Tuesday, September 29, 2015

बालों में नारियल तेल फायदा न करे तो लगाएं अरंडी का तेल



अगर आप बालों में केवल नारियल या बादाम का तेल ही लगाती हैं और आपको फिर भी फायदा नहीं हो रहा है तो, अपना तेल बद डालिये। बालों को स्‍वस्‍थ रखने के लिये आप उनमें अरंडी का तेल लगा सकती हैं। अरंडी को अंग्रेजी में कैस्‍टर ऑइल भी बोलते हैं।

अगर आपके बाल रूखे हैं, उनमें रूसी है या फिर दो मुंहे हो गए हैं और शाइन पूरी तहर से खतम हो चुकी है तो, आपको अरंडी का तेल ही लगाना चाहिये। आप चाहें तो अरंडी के तेल में जैतून का तेल या अन्‍य तेल भी मिक्‍स कर सकती हैं।

अरंडी का तेल काफी पौष्‍टिक होता है, जिसमें मौजूदा तत्‍व बालों के अदंर तक समा कर उसे मजबूती प्रदान करते हैं। अगर आप चाहती हैं कि आपके बालों की सभी समस्‍याएं दूर हो जाएं तो अरंडी के तेल से एक बार एक्‍सपेरिमेंट करना ना भूलियेगा। अब आइये जानते हैं अंरडी के तेल को किस प्रकार से लगाया जा सकता है।


बालों की ग्रोथ बढाए

आरंडी तेल को जैतून या नारियल तेल के साथ मिक्‍स कर के लगाने से बालों की ग्रोथ होती है। इसे 3 से 8 घंटो के लिये हफ्ते में तीन बार लगाएं।

चमकदार बालों के लिये यह तेल बालों में प्राकृतिक कोटिंग कर के बालों को चमकीला और स्‍मूथ बनाता है। आप इसे गरम कर के सिर में लगा सकती हैं।

बालों का झड़ना रोके बालों को झड़ने से रोकने के लिये सिर पर 30 मिनट तक के लिये इस तेल से मसाज करें और फिर बालों को धो लें।
दो मुंहे बालों से बचाए इस तेल में विटामिन ई, ओमेगा 6 फैटी एसिड और जरुरी अमीनो एसिड पाए जाते हैं। यह तेल बालों को दो मुंहा होने से बचाता है। इसे लगाने के लिये थोड़े से जोजोबा ऑइल में इस तेल की थोड़ी सी मात्रा मिलाइये और नहाने से पहले बालों में लगाइये।

रूसी भगाए कैस्‍टर ऑइल में एंटी वाइरल, एंटी बैक्‍टीरियल और एंटी फंगल गुण होते हैं जिससे रूसी की समस्‍या दूर होती है। इस तेल को ऑलिव ऑइल तथा कुछ बूंद नींबू के रस के साथ मिला कर लगाएं। फिर उसके आधे घंटे के बाद नहा लें।

बालों में नमी बढाए अगर आपके बाल रूखे और फिजी हैं तो आपको आरंडी के तेल को गरम कर के सिर पर लगाना चाहिये। इससे आप के बाल मोटे भी हो जाएंगे।
प्राकृतिक कंडीशनर थोड़े से कैस्‍टर ऑइल को एलोवेरा जैल, शहद और नींबू के रस में मिलाइये। इसे बालों की जड़ों से शुरु कर के बालों के आखिर तक लगाइये। फिर 30 मिनट के बाद बालों को धो लीजिये।

Monday, September 28, 2015

बालों की सभी परेशानियों को दूर करे ये 3 आयुर्वेदिक तेल


 क्‍या आप जानते हैं कि हमारी दादी-नानी के बाल अभी तक इतने लंबे और मजबूत क्‍यूं हैं? ऐसा इसलिये क्‍योंकि वे अपने बालों को आयुर्वेदिक तेलों से मसाज किया करती थीं। गरम तेल से सिर को अच्‍छी प्रकार से मसाज करने पर आपके बालों में भी जान आ जाएगी। आयुर्वेदिक तेलों में आपको गुड़हल का तेल, तुलसी या फिर आवंले का तेल ही प्रयोग करना चाहिये। आज हम आपको बताएंगे कि इन सभी तेलों का प्रयोग कैसे करना है।
 अगर आप इन्‍हें भली प्रकार से रखेंगी तो यह तेल कई सालों तक चल सकते हैं। इन्‍हें एयर टाइट कंडेनर में ही रखें और सूरज की धूप ना पड़ने दें।
1 गुडहल तेल
 यह तेल बालों को पतला होने तथा झड़ने से रोकता है। इसे तैयार करने के लिये विधि पढ़ें - सामग्री- 3-4 गुड़हल के फूल, मुठ्ठीभर उसकी पत्‍तियां, 1 चम्‍मच मेथी दाना और नारियल तेल। विधि - गुड़हल और पत्‍तियों को मिक्‍सी में पीस कर पेस्‍ट बना कर एक बरतन में डालें। फिर उसमें नारियल तेल डाल कर गरम करें। इस पेस्‍ट को लगातार चलाती रहें। फिर इसमें मेथी दाना डाल कर कुछ सेकेंड गरम करें। आपका तेल तैयार है, इसका जब भी प्रयोग करें, हल्‍का सा गरम कर लें।

तुलसी तेल
बालों में चमक और जड़ से मजबूती प्रदान करने के लिये यह तेल लगाएं। सामग्री- तुलसी पावडर, नारियल तेल, पानी और मेथी दाना। विधि- 2 चम्‍मच तुलसी पावडर में थोड़ा सा पानी मिक्‍स कर के पेस्‍ट बनाएं। एक बरतन में नारियल तेल गरम करें, जब तेल में उबाल आने लगे तब उसमें तुलसी पेस्‍ट डालें। तेल को चलाती रहें। फिर इसमें मेथी के दाने डालें। जब हो जाए तब तेल को छान कर किसी शीशी में भर लें। तेल को हमेशा गरम कर के प्रयोग करना चाहिये।

 आंवला तेल [आमला और कडी पत्‍ते से बनाइये बालों को काला करने वाला तेल] बालों का झड़ना, असमय सफेद होना या फिर अन्‍य बालों की समस्‍याओं के लिये आंवले का तेल काफी लाभकारी है। इसे बनाने की विधि जानें- सामग्री- आंवला पावडर, नारियल तेल और पानी।
 विधि - एक बरतन में, आंवला पावउर और पानी मिक्‍स कर के 15 मिनट तक उबालें। आंच बंद करें और इस तेल को ठंडा होने दें।फिर इसे छान कर किनारे रखें। अब अलग से जरा सा आंवला पावडर ले कर थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्‍ट बनाएं। अब एक दूसरे बरतन में, तैयार किया हुआ आंवले का पानी, नारियल तेल और पेस्‍ट मिलाएं। इसे आंच पर रखें और इसे तब तक उबालती रहें जब तक कि यह गाढ़ा पेस्‍ट ना बन जाए। इसे लगातार चलाना होता है। उसके बाद स्‍टोव बंद कर दें। अब आप इस तेल को हल्‍का ठंडा हो जाने के बाद सिर पर लगा सकती हैं।

Monday, September 21, 2015

बालो को लम्बा करने का तेल बनाये घर पर


सामग्री :-
1. अरंडी का तेल 250 ग्राम
2. जैतून का तेल 50 ग्राम,
3. चन्दन कि लकड़ी का बारीक बुरादा 50 ग्राम
4. काँफी पाउडर 50 ग्राम।
5. बरगद के पेड़ कि एकदम ताजा पत्ती (बन्द वाली कोपल) 300 ग्राम
6. अम्बर बेल 300 ग्राम (जो हरे रंग के धागे कि तरह पेड़ के ऊपर मिलती है।)
क्र. 1 से 4 की चीजेँ पंसारी एवँ 5,6 को गाँव देहात से ढूँढ कर लाना होगा।
बनाने की विधि --
दोनोँ तेलोँ को मिला कर हल्की आँच पर गर्म करेँ। फिर इस तेल मे सभी चीजेँ डाल लेवेँ और तब तक हिलाते रहेँ जब तक पूरी सामग्री काली होकर जल ना जायेँ। सावधानी रखना तेल तड़तड़ाता बहुत है। सभी चीजेँ जल जाने पर ठंडा करके तेल को बोतल मे भरकर रख लेवेँ।

प्रयोग की विधि --
रोजाना 20 मिनिट तक उँगलियोँ के पोरौँ से इस तेल की मालिश सिर मे करेँ। तेल के नियमित प्रयोग से जो बाल सफेद हो गये है वो भी वापस जड़ से काले उगने लगेँगे।
इसके साथ में एक एक चम्मच सुबह शाम त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी के साथ ज़रूर ले।

6 महीने में रिजल्ट मिल जायेगा।स्नान करने के बाद ही तेल लगाना है , शेम्पू का प्रयोग नहीं करना तेल लगाने के बाद |

गुर्दे की पत्थरी का नुस्खा.


इस नुस्खे से कई रोगियों को लाभ हुआ.अन्य रोगी भी लाभ उठा सकें इसलिए नुस्खा प्रस्तुत है.
करीब दो किलो नीबूं का रस निकाल लें.यह रस लगभग एक लीटर होना चाहिए.इसे छान कर कांच की बड़ी बोतल मे भर कर इसमे मुट्ठी भर कौड़ियां डाल कर रख दें और 7-8 दिन तक हिलाएं नही.कौड़ियां पन्सारी की दुकान मे मिलती हैं नींबू के रस का रंग दुधिया हो जाएगा.अब रोजाना सुबह खाली पेटआधा कप रस अच्छी तरह बारिक छान कर पीना है.इसके एक घण्टे तक कुछ भी खांएं या पिएं नही.
रस खत्म होने तक ऐसे रोजाना सेवन करें.पत्थरी धीरे धीरे गल कर पेशाब के साथ निकल जाएगी.
और रोग मुक्त हो जाओगे.

Monday, September 14, 2015

सेहत से भरपूर है फ्रेंचबीन्स



बीन्स एक ऐसी सब्जी है जिसका प्रयोग लगभग हर तरह के भोजन में किया जाता है। यह सेहत से भरा एक पौष्टिक वि‍कल्प भी है। सलाद से लेकर, भोजन तक में प्रयोग की जाने वाली, प्रोटीन से भरपूर फ्रेंच बीन्स, किस तरह आपकी सेहत को और भी बेहतर बना सकती है, जानिए -

बीन्स की हरी पत्त‍ियों को भी सब्जी के रूप में भोजन में शामिल किया जाता है तथा सूखी हुई फलियों को राजमा या लोबिया के रूप में खाया जाता है।
1  फ्रेंच बीन्स में मुख्यत: पानी, प्रोटीन, कुछ मात्रा में वसा तथा कैल्सियम, फास्फोरस, आयरन, कैरोटीन, थायमीन, राइबोफ्लेविन, नियासीन, विटामिन सी आदि तरह के मिनरल और विटामिन मौजूद होते हैं।
 2  इनके अलावा बीन्स विटामिन बी2 का भी प्रमुख स्त्रोत है। प्रति सौ ग्राम फ्रेंच बीन्स से तकरीबन 26 कैलोरी मिलती है। राजमा में यही सब अधि‍क मात्रा में पाया जाता है इसलिए प्रति सौ ग्राम राजमा से 347 कैलोरी मिलती है।

3  बीन्स, घुलनशील फाईबर का अच्छा स्रोत है, जिसके कारण यह हृदय रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि प्रतिदिन एक कप पकी हुई बीन्स का प्रयोग करने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है और इससे हृदयाघात की संभावना भी 40 प्रतिशत तक कम हो सकती है।
 4  बीन्स में सोडियम की मात्रा कम तथा पोटेशियम, कैल्शि‍यम व मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है जो रक्तचाप को बढ़ने से रोकता है और हार्ट अटैक के खतरे को कम करता है।

