रुचिकर एवं पाचक। मात्रा 1 से 3 गोली सुबह व शाम पानी से।

एलादि चूर्ण : उल्टी होना, हाथ, पांव और आंखों में जलन होना, अरुचि व मंदाग्नि में लाभदायक तथा प्यास नाशक है। मात्रा 1 से 3 ग्राम शहद से।

गंगाधर (वृहत) चूर्ण : अतिसार, पतले दस्त, संग्रहणी, पेचिश के दस्त आदि में। मात्रा 1 से 3 ग्राम चावल का पानी या शहद से दिन में तीन बार।

जातिफलादि चूर्ण : अतिसार, संग्रहणी, पेट में मरोड़, अरुचि, अपचन, मंदाग्नि, वात-कफ तथा सर्दी (जुकाम) को नष्ट करता है। मात्रा 1.5 से 3 ग्राम शहद से।

दाडिमाष्टक चूर्ण : स्वादिष्ट एवं रुचिवर्द्धक। अजीर्ण, अग्निमांद्य, अरुचि गुल्म, संग्रहणी, व गले के रोगों में। मात्रा 3 से 5 ग्राम भोजन के बाद।

चातुर्जात चूर्ण : अग्निवर्द्धक, दीपक, पाचक एवं विषनाशक। मात्रा 1/2 से 1 ग्राम दिन में तीन बार शहद से।

चातुर्भद्र चूर्ण : बालकों के सामान्य रोग, ज्वर, अपचन, उल्टी, अग्निमांद्य आदि पर गुणकारी। मात्रा 1 से 4 रत्ती दिन में तीन बार शहद से।

चोपचिन्यादि चूर्ण : उपदंश, प्रमेह, वातव्याधि, व्रण आदि पर। मात्रा 1 से 3 ग्राम प्रातः व सायं जल अथवा शहद से।
तालीसादि चूर्ण : जीर्ण, ज्वर, श्वास, खांसी, वमन, पांडू, तिल्ली, अरुचि, आफरा, अतिसार, संग्रहणी आदि विकारों में लाभकारी। मात्रा 3 से 5 ग्राम शहद के साथ सुबह-शाम।

दशन संस्कार चूर्ण : दांत और मुंह के रोगों को नष्ट करता है। मंजन करना चाहिए।

नारायण चूर्ण : उदर रोग, अफरा, गुल्म, सूजन, कब्जियत, मंदाग्नि, बवासीर आदि रोगों में तथा पेट साफ करने के लिए उपयोगी। मात्रा 2 से 4 ग्राम गर्म जल से।

पुष्यानुग चूर्ण : स्त्रियों के प्रदर रोग की उत्तम दवा। सभी प्रकार के प्रदर, योनी रोग, रक्तातिसार, रजोदोष, बवासीर आदि में लाभकारी। मात्रा 2 से 3 ग्राम सुबह-शाम शहद अथवा चावल के पानी में।

पुष्पावरोधग्न चूर्ण : स्त्रियों को मासिक धर्म न होना या कष्ट होना तथा रुके हुए मासिक धर्म को खोलता है। मात्रा 6 से 12 ग्राम दिन में तीन समय गर्म जल के साथ।

पंचकोल चूर्ण : अरुचि, अफरा, शूल, गुल्म रोग आदि में। अग्निवर्द्धक व दीपन पाचन। मात्रा 1 से 3 ग्राम।

पंचसम चूर्ण : कब्जियत को दूर कर पेट को साफ करता है तथा पाचन शक्ति और भूख बढ़ाता है। आम शूल व उदर शूल नाशक है। हल्का दस्तावर है। आम वृद्धि, अतिसार, अजीर्ण, अफरा, आदि नाशक है। मात्रा 5 से 10 ग्राम सोते समय पानी से।

यवानिखांडव चूर्ण : रोचक, पाचक व स्वादिष्ट। अरुचि, मंदाग्नि, वमन, अतिसार, संग्रहणी आदि उदर रोगों पर गुणकारी। मात्रा 3 से 6 ग्राम।