5 बीन्स का 'ग्लाइसेमिक इन्डेक्स' कम होता है जिससे अन्य भोज्य पदार्थों की अपेक्षा बीन्स खाने पर रक्त में शर्करा का स्तर अधि‍क नहीं बढ़ता । इसमें मौजूद फाइबर रक्त में शर्करा के स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं। यही कारण है, कि मधुमेह के रोगियों को बीन्स खाने की सलाह देते है।


6 बीन्स का रस शरीर में इन्सुलिन के उत्पादन को बढ़ावा देता है। इस वजह से मधुमेह के मरीजों के लिए बीन्स खाना बहुत लाभदायक माना जाता है।

7  फ्रेंच बीन्स किडनी से संबंधित बीमारियों में भी काफी फायदेमंद है। किडनी में पथरी की समस्या होने पर, आप लगभग 60 ग्राम बीन्स की पत्त‍ियों को चार लीटर पानी में करीब चार घंटे तक उबाल लें। फिर इसके पानी को कपड़े से छानकर करीब आठ घंटे तक ठंडा होने के लिए रख दें। अब इसे फिर से छान लें पर ध्यान रखें कि इस बार इस पानी को बिना हिलाए छानना है। इसे एक सप्ताह तक हर दो घंटे में पीने से अत्यधि‍क लाभ होता है।

8 होम्योपैथिक दवाओं में भी बीन्स बहुत काम आती है। ताजी बीन्स का उपयोग रूमेटिक, आर्थ्राइटिस तथा मूत्र संबंधी तकलीफ के लिए दवाई बनाने के लिए किया जाता है।

9  बीन्स में एन्टीआक्सीडेंट की मात्रा भी काफी होती है। एन्टीऑक्सीडेंट शरीर में कोशिकाओं की मरम्मत के साथ् ही त्वचा व दिमाग के लिए भी अच्छा माना जाता है। इसलिए इसका सेवन करने से कैंसर की संभावना कम हो जाती है। इसमें मौजूद फाईटोएस्ट्रोजन स्तन कैंसर के खतरे को भी कम हो सकता है।

10  इन सभी के अलावा बीन्स कैल्शियम का एक अच्छा स्त्रोत हैं, जो हड्डियों तथा दांतों दोनों के विकास में महत्वपूर्ण होता है।


Wednesday, September 2, 2015

इन 9 बातों में नहीं है दम, इनसे कभी नहीं होता वजन कम



अगर आप ये 9 काम हर रोज यह सोच कर करते हैं कि इनसे आपका वजन कम हो जाएगा, तो यह सिर्फ आपकी गलतफ    हमी है। मोटापा कम करने के ये सिर्फ मिथ हैं, जानिए इनके फैक्ट...
ज्‍यादा वर्कआउट करने से कभी भी वजन कम नहीं होता है। हर दिन नियमित रूप से व्‍यायाम करने से ही लाभ होता है।एक समय का खाना न खाना या अपनी खुराक में कटौती कर देने से भी आपके वजन में कमी आ जाएगी। बस खाने-पीने का नियम सही रखें।
फलों को खाने से कभी वजन नहीं बढ़ता। एक समय खाना न खाएं। फल ही खाएं। ये आपको एनर्जी देते हैं। फैट नहीं बढ़ाते हैं। इसी तरह यह भी आपकी गलतफहमी है कि ज्यादा पानी पीते रहने से मोटापा घटता है। यह सिर्फ एक मिथ है। पानी पीने से आपका पेट भर जाता है, लेकिन कैलोरी में कमी नहीं आती।
अपनी खुराक में कार्बोहाइड्रेट शामिल नहीं करते हैं, तो आपको कमजोरी आ जाएगी। इससे आप दुबले नहीं हो सकते हैं। बस इतना ध्यान रखने की जरूरत होती है कि आपको कितना कार्बोहाइड्रेट लेना है। कई लोगों का मानना है कि मीठा खाने से वो मोटे हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। डार्क चॉकलेट आदि खाने से आपके स्‍वास्‍थ्‍य को लाभ मिलेगा।
सिर्फ फाइबर का सेवन करना भी वजन कम नहीं कर सकता। फाइबर से आपको एनर्जी मिलती है, इसके अलावा आपकी पाचन क्रिया भी दुरुस्‍त रहती है। सिर्फ फाइबर के सेवन से शरीर में दुबलापन नहीं आता। सलाद ज्यादा खाने से भी वजन कम नहीं होता। इससे आपके शरीर में प्रोटीन की मात्रा अच्‍छी हो जाती है लेकिन वजन में कमी नहीं आती है।
जूस पीना भी मोटापे कम करने का जरिया नहीं है। वजन में कमी नहीं आती है जूस पीने से।

इन 5 चीजों को कभी दोबारा गर्म करके नहीं खाना चाहिए




खान-पान से जुड़ी इन 5 चीजों को दोबारा गर्म करके खाना छोड़ दीजिए, वरना फायदे की जगह होगा नुकसान...
आलू सेहत के लिए अच्छा होता है, लेकिन दोबारा गर्म करके खाएंगे, तो पोषक तत्व खत्म हो जाएंगे और पाचन क्रिया पर उलटा प्रभाव पड़ेगा।
चुकंदर को कभी भी दोबारा गर्म करके नहीं खाना चाहिए। ऐसा करने से इसमें मौजूद नाइट्रेट समाप्त हो जाता है। अगर ज्यादा बन जाए, तो बिना गर्म किए खाएं।
मशरूम फ्रेश ही खाएं। दोबारा गर्म करके खाने से इसके प्रोटीन का कॉम्पोजिशन बदल जाता है और ये हानिकारक हो सकता है।
अंडे को दोबारा गर्म करके खाना हमेशा नुकसानदेह होता है। ऐसा करने से इसमें मौजूद प्रोटीन विषाक्त हो जाता है।
पालक को दोबारा गर्म करके खाना कैंसर का कारण भी हो सकता है। इसमें मौजूद नाइट्रेट दोबारा गर्म करने के बाद कुछ ऐसे तत्वों में बदल जाते हैं जिससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।

रोज करते हैं लंबे समय तक ड्राइविंग, तो आ सकते हैं इन 5 बीमारियों की चपेट में!



घर से ऑफिस की दूरी ज्यादा है और आपको करनी पड़ रही है लंबी ड्राइविंग, तो जरूर गौर करें इन 5 बीमारियों पर, जो पैदा होती हैं लंबे समय तक ड्राइविंग करने से। समय रहते इन्हें पहचानें और कराएं तुरंत इलाज...
बैक पेन सताने लगता है। घुटनों का दर्द भी होने लगता है।
हैरानी होगी आपको यह जानकर कि ज्यादा देर तक ड्राइविंग करने से ब्लड शुगर लेवल बढऩे की संभावना बहुत ज्यादा रहती है। सेंट लुइस के यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन द्वारा किए गए रिसर्च में ये बात सामने आई है कि हाई ब्लड ग्लूकोज लेवल प्री डायबिटीज और डायबिटीज का खतरा पैदा करता है।
कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। बढ़ते हुए कोलेस्ट्रॉल से दिल के बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
लंबी ड्राइविंग से नींद की समस्या भी पैदा होती है। नींद न आने की समस्या के लोग शिकार हो जाते हैं।
डिप्रेशन का शिकार भी हो सकते हैं। सेंट लुइस के यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन द्वारा किए गए रिसर्च में ये बात भी सामने आई है कि रोजाना देर तक सफर करने से डिप्रेशन, चिंता, तनाव, थकान जैसी कई परेशानियां पैदा होने लगती हैं।

रात को सोने से पहले मोजे में रखें बस दो प्याज की स्लाइस, होंगे ये अनोखे फायदे



रात को सोने से पहले मोजे में एक प्याज की स्लाइस रखने के कई सेहत भरे फायदे होते हैं। मोजे में स्लाइस इस तरह रखें कि वह पूरी तरह पैर से टच हो। वरना नहीं मिलेगा कोई फायदा। प्याज में मौजूद फॉस्फोरिक एसिड खून की धमनियों में घुस कर खून को शुद्ध बनाता है।
पैरों के नीचे सीधे अलग-अलग तंत्रिका अंत (लगभग 7,000) होती हैं, जो कि शरीर के विभिन्न अंगों से जुड़ी हुई होती हैं। ये शरीर के भीतर एक शक्तिशाली बिजली के सर्किट की तरह से काम करते हैं, लेकिन ये जूते-चप्पल पहनने की वजह से निष्क्रिय हो जाते हैं। इसलिए कुछ घंटों के लिए नंगे पैर टहलना चाहिए।
प्याज में एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरल गुण होते हैं, जो शरीर पर रडऩे से बैक्टीरिया और रोगाणुओं का नाश करता है। जब त्वचा प्याज में मौजूद फास्फोरिक एसिड सोख लेता है, तो खून शुद्ध होता है। सोने के दौरान प्याज मोजे में रखने से पैरों की गंध दूर होती है। टॉक्सिंस दूर होते हैं।
हार्ट के लिए अच्छा होता है। प्याज के टुकडे को पांव के बीच में रख कर सोने से हार्ट स्वस्थ रहता है।
पेट के संक्रमण से छुटकारा मिलता है। किडनी समस्या में भी मदद मिलती है। इसके अलावा छोटी आंत और मूत्राशय की समस्याओं से भी राहत मिलती है।  अगर आपको लगे कि आपको बुखार चढ़ रहा है, तो मोजे में प्याज की स्लाइस रख लें।

Tuesday, August 18, 2015

प्राणायाम के द्वारा मिलने वाले लाभ


प्राणायाम के द्वारा व्यक्ति को मिलने वाले वाले अनेक लाभ हैं-
•प्राणायाम द्वारा प्राण (वायु) को सुरक्षित रखने का अभ्यास किया जाता है। यह सांस विज्ञान पर आधारित क्रिया है। सांस लेना और छोड़ना जीवन का मुख्य आधार है। इस क्रिया द्वारा वैसे ही सांसों को अपने वश में किया जाता है, जैसे व्यक्ति अपने प्राण को वश में करता है।
•प्राणायाम के द्वारा सांसों पर नियंत्रण किया जाता है, जिससे सांस लेने व छोड़ने की गति कम हो जाती है और अधिक गहरी व लम्बी सांस लेने का अभ्यास हो जाता है। इससे सांसों को बचाने से आयु बढ़ती है और व्यक्ति अधिक समय तक जीवित रहता है। जो व्यक्ति अधिक हांफते हैं या जल्दी-जल्दी सांस लेते हैं, उनकी आयु कम होती जाती है और वह अकाल मृत्यु को भी प्राप्त करते हैं।
•वायुमण्डल में फैले ऑक्सीजन को ही प्राणवायु कहते हैं और जीवनी भी वायु को ही कहते हैं। अत: प्राणायाम के द्वारा हम उसी वायु को अधिक से अधिक अपने अंदर एकत्र करने की कोशिश करते हैं। इसलिए प्राणायाम के द्वारा हमारे अंदर वायु (प्राणशक्ति, जीवनी) की मात्रा अधिक हो जाने से प्राणशक्ति के साथ आयु और शारीरिक क्षमता भी बढ़ जाती है।
•प्राणायाम का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को किसी प्रकार का रोग नहीं होता और इसका प्रतिदिन अभ्यास करने से शरीर में उत्पन्न हो चुका रोग भी खत्म हो जाता है।
•योग के अभ्यास के लिए प्राणायाम का अभ्यास आवश्यक है। ´घेरण्ड संहिता´ और ´हठयोग प्रदीपिका´ में प्राणायाम के महत्वों को बताते हुए कहा गया है कि प्राणायाम के अभ्यास के बिना प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
•प्राणायाम न केवल सांसों को संचित (बचाना) करने का अभ्यास होता है, बल्कि यह मन को शांत व स्थिर भी करता है। इससे बुद्धि का विकास होता है और चिंतन व मनन की क्षमता भी बढ़ती है।
•´योगदर्शन´ में प्राणायाम के बारे में बताते हुए कहा गया है कि इसके अभ्यास से बुद्धि व विवेक से अज्ञानता का नाश होता है। इससे व्यक्ति अंधकार रूपी अज्ञान से निकलकर ज्ञान रूपी प्रकाश में आ जाता है। इसके द्वारा मनुष्य के अंदर इतनी शक्ति आ जाती है कि वह अपने मन को जिस स्थिति में रखना चाहे, रख सकता हैं। इससे मन व इन्द्रियां वश में हो जाती हैं, जिससे प्रत्याहार के अभ्यास से समाधि तक के अभ्यास में लाभ मिलता है।
•प्राणायाम के अभ्यास से शुद्ध वायु का बहाव खून के साथ होने से शरीर के विकार दूर होते हैं। इससे शरीर स्वस्थ रहता है और शरीर में लचक, स्फूर्ति, चुस्ती और सुन्दरता व चमक आ जाती है।
•प्राणायाम से इन्द्रियों में उत्पन्न होने वाले विकार दूर हो जाते हैं। इससे शरीर, मन और प्राण में स्थिरता व स्वास्थ्यता आती है। मनुस्मृति में कहा गया है कि जैसे आग में धातु आदि को गलाकर उसे आकार दिया जाता है, उसी तरह प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों, मन व मस्तिष्क के विकारों को दूर करके मन को स्वच्छ, निर्मल व धार्मिक विचारों को ग्रहण करने योग्य बनाया जाता है।
•मस्तिष्क की शक्तियों का कोई अंत नहीं है इसलिए प्राणायाम के द्वारा मानसिक शक्ति को बढ़ाकर अनेक असाधारण कार्य किये जा सकते हैं। मानसिक शक्तियों में से एक शक्ति इच्छाशक्ति भी है। मस्तिष्क को इच्छाशक्ति गति देती है, जिससे ´विचार´ जो मन की परमाणुमय शक्ति है, उसके सधने से कहीं भी आ जा सकते हैं। इस इच्छाशक्ति को कोई भी रोक नहीं सकता। अपने विचारों को अपने अंदर से ही उत्पन्न किया जा सकता है, जो प्रकृति का आवश्यक तत्व है। हमारे चारो ओर एक विद्युत शक्ति हमेशा मौजूद रहती है और यह विद्युत प्रवाह मनुष्य के अंदर भी होता है। इसे इच्छाशक्ति के अभ्यास के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है और अपने अंदर की इच्छाशक्ति को बढ़ाया जा सकता है। इच्छाशक्ति से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का प्रवाह अंगुलियों के स्पर्श के द्वारा रोगों को भी खत्म करने में किया जा सकता है। ध्यान रखें कि इच्छाशक्ति के साथ ´प्राणायाम कुम्भक´ करना आवश्यक है। ´त्राटक´ के द्वारा दृष्टिशक्ति, कुम्भक के द्वारा सांस को इकट्ठा करके प्राण को बढ़ाने की शक्ति और मन के द्वारा इच्छाशक्ति बढ़ाने की शक्ति प्राप्त करने के बाद ही अपनी इच्छाशक्ति से दूसरों को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए इच्छाशक्ति को बढ़ाने के लिए भी प्राणायाम का अभ्यास आवश्यक है।
•प्राणायाम के अभ्यास से व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ जाती है और उसके अंदर दृढ़ विश्वास पैदा हो जाता है। इस तरह के विश्वासों से व्यक्ति असम्भव काम को भी करने में सफलता प्राप्त कर लेता है- जैसे अधिक वजन उठाना, सीने पर या पेट पर गाड़ी को चलाना, लोहे को मोड़ना आदि। कुछ व्यक्ति प्राणायाम की सिद्धि इस तरह प्राप्त कर चुके थे कि वे अपनी छाती पर हाथी को भी चढाकर करतब दिखाया करते थे।  प्राणायाम व ब्रह्यचर्य के बल पर किसी भी प्रकार के बल प्रयोग में व्यक्ति सक्षम हो सकता है। इस तरह की सभी क्रियाएं देवी चमत्कार नहीं है, बल्कि यह प्राणायाम की साधना का प्रभाव है।
•प्राणायाम के अभ्यास से मानसिक एवं स्नायु संबंधी रोगों का भी इलाज किया जाता है।
•बिना प्राणायाम के अभ्यास के ही रोगों को ठीक करने का असफल प्रयास करने वाले और लोगों को धोखा देने वाले व्यक्ति मूर्ख और अज्ञानी होते हैं। परन्तु प्राणायाम के अभ्यास से रोगों का उपचार कर उसे ठीक करते देखा गया है। इस तरह के रोगों को ठीक करने के लिए शक्ति प्राणायाम से ही मिलती है।
•प्राणायाम के द्वारा अनेक चमत्कारी कार्य किये जा सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यास से व्यक्ति अपनी नाड़ी की गति व हृदय के गति को भी रोक सकता है। आकाश या पानी में भी चल सकता है। यह सभी योग प्राणायाम से ही करने सम्भव हो सकते हैं।

प्राणायाम द्वारा रोग निवारण उपचार



          यदि शरीर के किसी अंग में दर्द हो, सूजन हो, हाथ-पांव ठंड के कारण सुन्न हो गए हों, सिर में तेज दर्द हो अथवा नाक, कान आदि अंगों का कोई विशेष रोग हो तो ऐसे रोगों को दूर करने के लिए शुद्ध वायु (प्राण) से खून को शुद्ध करके रोग ग्रस्त अंगों की ओर उस शुद्ध रक्त को प्रवाहित कराने से रोग में लाभ मिलता है। इस तरह प्राणायाम के द्वारा शुद्ध वायु को शरीर में पहुंचाने से शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ जाती है और रोग धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। कभी-कभी इस क्रिया का 1 से 2 बार अभ्यास करने से ही रोग ठीक हो जाते हैं।

रोगग्रस्त अंगों की ओर रक्त (खून) को प्रवाहित करने की विधि-

          रोग वाले अंग की ओर खून को प्रवाहित करने के लिए और प्राण का अभ्यास करने के लिए पहले सीधे बैठ जायें। यदि रोग में बैठना सम्भव न हो तो पीठ के बल सीधा लेट कर भी इस क्रिया को कर सकते हैं। अब बैठने या लेटने की स्थिति बनने के बाद सामान्य रूप से 5 से 10 बार सांस ले व छोड़ें। ध्यान रखें कि सांस (वायु) अन्दर खींचते हुए 10 बार ´ॐ´ का जाप करें। फिर सांस को अन्दर रोककर 5 बार ´ॐ´ का जाप करें और अंत में सांस (वायु) को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए 10 बार ´ॐ´ का जाप करें। 10 बार ´ॐ´ का जाप करते हुए जब सांस (वायु) को बाहर निकाल दें, तो कुछ क्षण रुककर पुन: सांस (वायु) को अन्दर खींचते हुए पहले वाली क्रिया को करें। इस तरह यह क्रिया जब 5 से 10 बार हो जाए, तो अंत में गहरी सांस लेते हुए मन में कल्पना करें-´´रक्त संचार के साथ ही मेरा सूर्यचक्र स्थिर प्राण प्रवाह रोगग्रस्त अंग की ओर दौड़ रहा है।´´ फिर सांस को अन्दर रोककर मन ही मन कल्पना करें-´´मेरे अन्दर प्राणशक्ति कार्यशाली है और उसके द्वारा रोगग्रस्त अंगों को शक्ति मिल रही है। शरीर के अन्दर शुद्ध वायु के प्रवाह से रोगग्रस्त अंग शुद्ध हो रहे हैं तथा उनमें नई प्राणशक्ति का संचार हो रहा है। मेरे अन्दर विजातीय तत्व अर्थात दूषित तत्व व रोग पर शुद्ध प्राणशक्ति का अधिकार हो गया है। ´´इसके बाद सांस (वायु) को बाहर छोड़ते हुए भी मन में कल्पना करें-´´वायु को बाहर छोड़ने के साथ ही मेरे अन्दर के सभी दोष, विकार और सूजन, दर्द या अन्य कोई भी रोग जो मेरे शरीर में है, वह हवा की तरह ऊपर आसमान में उड़े जा रहा है। ´´जब सांस को बाहर निकाले दें, तो सांस को बाहर ही रोककर पुन: मन ही मन कहें-´´प्राणशक्ति का प्रवाह रोगग्रस्त अंगों पर होने से वह अंग शुद्ध हो गया है।

          इस क्रिया को 15 मिनट से आधे घंटे तक करना चाहिए। प्राणायाम के द्वारा की जाने वाली इस क्रिया से आपको अनुभव होने लगेगा कि अंगों में उत्पन्न दर्द तेजी से कम हो रहा है। इस क्रिया को 6-6 घंटे के अन्तर पर दिन में 3 बार कर सकते हैं। यदि हल्का कष्ट या दर्द हो तो दिन में 2 बार ही इस क्रिया को करें। परन्तु बड़े रोग जैसे जीर्ण रोग को खत्म करने के लिए इस क्रिया को लगातार कुछ दिनों या कुछ सप्ताहों तक करने की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए धैर्यपूर्वक बिना घबराये मन से गलत भावनाओं को समाप्त कर पूर्ण हृदय से इस प्राणायाम को करने से अवश्य ही रोगों में लाभ मिलता है।

          दर्द को खत्म करने वाले इस उपचार के समय अपने रोगग्रस्त अंग को अपने ही हाथों का मृदु स्पर्श (हल्के हाथ से दर्द वाले अंगों पर सहलाना) देकर प्राण विद्युत के प्रवाह को तेज करने में बड़ी मदद मिलती है। ऐसा करने पर इच्छाशक्ति बढ़ती है, क्योंकि स्पर्श से रक्त और प्राण (जीवनी) उस ओर दौड़ते हुए देखे जाते हैं।

सावधानी-

•सिर के ऊपरी भाग में दर्द हो, तो प्राण संचार को ऊपर से नीचे की ओर ही करना चाहिए क्योंकि उर्ध्वांगों (शरीर के ऊपरी अंग) में खून का दबाव बढ़ने से ही अक्सर दर्द उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में मस्तिष्क की ओर ध्यान करने से मस्तिष्क की ओर खून का दबाव बढ़ जाता है, जिसके फल स्वरूप लाभ होने के स्थान पर हानि होने की संभावना रहती है।
•रोगग्रस्त अंगों पर अंगुलियों को मोड़कर मन ही मन बोलें ´निकल जाओ´ ´निकल जाओ´ ´विकार भाग´ ऐसा कहते हुए मार्जन (सहलाना) भी किया जा सकता है। इस क्रिया को वैसे ही करना चाहिए जैसे कोई भूत-प्रेत को झाड़ते समय करता है। अंगुलियों को रोगग्रस्त अंग पर मार्जन (सहलाना) करने से अंगुलियों से लगातार निकलने वाली चुम्बकीय किरणें (प्राणशक्ति) रोग वाले स्थान में प्रवाहित होने लगती है और रोगग्रस्त अंगों में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है। इस तथ्य को ´डॉ. किलनर´ के ओरों स्कोप नामक यंत्र के द्वारा सिद्व करके दिखाया गया है। अत: मार्जन (अंगुलियों से सहलाना) के द्वारा विद्युत प्रवाह विकृत अंग पर डालने से प्राकृतिक रोग को खत्म करने के लिए अंगों को शक्ति मिलती है, जिससे रोग को खत्म करने में सहायता मिलती है।
प्राणायाम के द्वारा अनेक रोगों को दूर करना-  