लवणभास्कर चूर्ण : यह स्वादिष्ट व पाचक है तथा आमाशय शोधक है। अजीर्ण, अरुचि, पेट के रोग, मंदाग्नि, खट्टी डकार आना, भूख कम लगना। आदि अनेक रोगों में लाभकारी। कब्जियत मिटाता है और पतले दस्तों को बंद करता है। बवासीर, सूजन, शूल, श्वास, आमवात आदि में उपयोगी। मात्रा 3 से 6 ग्राम मठा (छाछ) या पानी से भोजन के पूर्व या पश्चात लें।

लवांगादि चूर्ण : वात, पित्त व कफ नाशक, कंठ रोग, वमन, अग्निमांद्य, अरुचि में लाभदायक। स्त्रियों को गर्भावस्था में होने वाले विकार, जैसे जी मिचलाना, उल्टी, अरुचि आदि में फायदा करता है। हृदय रोग, खांसी, हिचकी, पीनस, अतिसार, श्वास, प्रमेह, संग्रहणी, आदि में लाभदायक। मात्रा 3 ग्राम सुबह-शाम शहद से।
व्योषादि चूर्ण : श्वास, खांसी, जुकाम, नजला, पीनस में लाभदायक तथा आवाज साफ करता है। मात्रा 3 से 5 ग्राम सायंकाल गुनगुने पानी से।

शतावरी चूर्ण : धातु क्षीणता, स्वप्न दोष व वीर्यविकार में, रस रक्त आदि सात धातुओं की वृद्धि होती है। शक्ति वर्द्धक, पौष्टिक, बाजीकर तथा वीर्य वर्द्धक है। मात्रा 5 ग्राम प्रातः व सायं दूध के साथ।

स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण (सुख विरेचन चूर्ण) : हल्का दस्तावर है। बिना कतलीफ के पेट साफ करता है। खून साफ करता है तथा नियमित व्यवहार से बवासीर में लाभकारी। मात्रा 3 से 6 ग्राम रात्रि सोते समय गर्म जल अथवा दूध से।

सारस्वत चूर्ण : दिमाग के दोषों को दूर करता है। बुद्धि व स्मृति बढ़ाता है। अनिद्रा या कम निद्रा में लाभदायक। विद्यार्थियों एवं दिमागी काम करने वालों के लिए उत्तम। मात्रा 1 से 3 ग्राम प्रातः -सायं मधु या दूध से।

सितोपलादि चूर्ण : पुराना बुखार, भूख न लगना, श्वास, खांसी, शारीरिक क्षीणता, अरुचि जीभ की शून्यता, हाथ-पैर की जलन, नाक व मुंह से खून आना, क्षय आदि रोगों की प्रसिद्ध दवा। मात्रा 1 से 3 गोली सुबह-शाम शहाद से।

सुदर्शन (महा) चूर्ण : सब तरह का बुखार, इकतरा, दुजारी, तिजारी, मलेरिया, जीर्ण ज्वर, यकृत व प्लीहा के दोष से उत्पन्न होने वाले जीर्ण ज्वर, धातुगत ज्वर आदि में विशेष लाभकारी। कलेजे की जलन, प्यास, खांसी तथा पीठ, कमर, जांघ व पसवाडे के दर्द को दूर करता है। मात्रा 3 से 5 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ।

सुलेमानी नमक चूर्ण : भूख बढ़ाता है और खाना हजम होता है। पेट का दर्द, जी मिचलाना, खट्टी डकार का आना, दस्त साफ न आना आदि अनेक प्रकार के रोग नष्ट करता है। पेट की वायु शुद्ध करता है। मात्रा 3 से 5 ग्राम घी में मिलाकर भोजन के पहले अथवा सुबह-शाम गर्म जल से भोजन के बाद।

सैंधवादि चूर्ण : अग्निवर्द्धक, दीपन व पाचन। मात्रा 2 से 3 ग्राम प्रातः व सायंकाल पानी अथवा छाछ से।