          प्राणायाम के द्वारा अनेकों रोगों को समाप्त किया जा सकता है। रोगों को समाप्त करने के लिए बताए गए सभी प्राणायामों का अभ्यास स्वच्छ-शांत व स्वच्छ हवा के बहाव वाले स्थान पर करें। ध्यान रखें कि प्राणायाम वाले स्थान पर हवा का बहाव तेज न हों। इससे सांस लेने में कठिनाई हो सकती है।

कब्ज को खत्म करने के लिए-

          कब्ज को दूर करने के लिए प्लाविनी कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए। यह पुराने से पुराने कब्ज में भी अत्यधिक लाभकारी होता है।

कुम्भक प्राणायाम की विधि-

          अभ्यास के लिए पहले स्थिरासन में बैठ जाएं। फिर नाक के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे-धीरे अन्दर खींचें और पेट को फुलाते जाएं। पेट में पूर्ण रूप से वायु भर जाने पर सांस को जितनी देर तक अन्दर रोकना सम्भव हो रोककर रखें। इसके बाद नाक के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इसके बाद पुन: इस क्रिया को करें। इस क्रिया को सुविधा के अनुसार जितनी बार कर सकते हैं, करें।

          कब्ज को दूर करने के लिए दक्षिण रेचक प्राणायाम का भी अभ्यास कर सकते हैं।

पेट के रोगों को दूर करने के लिए-

          पेट के रोगों को दूर करने के लिए मध्य रेचक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह प्राणायाम पेट के सभी रोगों व दोषों को खत्म करने में लाभकारी माना गया है।

मध्य रेचन प्राणायाम की विधि-

          मध्य रेचक प्राणायाम के लिए स्वास्तिक या उत्कटासन में बैठें। अब अन्दर की वायु को बाहर निकालकर सांसों को रोककर रखें। इसके बाद उड्डियान बन्ध लगाकर आंतों को इस तरह से ऊपर उठायें कि वह बेलन की तरह पेट में उभर आए। दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर रखें और पेट के दोनों बगलों में दबाव देते हुए बाहरी कुम्भक करें (अन्दर की वायु को बाहर निकाल कर सांसों को रोककर रखें)। इस स्थिति में सांसों को रोककर जितनी देर तक रहना सम्भव हो रोककर रखें। फिर बन्ध को हटाकर व हाथों का दबाव बगल से हटाते हुए धीरे-धीरे सांस अन्दर खींचें। इस क्रिया में सांस को रोककर रखने के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते जाएं। ध्यान रखें कि इस क्रिया का अभ्यास सावधानी से करें और हो सके तो किसी अनुभवी योग साधक की देख-रेख में अभ्यास करें।

          इस प्राणायाम से आंतों के विकार दूर हो जाते हैं और आंते शक्तिशाली बनती हैं। यह कब्ज को दूर करता है तथा पेट के सभी रोगों को खत्म करता है। यह तिल्ली व जिगर के दोषों को भी खत्म करता है।

खट्टी डकारों के लिए-

          खट्टी डकारों को दूर करने के लिए चन्द्र भेदन प्राणायाम का अभ्यास करें। नाक के बाएं छिद्र को चन्द्र नाड़ी तथा बाएं छिद्र को सूर्य नाड़ी कहते हैं। इस प्राणायाम में वायु को नाक के बाएं छिद्र से अन्दर खींचा जाता है (पूरक किया जाता है) इसलिए इसे चन्द्र भेदन प्राणायाम कहते हैं।

चन्द्र भेदन प्राणायाम की विधि-

          चन्द्र भेदन प्राणायाम के अभ्यास के लिए पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। इसके बाद दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करें और नाक के बाएं छिद्र से आवाज के साथ वायु को अन्दर खींचें। अब सांस को अन्दर जितनी देर तक रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें और फिर नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इस क्रिया का अभ्यास कई बार करें। इस क्रिया का अभ्यास अपनी सुविधा के अनुसार करना चाहिए।

पेट की चर्बी कम करने व शरीर को पतला करने के लिए-

          भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास से पेट की अधिक चर्बी कम होती है और शरीर पतला व सुडौल बनता है। इसका अभ्यास सावधानी से करें।

भस्त्रिका प्राणायाम की विधि-

          इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए पहले सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। अब दाएं हाथ को ऊपर उठाते हुए कोहनी को कंधे की सीध में रखें और अंगुलियों से नाक के बाएं छिद्र को बन्द करें। अब नाक के दाएं छिद्र से तेज गति के साथ वायु को बाहर निकालें और फिर अन्दर खींचें। इस क्रिया से सांस को बिना रोकें कम से कम 8 से 10 बार सांस लें और छोड़ें। अंत में सांस अन्दर खींचकर सांस को रोककर रखें। सांस को जितनी देर तक आसानी से रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें। इसके बाद दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करें और नाक के बाएं छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। फिर नाक के बाएं छिद्र से ही तेज गति के साथ लगातर 8 से 10 बार सांस ले व छोड़ें। अंत में वायु को अन्दर खींच कर उसे अन्दर ही अपनी क्षमता के अनुसार रोककर रखें और फिर नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। यह प्राणायाम का 1 चक्र है और इस तरह इस क्रिया का 3 बार अभ्यास करें। इसका अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए तथा धीरे-धीरे इसकी संख्या को भी बढ़ाते रहना चाहिए।

          इसके अतिरिक्त अग्नि प्रसारण प्राणायाम, वामरेचक प्राणायाम और कमनीय कुम्भक प्राणायाम से भी शरीर की अधिक चर्बी को कम किया जा सकता है।

सावधानियां-

         इस प्राणायाम का अभ्यास सावधानी से करना आवश्यक है अन्यथा इससे हानि हो सकती है। इसके अभ्यास में सावधानी न रखने पर थूक के साथ खून आदि आने की संभावना रहती है। इससे दमा व खांसी की भी शिकायत हो सकती है। इसलिए इस प्राणायाम का अभ्यास प्राणायाम के अनुभवी गुरू की देख-रेख में करना चाहिए। इसके अभ्यास के क्रम में दूध व घी का सेवन करना चाहिए। कमजोर व्यक्ति को इसका अभ्यास तेजी से नहीं करना चाहिए, अन्यथा सिर में चक्कर आने की संभावना रहती है।

रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर या ब्लडप्रेशर) को सामान्य रखने के लिए-

          रक्तचाप की गति को सामान्य रखने के लिए शीतली कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह एक अच्छा प्राणायाम है और इससे मिलने वाले अनेकों लाभों के बारे में ´घेरण्ड संहिता´ में बताया गया है, जिनमें पित्त विकार, कफ विकार व अजीर्ण (पुराना कब्ज) रोग को विशेष रूप से खत्म करने के लिए बताया गया है।

शीतली प्राणायाम की विधि-

          इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए सुखासन में बैठ जाएं और दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। जीभ को दोनों किनारों से मोड़कर एक नली की तरह बनाएं और मुंह से हल्का बाहर निकाल कर होठों को बन्द कर लें। अब जीभ से बनी नली के द्वारा धीरे-धीरे वायु (सांस) को अन्दर खींचें। जब पूर्ण रूप से वायु अन्दर भर जाएं, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार अन्दर रोककर रखें। वायु को अन्दर रोकने की स्थिति मेंघबराहट हो तो दोनों नासिका से वायु को बाहर निकाल दें। इस क्रिया को पुन: करें। इसका अभ्यास करते समय वायु को अन्दर खींचने के समय व अन्दर रोकने के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते रहें।

सावधानी-

          इस प्राणायाम का अभ्यास कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम का अभ्यास गर्मी के मौसम में करना चाहिए तथा सर्दी के मौसम में इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। अभ्यास के समय घबराहट होने पर वायु को नासिका द्वारा बाहर निकाल दें।

हृदय की धड़कन के लिए-

          हृदय की बढ़ी हुई धड़कन के लिए वक्षस्थल रेचक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। इससे धड़कन की गति सामान्य होती है।

वक्षस्थल रेचन प्राणायाम की विधि-

          इसके अभ्यास के लिए स्वच्छ वातावरण में सुखासन में बैठ जाएं। इसके बाद नाक के दोनों छिद्रों से सांस (वायु) अन्दर खींचें और फिर धीरे-धीरे सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। जब सांस (वायु) पूर्ण रूप से बाहर निकल जाए, तो सांस को रोक लें (बाहरी कुम्भक करें)। अब कोहनियों को ऊपर उठाते हुए दोनों हाथों को कंधे पर रखें। इसके बाद छाती को हल्का ढीला करते हुए कंधे हल्के से सिकोड़ें (संकुचित करें) और फिर कंधे को आगे की ओर करें। आसन की इस स्थिति में जितनी देर तक सांस को रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें। फिर धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़ें। यह वक्षस्थल रेचन प्राणायाम का एक चक्र है। इस तरह इसका अभ्यास कई बार करें और धीरे-धीरे इसके अभ्यास का चक्र बढ़ाने की कोशिश करें।

कफ दोषों को दूर करने के लिए-

          फेफड़ों को शुद्ध (साफ) करने के लिए और कफ को खत्म करने के लिए कपाल भांति प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। ´घेरण्ड संहिता´ और ´हठयोग प्रदीपिका´ दोनों में इस प्राणायाम के अभ्यास की अलग-अलग विधियां बताई गई हैं। इन दोनों विधियों से प्राणायाम का अभ्यास करने पर इसके लाभ समान प्राप्त होते हैं।

कपाल भांति प्राणायाम के अभ्यास की विधि-

´घेरण्ड संहिता´ विधि-

         कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास पद्मासन में बैठकर या खड़े होकर कर सकते हैं। इसके अभ्यास के लिए आसन की स्थिति में बैठ जाएं और दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके नाक के बाएं छिद्र से धीरे-धीरे सांस (वायु) अन्दर खींचें। फिर नाक के बाएं छिद्र को बाकी अंगुलियों से बन्द करके दाएं छिद्र से सांस (वायु) को बाहर छोड़ें। पुन: नाक के दाएं छिद्र से ही सांस (वायु) अन्दर खींचें और दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। इस तरह बाएं से सांस लेकर दाएं से निकालना और फिर दाएं से ही सांस लेकर बाएं से निकालना। इस तरह इस क्रिया का कई बार अभ्यास करें।

´हठयोग प्रदीपिका´ विधि-

         इस क्रिया के लिए पहले पद्मासन की स्थिति में बैठ जाएं। अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़े। अब जल्दी-जल्दी सांस लें और छोड़ें। सांस लेते व छोड़ते समय ध्यान रखें कि सांस लेने में जितना समय लगे उसका एक तिहाई समय ही सांस छोड़ने में लगाएं। इस तरह सांस लेने व छोड़ने की क्रिया को बढ़ाते रहें, जिससे सांस लेने व छोड़ने की गति 1 मिनट में 120 बार तक पहुंच जाए। ध्यान रखें कि सांस लेते व छोड़ते समय केवल पेट की पेशियां ही हरकत करें तथा छाती व अन्य अंग स्थिर रहें। इस क्रिया को शुरू करने के बाद क्रिया पूर्ण होने से पहले न रुकें। इस क्रिया में पहले 1 सेकेण्ड में 1 बार सांस लें और छोड़ें और बाद में उसे बढ़ाकर 1 सेकेंड में 3 बार सांस लें और छोड़ें। इस क्रिया को सुबह-शाम 11-11 बार करें और इसके चक्र को हर सप्ताह बढ़ाते रहें। इस क्रिया में 1 चक्र पूरा होने पर श्वासन क्रिया सामान्य कर लें और आराम के बाद पुन: इस क्रिया को दोहराते हुए 11 बार करें।

जुकाम का नाश व सुरक्षा के लिए-

          जुकाम को खत्म करने व सुरक्षा के लिए अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम की विधि-

           इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए पद्मासन में बैठ जाएं। इसके बाद दाएं हाथ से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से तीव्र गति से अन्दर की सांस (वायु) को बाहर निकालें (रेचक करें)। फिर जिस गति से सांस (वायु) को बाहर निकाला गया है, उसी गति से सांस (वायु) को अन्दर खींचें। इसके बाद नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से तीव्र गति से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें और फिर नाक के बाएं छिद्र से ही सांस (वायु) को अन्दर खींचें। फिर दाएं से बाहर निकाल दें। इस तरह इस क्रिया को दोनों नासिका से बदल-बदल कर कम से कम 20-20 बार अभ्यास करें। प्राणायाम के इस अभ्यास को धीरे-धीरे बढ़ाएं।

कंठ रोगों को दूर करने के लिए-

          कंठ की नाड़ियों को शक्तिशाली बनाने व कंठ और गले के रोगों को खत्म करने के लिए ´चतुर्मुखी प्राणायाम´ का अभ्यास करना चाहिए। चतुर्मुखी प्राणायाम का अर्थ बिना कुम्भक किये पूरक व रेचक करते हुए मुंह को चारों ओर बाएं, दाएं, नीचे और ऊपर की ओर करना होता है। इस क्रिया को 15 बार रोजाना करना चाहिए और धीरे-धीरे इसके अभ्यास को बढ़ाना चाहिए।

चतुर्मुखी प्राणायाम की विधि-

          इसके अभ्यास के लिए पद्मासन में बैठ जाएं। अब मुंह को बाएं कंधे की ओर घुमाएं। इसके बाद नाक से आवाज करते हुए तीव्र गति से सांस (वायु) को अन्दर खींचें। फिर दाएं हाथ से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से सांस (वायु) को अन्दर से बाहर निकालें। इसके बाद मुंह को दाएं कंधे की ओर घुमाएं और नाक के बाएं छिद्र से सांस (वायु) अन्दर खींचकर नाक के दाएं छिद्र से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। इसके बाद मुंह को ऊपर व नीचे की ओर करके भी इस क्रिया का अभ्यास करें। इस तरह मुंह को चारों ओर घुमाकर करने से अभ्यास का 1 चक्र पूरा होता है। इस तरह इसके चक्र को अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास करना चाहिए।

ध्यान रखें-

          इसके अभ्यास में पहले सांस छोड़ते व लेते समय नासिका को बन्द करने के लिए हाथ का प्रयोग करें और अभ्यास होने पर बिना हाथ की सहायता के ही सांस लेने व छोड़ने की क्रिया का अभ्यास करें। सांस लेते व छोड़ते (पूरक व रेचक करते समय) समय नाक से आवाज आनी चाहिए।

ताड़ासन का चमत्कारिक प्रयोग



ताड़ासन करने से प्राण ऊपर के केन्द्रों में आ जाते हैं जिससे पुरुषों के वीर्यस्राव एवं स्त्रियों के प्रदररोग की तकलीफ में तुरंत ही लाभ होता है।

वीर्यस्राव क्यों होता है ? जब पेट में दबाव (Intro-abdominal pressure) बढ़ता है तब वीर्यस्राव होता है। इस दबाव(प्रेशर) के बढ़ने के कारण इस प्रकार है-

ठूँस-ठूँसकर खाना, बार-बार खाना, कब्जियत, गैस होने पर भी वायु करे ऐसी आलू, गवारफली, भिंडी, तली हुई चीजों का अधिक सेवन एवं अधिक भोजन, लैंगिक (सैक्स सम्बन्धी) विचार, चलचित्र देखने एवं पत्रिकाएँ पढ़ने से।

इस दबाव के बढ़ने से प्राण नीचे के केन्द्रों मे, नाभि से नीचे मूलाधार केन्द्र में आ जाते हैं जिसकी वजह से वीर्यस्राव हो जाता है। इस प्रकार के दबार के कारण हर्निया की बीमारी भी हो जाती है।

ताड़ासन की विधिः

सर्वप्रथम एकदम सीधे खड़े होकर हाथ ऊँचे रखें। फिर पैरों के पंजों के बल पर खड़े होकर रहें एवं दृष्टि ऊपर की ओर रखें। ऐसा दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) 5-10 मिनट तक करें।

यदि पैरों के पंजों पर खड़े न हो सकें तो जैसे अनुकूल हो वैसे खड़े रहकर भी यह आसन किया जा सकता है।

यह आसन बैठे-बैठे भी किया जा सकता है। जब भी काम(सेक्स) सम्बन्धी विचार आयें तब हाथ ऊँचे करके दृष्टि ऊपर की ओर करनी चाहिए।

कुछ उपयोगी बातें



घी, दूध, मूँग, गेहूँ, लाल साठी चावल, आँवले, हरड़े, शुद्ध शहद, अनार, अंगूर, परवल – ये सभी के लिए हितकर हैं।

अजीर्ण एवं बुखार में उपवास हितकर है।

दही, पनीर, खटाई, अचार, कटहल, कुन्द, मावे की मिठाइयाँ – से सभी के लिए हानिकारक हैं।

अजीर्ण में भोजन एवं नये बुखार में दूध विषतुल्य है। उत्तर भारत में अदरक के साथ गुड़ खाना अच्छा है।

मालवा प्रदेश में सूरन(जमिकंद) को उबालकर काली मिर्च के साथ खाना लाभदायक है।

अत्यंत सूखे प्रदेश जैसे की कच्छ, सौराष्ट्र आदि में भोजन के बाद पतली छाछ पीना हितकर है।

मुंबई, गुजरात में अदरक, नींबू एवं सेंधा नमक का सेवन हितकर है।

दक्षिण गुजरात वाले पुनर्नवा(विषखपरा) की सब्जी का सेवन करें अथवा उसका रस पियें तो अच्छा है।

दही की लस्सी पूर्णतया हानिकारक है। दहीं एवं मावे की मिठाई खाने की आदतवाले पुनर्नवा का सेवन करें एवं नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग करें तो लाभप्रद हैं।

शराब पीने की आदवाले अंगूर एवं अनार खायें तो हितकर है।

आँव होने पर सोंठ का सेवन, लंघन (उपवास) अथवा पतली खिचड़ी और पतली छाछ का सेवन लाभप्रद है।

अत्यंत पतले दस्त में सोंठ एवं अनार का रस लाभदायक है।

आँख के रोगी के लिए घी, दूध, मूँग एवं अंगूर का आहार लाभकारी है।

व्यायाम तथा अति परिश्रम करने वाले के लिए घी और इलायची के साथ केला खाना अच्छा है।

सूजन के रोगी के लिए नमक, खटाई, दही, फल, गरिष्ठ आहार, मिठाई अहितकर है।

यकृत (लीवर) के रोगी के लिए दूध अमृत के समान है एवं नमक, खटाई, दही एवं गरिष्ठ आहार विष के समान हैं।

वात के रोगी के लिए गरम जल, अदरक का रस, लहसुन का सेवन हितकर है। लेकिन आलू, मूँग के सिवाय की दालें एवं वरिष्ठ आहार विषवत् हैं।

कफ के रोगी के लिए सोंठ एवं गुड़ हितकर हैं परंतु दही, फल, मिठाई विषवत् हैं।

पित्त के रोगी के लिए दूध, घी, मिश्री हितकर हैं परंतु मिर्च-मसालेवाले तथा तले हुए पदार्थ एवं खटाई विषवत् हैं।

अन्न, जल और हवा से हमारा शरीर जीवनशक्ति बनाता है। स्वादिष्ट अन्न व स्वादिष्ट व्यंजनों की अपेक्षा साधारण भोजन स्वास्थ्यप्रद होता है। खूब चबा-चबाकर खाने से यह अधिक पुष्टि देता है, व्यक्ति निरोगी व दीर्घजीवी होता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि प्राकृतिक पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के सिवाय जीवनशक्ति भी है। एक प्रयोग के अनुसार हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से कृत्रिम पानी बनाया गया जिसमें खास स्वाद न था तथा मछली व जलीय प्राणी उसमें जीवित न रह सके।

बोतलों में रखे हुए पानी की जीवनशक्ति क्षीण हो जाती है। अगर उसे उपयोग में लाना हो तो 8-10 बार एक बर्तन से दूसरे बर्तन में उड़ेलना (फेटना) चाहिए। इससे उसमें स्वाद और जीवनशक्ति दोनों आ जाते हैं। बोतलों में या फ्रिज में रखा हुआ पानी स्वास्थ्य का शत्रु है। पानी जल्दी-जल्दी नहीं पीना चाहिए। चुसकी लेते हुए एक-एक घूँट करके पीना चाहिए जिससे पोषक तत्त्व मिलें।

वायु में भी जीवनशक्ति है। रोज सुबह-शाम खाली पेट, शुद्ध हवा में खड़े होकर या बैठकर लम्बे श्वास लेने चाहिए। श्वास को करीब आधा मिनट रोकें, फिर धीरे-धीरे छोड़ें। कुछ देर बाहर रोकें, फिर लें। इस प्रकार तीन प्राणायाम से शुरुआत करके धीरे-धीरे पंद्रह तक पहुँचे। इससे जीवनशक्ति बढ़ेगी, स्वास्थ्य-लाभ होगा, प्रसन्नता बढ़ेगी।

पूज्य बापू जी सार बात बताते हैं, विस्तार नहीं करते। 93 वर्ष तक स्वस्थ जीवन जीने वाले स्वयं उनके गुरुदेव तथा ऋषि-मुनियों के अनुभवसिद्ध ये प्रयोग अवश्य करने चाहिए।

स्वास्थ्य और शुद्धिः

उदय, अस्त, ग्रहण और मध्याह्न के समय सूर्य की ओर कभी न देखें, जल में भी उसकी परछाई न देखें।

दृष्टि की शुद्धि के लिए सूर्य का दर्शन करें।

उदय और अस्त होते चन्द्र की ओर न देखें।

संध्या के समय जप, ध्यान, प्राणायाम के सिवाय कुछ भी न करें।

साधारण शुद्धि के लिए जल से तीन आचमन करें।

अपवित्र अवस्था में और जूठे मुँह स्वाध्याय, जप न करें।

सूर्य, चन्द्र की ओर मुख करके कुल्ला, पेशाब आदि न करें।

मनुष्य जब तक मल-मूत्र के वेगों को रोक कर रखता है तब तक अशुद्ध रहता है।

सिर पर तेल लगाने के बाद हाथ धो लें।

रजस्वला स्त्री के सामने न देखें।

ध्यानयोगी ठंडे जल से स्नान न करे।

अपने हाथ में ही अपना आरोग्य



नाक को रोगरहित रखने के लिये हमेशा नाक में सरसों या तिल आदि तेल की बूँदें डालनी चाहिए। कफ की वृद्धि हो या सुबह के समय पित्त की वृद्धि हो अथवा दोपहर को वायु की वृद्धि हो तब शाम को तेल की बूँदें डालनी चाहिए। नाक में तेल की बूँदे डालने वाले का मुख सुगन्धित रहता है, शरीर पर झुर्रियाँ नहीं पड़तीं, आवाज मधुर होती है, इन्द्रियाँ निर्मल रहती हैं, बाल जल्दी सफेद नहीं होते तथा फुँसियाँ नहीं होतीं।

अंगों को दबवाना, यह माँस, खून और चमड़ी को खूब साफ करता है, प्रीतिकारक होने से निद्रा लाता है, वीर्य बढ़ाता है तथा कफ, वायु एवं परिश्रमजन्य थकान का नाश करता है।

कान में नित्य तेल डालने से कान में रोग या मैल नहीं होती। बहुत ऊँचा सुनना या बहरापन नहीं होता। कान में कोई भी द्रव्य (औषधि) भोजन से पहले डालना चाहिए।