हिंग्वाष्टक चूर्ण : पेट की वायु को साफ करता है तथा अग्निवर्द्धक व पाचक है। अजीर्ण, मरोड़, ऐंठन, पेट में गुड़गुड़ाहट, पेट का फूलना, पेट का दर्द, भूख न लगना, वायु रुकना, दस्त साफ न होना, अपच के दस्त आदि में पेट के रोग नष्ट होते हैं तथा पाचन शक्ति ठीक काम करती है। मात्रा 3 से 5 ग्राम घी में मिलाकर भोजन के पहले अथवा सुबह-शाम गर्म जल से भोजन के बाद।

त्रिकटु चूर्ण : खांसी, कफ, वायु, शूल नाशक, व अग्निदीपक। मात्रा 1/2 से 1 ग्राम प्रातः-सायंकाल शहद से।

त्रिफला चूर्ण : कब्ज, पांडू, कामला, सूजन, रक्त विकार, नेत्रविकार आदि रोगों को दूर करता है तथा रसायन है। पुरानी कब्जियत दूर करता है। इसके पानी से आंखें धोने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। मात्रा 1 से 3 ग्राम घी व शहद से तथा कब्जियत के लिए 5 से 10 ग्राम रात्रि को जल के साथ।

श्रृंग्यादि चूर्ण : बालकों के श्वास, खांसी, अतिसार, ज्वर में। मात्रा 2 से 4 रत्ती प्रातः-सायंकाल शहद से।

अजमोदादि चूर्ण : जोड़ों का दुःखना, सूजन, अतिसार, आमवात, कमर, पीठ का दर्द व वात व्याधि नाशक व अग्निदीपक। मात्रा 3 से 5 ग्राम प्रातः-सायं गर्म जल से अथवा रास्नादि काढ़े से।

अग्निमुख चूर्ण (निर्लवण) : उदावर्त, अजीर्ण, उदर रोग, शूल, गुल्म व श्वास में लाभप्रद। अग्निदीपक तथा पाचक। मात्रा 3 ग्राम प्रातः-सायं उष्ण जल से।

माजून मुलैयन : हाजमा करके दस्त साफ लाने के लिए प्रसिद्ध माजून है। बवासीर के मरीजों के लिए श्रेष्ठ दस्तावर दवा। मात्रा रात को सोते समय 10 ग्राम माजून दूध के साथ।