नहाते समय तेल का उपयोग किया हो तो वह तेल रोंगटों के छिद्रों, शिराओं के समूहों तथा धमनियों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को तृप्त करता है तथा बल प्रदान करता है।

शरीर पर उबटन मसलने से कफ मिटता है, मेद कम होता है, वीर्य बढ़ता है, बल प्राप्त होता है, रक्तप्रवाह ठीक होता है, चमड़ी स्वच्छ तथा मुलायम होती है।

दर्पण में देहदर्शन करना यह मंगलरूप, कांतिकारक, पुष्टिदाता है, बल तथा आयुष्य को बढ़ानेवाला है और पाप तथा दारिद्रय का नाश करने वाला है

(भावप्रकाश निघण्टु)

जो मनुष्य सोते समय बिजौरे के पत्तों का चूर्ण शहद के साथ चाटता है वह सुखपूर्वक स सकता है, खर्राटे नहीं लेता।

जो मानव सूर्योदय से पूर्व, रात का रखा हुआ आधा से सवा लीटर पानी पीने का नियम रखता है वह स्वस्थ रहता है।

सुखमय जीवन की कुंजियाँ



सनातन संस्कृति का महाभारत जैसा ग्रन्थ भी ईश्वरीय ज्ञान के साथ शरीर-स्वास्थ्य की कुंजियाँ धर्मराज युधिष्ठिर को पितामह भीष्म के द्वारा दिये गये उपदेशों के माध्यम से हम तक पहुँचता है। जीवन को सम्पूर्ण रूप से सुखमय बनाने का उन्नत ज्ञान सँजोये रखा है हमारे शास्त्रों नेः

सदाचार से मनुष्य को आयु, लक्ष्मी तथा इस लोक और परलोक में कीर्ति की प्राप्ति होती है। दुराचारी मनुष्य इस संसार में लम्बी आयु नहीं पाता, अतः मनुष्य यदि अपना कल्याण करना चाहता हो तो क्यों न हो, सदाचार उसकी बुरी प्रवृत्तियों को दबा देता है। सदाचार धर्मनिष्ठ तथा सच्चरित्र पुरुषों का लक्षण है।

सदाचार ही कल्याण का जनक और कीर्ति को बढ़ानेवाला है, इसी से आयु की वृद्धि होती है और यही बुरे लक्षणों का नाश करता है। सम्पूर्ण आगमों में सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया गया है। सदाचार से धर्म उत्पन्न होता है और धर्म के प्रभाव से आयु की वृद्धि होती है।

जो मनुष्य धर्म का आचरण करते हैं और लोक कल्याणकारी कार्यों में लगे रहते हैं, उनके दर्शन न हुए हों तो भी केवल नाम सुनकर मानव-समुदाय उनमें प्रेम करने लगता है। जो मनुष्य नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, धर्म को न जानने वाले, दुराचारी, शीलहीन, धर्म की मर्यादा को भंग करने वाले तथा दूसरे वर्ण की स्त्रियों से संपर्क रखने वाले हैं, वे इस लोक में अल्पायु होते हैं और मरने के बाद नरक में पड़ते हैं। जो सदैव अशुद्ध व चंचल रहता है, नख चबाता है, उसे दीर्घायु नहीं प्राप्त होती। ईर्ष्या करने से, सूर्योदय के समय और दिन में सोने से आयु क्षीण होती है। जो सदाचारी, श्रद्धालु, ईर्ष्यारहित, क्रोधहीन, सत्यवादी, हिंसा न करने वाला, दोषदृष्टि से रहित और कपटशून्य है, उसे दीर्घायु प्राप्त होती है।

प्रतिदिन सूर्योदय से एक घंटा पहले जागकर धर्म और अर्थ के विषय में विचार करे। मौन रहकर दंतधावन करे। दंतधावन किये बिना देव पूजा व संध्या न करे। देवपूजा व संध्या किये बिना गुरु, वृद्ध, धार्मिक, विद्वान पुरुष को छोड़कर दूसरे किसी के पास न जाय। सुबह सोकर उठने के बाद पहले माता-पिता, आचार्य तथा गुरुजनों को प्रणाम करना चाहिए।

सूर्योदय होने तक कभी न सोये, यदि किसी दिन ऐसा हो जाय तो प्रायश्चित करे, गायत्री मंत्र का जप करे, उपवास करे या फलादि पर ही रहे।

स्नानादि से निवृत्त होकर प्रातःकालीन संध्या करे। जो प्रातःकाल की संध्या करके सूर्य के सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीर्थों में स्नान का फल मिलता है और वह सब पापों से छुटकारा पा जाता है।

सूर्योदय के समय ताँबे के लोटे में सूर्य भगवान को जल(अर्घ्य) देना चाहिए। इस समय आँखें बन्द करके भ्रूमध्य में सूर्य की भावना करनी चाहिए। सूर्यास्त के समय भी मौन होकर संध्योपासना करनी चाहिए। संध्योपासना के अंतर्गत शुद्ध व स्वच्छ वातावरण में प्राणायाम व जप किये जाते हैं।

नियमित त्रिकाल संध्या करने वाले को रोजी रोटी के लिए कभी हाथ नहीं फैलाना पड़ता ऐसा शास्त्रवचन है। ऋषिलोग प्रतिदिन संध्योपासना से ही दीर्घजीवी हुए हैं।

वृद्ध पुरुषों के आने पर तरुण पुरुष के प्राण ऊपर की ओर उठने लगते हैं। ऐसी दशा में वह खड़ा होकर स्वागत और प्रणाम करता है तो वे प्राण पुनः पूर्वावस्था में आ जाते हैं।

किसी भी वर्ण के पुरुष को परायी स्त्री से संसर्ग नहीं करना चाहिए। परस्त्री सेवन से मनुष्य की आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। इसके समान आयु को नष्ट करने वाला संसार में दूसरा कोई कार्य नहीं है। स्त्रियों के शरीर में जितने रोमकूप होते हैं उतने ही हजार वर्षों तक व्यभिचारी पुरुषों को नरक में रहना पड़ता है। रजस्वला स्त्री के साथ कभी बातचीत न करे।

अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि को स्त्री-समागम न करे। अपनी पत्नी के साथ भी दिन में तथा ऋतुकाल के अतिरिक्त समय में समागम न करे। इससे आयु की वृद्धि होती है। सभी पर्वों के समय ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। यदि पत्नी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय तथा उसे भी अपने निकट न बुलाये। शास्त्र की अवज्ञा करने से जीवन दुःखमय बनता है।

दूसरों की निंदा, बदनामी और चुगली न करें, औरों को नीचा न दिखाये। निंदा करना अधर्म बताया गया है, इसलिए दूसरों की और अपनी भी निंदा नहीं करनी चाहिए। क्रूरताभरी बात न बोले। जिसके कहने से दूसरों को उद्वेग होता हो, वह रूखाई से भरी हुई बात नरक में ले जाने वाली होती है, उसे कभी मुँह से न निकाले। बाणों से बिंधा हुआ फरसे से काटा हुआ वन पुनः अंकुरित हो जाता है, किंतु दुर्वचनरूपी शस्त्र से किया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता।

हीनांग(अंधे, काने आदि), अधिकांग(छाँगुर आदि), अनपढ़, निंदित, कुरुप, धनहीन और असत्यवादी मनुष्यों की खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए।

नास्तिकता, वेदों की निंदा, देवताओं के प्रति अनुचित आक्षेप, द्वेष, उद्दण्डता और कठोरता – इन दुर्गुणों का त्याग कर देना चाहिए।

मल-मूत्र त्यागने व रास्ता चलने के बाद तथा स्वाध्याय व भोजन करने से पहले पैर धो लेने चाहिए। भीगे पैर भोजन तो करे, शयन न करे। भीगे पैर भोजन करने वाला मनुष्य लम्बे समय तक जीवन धारण करता है।

परोसे हुए अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। मौन होकर एकाग्रचित्त से भोजन करना चाहिए। भोजनकाल में यह अन्न पचेगा या नहीं, इस प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। भोजन के बाद मन-ही-मन अग्नि का ध्यान करना चाहिए। भोजन में दही नहीं, मट्ठा पीना चाहिए तथा एक हाथ से दाहिने पैर के अँगूठे पर जल छोड़ ले फिर जल से आँख, नाक, कान व नाभि का स्पर्श करे।

पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से दीर्घायु और उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से सत्य की प्राप्ति होती है। भूमि पर बैठकर ही भोजन करे, चलते-फिरते भोजन कभी न करे। किसी दूसरे के साथ एक पात्र में भोजन करना निषिद्ध है।

जिसको रजस्वला स्त्री ने छू दिया हो तथा जिसमें से सार निकाल लिया गया हो, ऐसा अन्न कदापि न खाय। जैसे – तिलों का तेल निकाल कर बनाया हुआ गजक, क्रीम निकाला हुआ दूध, रोगन(तेल) निकाला हुआ बादाम(अमेरिकन बादाम) आदि।

किसी अपवित्र मनुष्य के निकट या सत्पुरुषों के सामने बैठकर भोजन न करे। सावधानी के साथ केवल सवेरे और शाम को ही भोजन करे, बीच में कुछ भी खाना उचित नहीं है। भोजन के समय मौन रहना और  आसन पर बैठना उचित है। निषिद्ध पदार्थ न खाये।

रात्रि के समय खूब डटकर भोजन न करें, दिन में भी उचित मात्रा में सेवन करे। तिल की चिक्की, गजक और तिल के बने पदार्थ भारी होते हैं। इनको पचाने में जीवनशक्ति अधिक खर्च होती है इसलिए इनका सेवन स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है।

जूठे मुँह पढ़ना-पढ़ाना, शयन करना, मस्तक का स्पर्श करना कदापि उचित नहीं है।

यमराज कहते हैं- '' जो मनुष्य जूठे मुँह उठकर दौड़ता और स्वाध्याय करता है, मैं उसकी आयु नष्ट कर देता हूँ। उसकी संतानों को भी उससे छीन लेता हूँ। जो संध्या आदि अनध्याय के समय भी अध्ययन करता है उसके वैदिक ज्ञान और आयु का नाश हो जाता है।" भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र इन त्रिविध तेजों की कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिए।

मलिन दर्पम में मुँह न देखे। उत्तर व पश्चिम की ओर सिर करके कभी न सोये, पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर ही सिर करके सोये।

नास्तिक मनुष्यों के साथ कोई प्रतिज्ञा न करे। आसन को पैर से खींचकर या फटे हुए आसन पर न बैठे। रात्रि में स्नान न करे। स्नान के पश्चात तेल आदि की मालिश न करे। भीगे कपड़े न पहने।

गुरु के साथ कभी हठ नहीं ठानना चाहिए। गुरु प्रतिकूल बर्ताव करते हों तो भी उनके प्रति अच्छा बर्ताव करना ही उचित है। गुरु की निंदा मनुष्यों की आयु नष्ट कर देती है। महात्माओं की निंदा से मनुष्य का अकल्याण होता है।

सिर के बाल पकड़कर खींचना और मस्तक पर प्रहार करना वर्जित है। दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलाये।

बारंबार मस्तक पर पानी न डाले। सिर पर तेल लगाने के बाद उसी हाथ से दूसरे अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए। दूसरे के पहने हुए कपड़े, जूते आदि न पहने।

शयन, भ्रमण तथा पूजा के लिए अलग-अलग वस्त्र रखें। सोने की माला कभी भी पहनने से अशुद्ध नहीं होती।

संध्याकाल में नींद, स्नान, अध्ययन और भोजन करना निषिद्ध है। पूर्व या उत्तर की मुँह करके हजामत बनवानी चाहिए। इससे आयु की वृद्धि होती है। हजामत बनवाकर बिना नहाय रहना आयु की हानि करने वाला है।

जिसके गोत्र और प्रवर अपने ही समान हो तथा जो नाना के कुल में उत्पन्न हुई हो, जिसके कुल का पता न हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए। अपने से श्रेष्ठ या समान कुल में विवाह करना चाहिए।

तुम सदा उद्योगी बने रहो, क्योंकि उद्योगी मनुष्य ही सुखी और उन्नतशील होता है। प्रतिदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओं के जीवनचरित्र का श्रवण करना चाहिए। इन सब बातों का पालन करने से मनुष्य दीर्घजीवी होता है।

पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने सब वर्ण के लोगों पर दया करके यह उपदेश दिया था। यह यश, आयु और स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला तथा परम कल्याण का आधार है।

टॉन्सिल्स



यह रोग बालक, युवा, प्रौढ़ – सभी को होता है किंतु बालकों में विशेष रूप से पाया जाता है। जिन बालकों की कफ-प्रकृति होती है, उनमें यह रोग देखने में आता है। गला कफ का स्थान होता है। बच्चों को मीठे पदार्थ और फल ज्यादा खिलाने से, बच्चों के अधिक सोने से(विशेषकर दिन में) उनके गले में कफ एकत्रित होकर गलतुण्डिका शोथ(टॉन्सिल्स की सूजन) रोग हो जाता है। इससे गले में खाँसी, खुजली एवं दर्द के साथ-साथ सर्दी एवं ज्वर रहता है, जिससे बालकों को खाने-पीने में व नींद में तकलीफ होती है।

बार-बार गलतुण्डिका शोथ होने से शल्यचिकित्सक(सर्जन) तुरंत शल्यक्रिया करने की सलाह देते हैं। अगर यह औषधि से शल्यक्रिया से गलतुण्डिका शोथ दूर होता है, लेकिन उसके कारण दूर नहीं होते। उसके कारण के दूर नहीं होने से छोटी-मोटी तकलीफें मिटती नहीं, बल्कि बढ़ती रहती हैं।

40 वर्ष पहले एक विख्यात डॉक्टर ने रीडर्स डायजेस्ट में एक लेख लिखा था जिसमें गलतुण्डिका शोथ की शल्यक्रिया करवाने को मना किया था।

बालकों ने गलतुण्डिका शोथ की शल्यक्रिया करवाना – यह माँ-बाप के लिए महापाप है क्योंकि ऐसा करने से बालकों की जीवनशक्ति का ह्रास होता है।

निसर्गोपचारक श्री धर्मचन्द्र सरावगी ने लिखा हैः 'मैंने टॉन्सिल्स के सैंकड़ों रोगियों को बिना शल्यक्रिया के ठीक होते देखा है।'

कुछ वर्ष पहले इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया के पुरुषों ने अनुभव किया कि टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया से पुरुषत्व में कमी आ जाती है और स्त्रीत्व के कुछ लक्षण उभरने लगते हैं।

इटालियन कान्सोलेन्ट, मुंबई से प्रकाशित इटालियन कल्चर नामक पत्रिका के अंक नं. 1,2,3 (सन् 1955) में भी लिखा थाः 'बचपन में टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया करानेवालों के पुरुषत्व में कमी आ जाती है। बाद में डॉ. नोसेन्ट और गाइडो कीलोरोली ने 1973 में एक कमेटी की स्थापना कर इस पर गहन शोधकार्य किया। 10 विद्वानों ने ग्रेट ब्रिटेन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के लाखों पुरुषों पर परीक्षण करके उपर्युक्त परिणाम पाया तथा इस खतरे को लोगों के सामने रखा।

शोध का परिणाम जब लोगों को जानने को मिला तो उन्हें आश्चर्य हुआ ! टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया से सदा थकान महसूस होती है तथा पुरुषत्व में कमी आने के कारण जातीय सुख में भी कमी हो जाती है और बार-बार बीमारी होती रहती है। जिन-जिन जवानों के टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया हुई थी, वे बंदूक चलाने में कमजोर थे, ऐसा युद्ध के समय जानने में आया।

जिन बालकों के टॉन्सिल्स बढ़े हों ऐसे बालकों को बर्फ का गोला, कुल्फी, आइसक्रीम, बर्फ का पानी, फ्रिज का पानी, चीनी, गुड़, दही, केला, टमाटर, उड़द, ठंडा पानी, खट्टे-मीठे पदार्थ, फल, मिठाई, पिपरमिंट, बिस्कुट, चॉकलेट ये सब चीजें खाने को न दें। जो आहार ठंडा, चिकना, भारी, मीठा, खट्टा और बासी हो, वह उन्हें न दें।

दूध भी थोड़ा सा और वह भी डालकर दें। पानी उबला हुआ पिलायें।

उपचार

टान्सिल्स के उपचार के लिए हल्दी सर्वश्रेष्ठ औषधि है। इसका ताजा चूर्ण टॉन्सिल्स पर दबायें, गरम पानी से कुल्ले करवायें और गले के बाहरी भाग पर इसका लेप करें तथा इसका आधा-आधा ग्राम चूर्ण शहद में मिलाकर बार-बार चटाते रहें।

दालचीनी के आधे ग्राम से 2 ग्राम महीन पाऊडर को 20 से 30 ग्राम शहद में मिलाकर चटायें।

टॉन्सिल्स के रोगी को अगर कब्ज हो तो उसे हरड़ दे। मुलहठी चबाने को दें। 8 से 20 गोली खदिरादिवटी या यष्टिमधु धनवटी या लवंगादिवटी चबाने को दें।

कांचनार गूगल का 1 से 2 ग्राम चूर्ण शहद के साथ चटायें।

कफकेतु रस या त्रिभुवन कीर्तिरस या लक्ष्मीविलास रस(नारदीय) 1 से 2 गोली देवें।

आधे से 2 चम्मच अदरक का रस शहद में मिलाकर देवें।

त्रिफला या रीठा या नमक या फिटकरी के पानी से बार-बार कुल्ले करवायें।

सावधानी

गले में मफलर या पट्टी लपेटकर रखनी चाहिए।

Sunday, July 12, 2015

गंजेपन का सफल इलाज:-


 दिनों से देख रहा हूँ के लोग बालो कि समसया से काफ़ी परेशान हैं. जैसे की बाल झड़ना या बाल रहना ही ना.... तो उन सबके लिए एक बहुत ही आसान सा उपाय बता रहा हूँ कृपया लाभ उठायें...... 


कनेर के 60-70 ग्राम पत्ते (लाल या पीली दोनों में से कोई भी या दोनों ही एक साथ ) ले के उन्हें पहले अच्छे से सूखे कपडे से साफ़ कर लें ताकि उनपे जो मिटटी है वो निकल जाये.,. अब एक लीटर सरसों का तेल या नारियल का तेल या जेतून का तेल ले के उसमे पत्ते काट काट के डाल दें. अब तेल को गरम करने के लिए रख दें. जब सारे पत्ते जल कर काले पड़ जाएँ तो उन्हें निकाल कर फेंक दें और तेल को ठण्डा कर के छान लें और किसी बोटल में भर के रख लें.....
पर्योग विधि :- रोज़ जहाँ जहाँ पर भी बाल नहीं हैं वहां वहां थोडा सा तेल ले के बस 2 मिनट मालिश करनी है और बस फिर भूल जाएँ अगले दिन तक. ये आप रात को सोते हुए भी लगा सकते हैं और दिन में काम पे जाने से पहले भी... बस एक महीने में आपको असर दिखना शुरू हो जायेगा.. सिर्फ 10 दिन के अन्दर अन्दर बाल झड़ने बंद हो जायेंगे या बहुत ही कम... और नए बाल भी एक महीने तक आने शुरू हो जायेंगे......
नोट : ये उपाय पूरी तरह से tested है.. हमने कम से कम भी 10 लोगो पे इसका सफल परीक्षण किया है. एक औरत के 14 साल से बाल झड़ने बंद नहीं हो रहे थे. इस तेल से मात्र 6 दिन में बाल झड़ने बंद हो गये.

Saturday, April 18, 2015

डायबिटीज, कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों से बचाती हैं ये सब्जियां


 खाने में लापरवाही और बेवक्त का खान-पान शरीर में कई सारी बीमारियों को पनाह देता है, इसलिए किसी भी बीमारी के होने पर डॉक्टर सबसे पहले खाने में सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। अगर हेल्दी रहने के साथ-साथ डॉक्टर के क्लिनिक के चक्करों से बचना चाहते हैं, तो अपनी डेली डाइट में सिर्फ कुछ सब्जियों को शामिल करके कई प्रकार की बीमारियों से बचा जा सकता है। कुछ ऐसी ही सब्जियों के बारे में जानिए और कोशिश करके हफ्ते में दो से तीन बार इन्हें जरूर खाएं।
मटर कोलेस्ट्रॉल संतुलित करता है
हरे मटर खाने से कोलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता और साथ ही शरीर में इसका संतुलन भी बना रहता है। इसमें बॉडी में ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को कम करने का गुण होता है। हरे मटर में ऐसे विटामिन होते हैं जो ऑस्टियोपोरोसिस से बचाते हैं। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर ने एक स्टडी में बताया कि मटर खाने से पेट के कैंसर होने का खतरा कम होता है। मटर में एंटी-इंफ्लेमेटरी कंपाउंड्स होते हैं और इसमें प्रचुर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स भी पाए जाते हैं। ये आपको दिल की बीमारियों से भी बचाते हैं।
Other Vegetable and benefits: पालक आंखों के लिए फायदेमंद है, भिंडी डायबिटीज के रोगियों के लिए अच्छी है, चुकंदर कैंसर को रोकता है, करेला ब्लड शुगर कम करता है, लौकी मोटापा रोकने में कारगर है।

रफ बालों को सिल्की और शाइनी बनाने के 5 आसान तरीके


बाल यदि खूबसूरत हो तो व्यक्तित्व ज्यादा आकर्षक लगता है। चाहे पुरुष हो या महिलाएं सभी अपने बालों को शाइनी और सिल्की बनाने के लिए तरह-तरह के प्रोडक्ट्स यूज करते हैं, लेकिन इन प्रोड्क्टस से बालों को नुकसान होने का डर भी बना रहता है। इसीलिए घरेलू कंडिशनर ही बालों के लिए ज्यादा अच्छे होते हैं। यदि आप भी अपने रफ बालों से परेशान हैं तो आगे बताए गए घरेलू कंडिशनर अपनाएं। बाल सिल्की और शाइनी बन जाएंगे।
- एक कप बीयर को किसी बर्तन में गर्म करें, तब तक गर्म करें, जब तक वह आधा कप न रह जाए। गर्म करने से बीयर में से अल्कोहल भाप बनकर उड़ जाता है। अब इसे ठंडा होने दें, फिर उसमें एक कप अपना पसंदीदा शैम्पू मिला लें, याद रखें शैम्पू जो भी यूज करें, एक ही ब्रांड का हो। इस घोल को किसी बोतल में भरकर रख लें। जब भी बाल धोना हों इससे बाल धोएं, बेजान बाल भी चमकदार और खूबसूरत बन जाएंगे।
- केला बालों के लिए बहुत अच्छा माना गया है। केले को पीस लें और उसमें कुछ बूंदे शहद की डालें। इस पेस्ट को अपने सिर पर लगाएं और 30 मिनट के लिए छोड़ दें। फिर ठंडे पानी से बाल धो लें।
- अपने बालों को शैंपू से धोने के बाद बीयर की कुछ बूंदे पानी में डालें और फिर उससे बालों को एक बार धोएं। बीयर से आपके बालों में चमक आएगी और वे प्राकृतिक रूप से मजबूत भी होगें।
- बालों को शाइनी बनाने के लिए शैंपू करने से पहले बालों में दही लगाएं। अगर सिर में रुसी है तो दही में थोड़ा नींबू का रस मिलाकर लगाएं। बाल स्मूथ हो जाएंगे।
- नारियल के तेल में नीम, तुलसी, शिकाकाई, मेथी, आंवले की पत्तियां डालकर उबाल लें व छानकर रख लें। इस तेल से पूरे सिर की मालिश करें और चमत्कार देखें।