पुरूषों में बढता हेयरफाल, पाएं निजात

हेयरफाल का जितना खतरा महिलाओं को होता है, उससे कहीं ज्यादा पुरूषौं को होता है। हालांकि बालों का झडना एक आम समस्या है पर कम उम्र में बाल झडना किसी मुसीबत से कम नहीं है। लेकिन समय रहते यदि उपाय किए जाएं तो इस समस्या से बचा जा सकता है।
1. हेयरविशेषज्ञों के अनुसार 30 की उम्र के बाद हेयरफाल का जितना खतरा महिलाओं को होता है, पुरूषों में भी इस उम्र के बाद हेयरफाल की समस्या हो जाती है। कई बार तो कम उम्र में बाल झडना शुरू हो जाते हैं और कम उम्र में ही गंजेपन की समस्या से सामना करना पडता है। 60 का पडाव पार करने तक ऎसे पुरूष बिलकुल गंजे हो सकते हैं।
2. पुरूषों में भी फैशन का क्रेज बढता जा रहा है। ऎसे में पुरूष अपनी गर्लफ्रैंड या पत्नियों के सौंदर्य प्रसाधनौं का इस्तेमाल करते हैं। उनका तेल और कंडीशनर यूज करते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि जो तेल, शैम्पू आपकी गर्लफ्रैंड या पत्नी को सूट करता है वह आपको भी करे। यदि आपको बालो संबंधी कोई समस्या हो तो सबसे पहले हेयर एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
3. एंटीडैंड्रफ शैंपू का ज्यादा प्रयोग न करें। क्योकी एंटीडैंड्रफ शैंपू का ज्यादा प्रयोग सिर की नेचुरल नमी को खत्म कर देता है।
4. गंदे बालों पर जैल या कोई हेयर स्प्रे न करें। ऎसा करना आपकी बालों की सेहत के लिएहानिकारक हो सकता है।
5. बालों को कभी-कभी शैंपू करें। साथ ही गर्दन तक शैंपू का प्रयोग करें। उंगलियौं के पोरों से हल्के-हल्के शैंपू से मसाज करें। ऎसा करने से आपके सिर का ब्लड सर्कुलेशन बढेगा।
6. हर समय कैप पहनने से बचें। कैप पहनने से पसीना, कीटाणु और गंदगी सिर के किनारों पर जम जाती है। इससे बालों की जडों को नुकसान पहुंचता है और बाल गिरने शुरू हो जाते हैं।
7. गीले बालों में कंघी करने से बचें। यदि गीले बालों में कंघी करें तो चौडे दांतों वाले कंघे का प्रयोग करें। साथ ही दिन में तीन-चार बार कंघी करें। ऎसा करने से बालों में जमीं तेल की चिपचिपाहट दूर होती है और नए बाल उगने में मदद मिलती है।
8. पुरूषों मे हेयरफाल का सीधा संबंध तनाव से होता है। तनाव के कारण बालों की जडें कमजोर हो जाती हैं। इसलिए जहां तक हो सके तनाव को अपनी जिंदगी से दूर रखें। साथ ही जंकफूड के बजाय घर का पौष्टिक भोजन करें। पानी भरपूर मात्रा में पिएं।
9. सिर पर तेल से मसाज करें। इसके लिए आप सरसों और जैतून के तेल को बराबर मात्रा में मिला कर बालों में हल्के-हल्के उंगलियों के पोरों से मसाज करें। साथ ही हथेलियों से सिर को थपथपाएं। ऎसा करने से बालौं में डैंड्रफ और हेयरफाल की समस्या से निजात मिलता है। मसाज करने के बाद तौलिये को गर्म पानी में भिगोएं फिर उसे निचोड कर सिर को भाप दें। इससे आपके रोमछिद्र खुल जाते हैं और तेल बालों की जडों के अंदर तक समा जाता है। इससे आपके बाल मजबूत होंगे।
10. 1 अंडे को फेंट कर उसकी जर्दी को बालों में लगाएं और आधे घंटे बाद शैंपू से बालौं को धो लें। ऎसा सप्ताह में एक बार करें। ऎसा करने से आपके बाल मजबूत होंगे। समय रहते यदि आप अपने झडते बालों में उपरोक्त बातें ध्यान में रखकर उपाय करेंगें तो आपको कम उम्र में गंजेपन की समस्या का सामनानहीं करना पडेगा। साथ ही आपके बाल मजबूत, घने और चमकदार रहेंगे।

Monday, January 10, 2011

मधुमेह दमन चूर्ण

रक्त में शर्करा की मात्रा अधिक होना और मूत्र में शर्करा होना 'मधुमेह' रोग होना होता है। यहाँ मधुमेह रोग को नियन्त्रित करने वाली परीक्षित और प्रभावकारी घरेलू चिकित्सा में सेवन किए जाने योग्य आयुर्वेदिक योग 'मधुमेह दमन चूर्ण' का परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।

घटक द्रव्य - नीम के सूखे पत्ते 20 ग्राम, ग़ुडमार 80 ग्राम, बिनोले की मींगी 40 ग्राम, जामुन की गुठलियों की मींगी 40 ग्राम, बेल के सूखे पत्ते 60 ग्राम।


निर्माण विधि - सब द्रव्यों को खूब कूट-पीसकर मिला लें और इस मिश्रण को 3 बार छानकर एक जान कर लें। छानकर शीशी में भर लें।

मात्रा और सेवन विधि - आधा-आधा चम्मच चूर्ण, ठण्डे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करें।

लाभ - यह योग मूत्र और रक्त में शर्करा को नियन्त्रित करता है। इसका प्रभाव अग्न्याशय और यकृत के विकारों को नष्ट कर देता है। इसका सेवन कर मधुमेह रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है। इसके साथ वसन्त कुसुमाकर रस की 1 गोली प्रतिदिन लेने से यह रोग निश्चित रूप से नियन्त्रित रहता है। यह योग इसी नाम से बाजार में मिलता है।