साधारण घरेलू चीजें, इन्हें खाने से बढ़ने लगती है याददाश्त


क्या आप अक्सर छोटी-छोटी बातें भूल जाते हैं। क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप जरूरी बात भी भूल गए हों। जिन लोगों की भूलने की आदत होती है, वे बाद में कोई बात याद आने पर ये सोचते हैं कि इतनी जरूरी बात भूल कैसे गए। आज हम बताने जा रहे हैं कुछ खास ब्रेन फूड्स के बारे में। ये ब्रेन फूड ऐसे हैं, जिन्हें खाने से अल्जाइमर रोग नहीं होता है। साथ ही, दिमाग की ताकत भी बढ़ती है।
टमाटर- खट्टा-मीठा टमाटर खाने के जायके को बढ़ाता है। टमाटर में प्रोटीन, विटामिन, वसा आदि पाए जाते हैं। इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होती है। टमाटर में लाइकोपीन होता है। यह शरीर की फ्री रैडिकल्स से रक्षा करता है। साथ ही, यह ब्रेन की सेल्स को डैमेज होने से भी बचाता है।
जैतून- जैतून केवल आपके स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि आपके चेहरे के लिए भी लाभदायक है। जैतून में अच्छी मात्रा में फैट पाया जाता है। इसलिए यह याददाश्त बढ़ाने का काम भी करता है।
दही- दही में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज, लवण, कैल्शियम और फॉस्फोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। दही का नियमित सेवन करने से कई लाभ होते हैं। यह शरीर में लाभदायी जीवाणुओं की बढ़ोत्तरी करता है और हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है। इसमें अमीनो एसिड पाया जाता है, जिससे दिमागी तनाव दूर होता है और याददाश्त बढ़ती है।
जायफल- जायफल को अपने विशेष स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। इसमें ऐसे तत्व होते हैं, जो दिमाग को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। साथ ही, याददाश्त को बेहतर बनाते हैं।
तुलसी- तुलसी को हिंदू धर्म में देवी का रूप माना गया है। इसका उपयोग मसाले के रूप में भी किया जाता है। यह कई बीमारियों में औषधि का काम करती है। रोजाना तुलसी के 2-4 पत्ते खाने से बार-बार भूलने की बीमारी दूर हो जाती है।
अलसी- अलसी के बीज में बहुत सारा प्रोटीन और फाइबर होता है। इन्हें खाने से दिमाग तेज होता है।


केसर- केसर एक ऐसा मसाला है जो खाने के स्वाद को दोगुना कर देता है। केसर का उपयोग अनिद्रा दूर करने वाली दवाओं में किया जाता है। इसके सेवन से मस्तिष्क ऊर्जावान रहता है।

चाय- चाय में पाया जाने वाला पॉलीफिनॉल दिमाग को संतुलित रखने में मदद करता है। यह दिमाग को शांत और एकाग्र भी बनाता है। ग्रीन टी भी गुणों से भरपूर है। इसमें बहुत अधिक मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। इसीलिए इसके नियमित सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है। दिन भर में दो से तीन कप ग्रीन टी पीने से याददाश्त बढ़ती है।

हल्दी- हल्दी दिमाग के लिए एक अच्छी औषधि है। यह सिर्फ खाने के स्वाद और रंग में ही इजाफा नहीं करती है, बल्कि दिमाग को भी स्वस्थ रखती है। इसके नियमित सेवन से अल्जाइमर रोग नहीं होता है। साथ ही, यह दिमाग की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को रिपेयर करने का भी काम करती है।

अजवाइन की पत्तियां- यदि आप अपने खाने को अलग फ्लेवर देना चाहते हैं, तो अजवाइन की पत्तियों का उपयोग करें। अजवाइन की पत्तियां शरीर को स्वस्थ और जवान बनाए रखने में मदद करती हैं। दरअसल, अजवाइन की पत्तियों में पर्याप्त मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। इसीलिए यह दिमाग के लिए औषधि की तरह काम करती हैं। यही कारण है कि अरोमा थेरेपी में भी इसका उपयोग किया जाता है।
काली मिर्च- काली मिर्च में पेपरिन नाम का रसायन पाया जाता है। यह रसायन शरीर और दिमाग की कोशिकाओं को रिलैैक्स करता है। डिप्रेशन में यह रसायन जादू-सा काम करता है। इसीलिए यदि आप अपने दिमाग को स्वस्थ बनाए रखना चाहते हैं, तो खाने में काली मिर्च का उपयोग करें।
दालचीनी- अल्जाइमर रोगियों के लिए दालचीनी एक जबरदस्त दवा है। दालचीनी के नियमित सेवन से याददाश्त बढ़ती है और दिमाग स्वस्थ रहता है।

सरवाईकल स्पोंडीलाईटीस के लिए कुछ आयुर्वेदिक नुस्खे


उठने,बैठने ,खाने,पीने और सोने के ढंग न होने के कारण जीवनशैली से संबंधित समस्याएं आम हो चली हैं। इनमें ही एक समस्या जो अक्सर लोगों को परेशान करती है नाम है 'सरवाईकल स्पोंडीलाईटीस 'आयुर्वेद में ग्रीवाशूल के अंतर्गत इसका उपचार प्रचलित है। इसमें कुछ अनुभूत योग काफी लाभदायक हैं जिनका चिकित्सक के मार्गदर्शन में प्रयोग किया जाना उचित है।
1. धतूरे के बीज 10 ग्राम + रेवंदचीनी 8 ग्राम + सोंठ 7 ग्राम + गर्म तवे पर फ़ुलाई हुई सफ़ेद फिटकरी 6 ग्राम + इसी तरह फ़ुलाया हुआ सुहागा 6 ग्राम + बबूल का गोंद 6 ग्राम इन सब औषधियों को बारीक पीस लें और धतूरे के पत्तों के रस से गीला करके उड़द के दाने के (125मिलीग्राम यानी एक रत्ती ) बराबर गोलियां बना लें। इस गोली को दिन में केवल एक बार गर्म पानी से दोपहर का भोजन करने के बाद ही लेना चाहिए। ध्यान रहे खाली पेट दवा हरगिज न लें।
2. वातगजांकुश रस की 1 गोली दिन में दो बार सुबह-शाम दशमूल काढ़े के साथ दो चम्मच लेना भी लाभकारी होता है।
3. महामाष तेल की तीन-तीन बूंदे दोनो कानों व नाक में सुबह-शाम डालना भी लाभकारी होता है
4. आभादि गुग्गुल की एक एक गोली महारास्नादि काढ़े के साथ दस से पंद्रह मिली की मात्रा में खाली पेट लेना भी लाभदायक होता है। ये तो कुछ अनुभूत योग हैं इसके अलावा पंचकर्म चिकित्सा भी सरवाईकल स्पोंडीलाईटीस के रोगियों में काफी कारगर होती है।

नोट :उपरोक्त नुस्खे महज पाठकों की जानकारी हेतु अनुभूत योग के रूप में प्रकाशित किए गए हैं, जिनका चिकित्सक के निर्देशन में प्रयोग किया जाना नितांत आवश्यक है।

कटहल ना खाने वाले भी मुरीद हो जाएंगे, जब जान लेंगे ये गुुण


कटहल एक ऐसी सब्जी है जो कई औषधीय गुणों से भरपूर है, लेकिन फिर भी बहुत कम लोग हैं, जो इसका सेवन नियमित रूप से करते हैं। कटहल का वानस्पतिक नाम आर्टोकार्पस हेटेरोफिल्लस है। इसके फलों में कई महत्वपूर्ण कार्बोहाइड्रेट के अलावा कई विटामिन भी पाए जाते है। सब्जी के तौर पर खाने के अलावा कटहल का अचार और पापड़ भी बनाया जाता है। आदिवासी अंचलों में कटहल का उपयोग अनेक रोगों के इलाज में किया जाता है। चलिए आज जानते हैं कुछ ऐसे ही चुनिंदा हर्बल नुस्खों के बारे में...
अल्सर में है बेहतरीन दवा
कटहल की पत्तियों की राख अल्सर के इलाज के लिए बहुत उपयोगी होती है। हरी ताजा पत्तियों को साफ धोकर सुखा लें। सूखने के बाद पत्तियों का चूर्ण तैयार करें। पेट के अल्सर से ग्रस्त व्यक्ति को इस चूर्ण को खिलाएं। अल्सर में बहुत जल्दी आराम मिलेगा।
मुंह के छालों में असरदार
जिन लोगों को मुंह में बार-बार छाले होने की शिकायत हो, उन्हें कटहल की कच्ची पत्तियों को चबाकर थूकना चाहिए। आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार, यह छालों को ठीक कर देता है।

खाना जल्दी पचा देता है
पके हुए कटहल के गूदे को अच्छी तरह से मैश करके पानी में उबाल लें। इस मिश्रण को ठंडा कर एक गिलास पीने से जबरदस्त स्फूर्ति आती है। यही मिश्रण यदि अपच के शिकार रोगी को दिया जाए तो उसे फायदा मिलता है।
डायबिटीज में लाभदायक
डांग- गुजरात के आदिवासी कटहल की पत्तियों के रस का सेवन करने की सलाह डायबिटीज के रोगियों को देते हैं। यही रस हाई ब्लडप्रेशर के रोगियों के लिए भी उत्तम है।

सौंफ खाने के इन खास तरीकों से दूर हो जाती हैं ये हेल्थ प्रॉब्लम्स


भारतीय रसोई घर में सौंफ का महत्वपूर्ण स्थान है। सौंफ का उपयोग न सिर्फ कुछ खास व्यंजनों में किया जाता है, बल्कि भोजन के बाद भी सौंफ बहुत शौक से खाई जाती है। खाने के बाद थोड़ी सी सौंफ खाने से कैल्शियम, सोडियम, फास्फोरस, आयरन और पोटेशियम जैसे तत्व हमारे शरीर को प्राप्त होते हैं। पेट से संबंधित कुछ बीमारियों में भी सौंफ के कुछ घरेलू नुस्खे बहुत कारगर साबित होते हैं। आज हम आपको सौंफ के कुछ खास टिप्स बता रहे हैं-
1. प्रतिदिन 5-6 ग्राम सौंफ खाना लिवर और आंखों के लिए फायदेमंद होता है। अपच संबंधी विकारों में भी सौंफ का सेवन बेहद उपयोगी है। सौंफ को तवे पर थोड़ा-सा सेंक कर खाने से पेट के रोगों में आराम मिलता है।
2. गुड़ के साथ सौंफ खाने से महिलाओं का मासिक धर्म नियमित होता है। यदि गले में खराश हो जाए तो सौंफ चबाना चाहिए। सौंफ चबाने से बैठा हुआ गला साफ हो जाता है।
3. रोजाना सौंफ खाने से खून साफ होता है व रक्त से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है। खून साफ होने से त्वचा में भी चमक आ जाती है।
4. सौंफ के अर्क में 10 ग्राम शहद मिला कर इसका सेवन करें। खांसी में तत्काल आराम मिलेगा।
5. बेल का गूदा 10 ग्राम और 5 ग्राम सौंफ सुबह-शाम चबाकर खाने से अजीर्ण मिटता है और अतिसार में लाभ होता है।
6. सौंफ और मिश्री समान भाग में लेकर पीस लें। इसकी एक चम्मच मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ दो माह तक लें। इससे आंखों की कमजोरी दूर होती है तथा नेत्र ज्योति में वृद्धि होती है।


Monday, April 13, 2015

घमौरियां या प्रिकली हीट Gmurian or Prikli Heat



गर्मी के मौसम में पसीना आना स्वाभाविक है | इस पसीने को यदि साफ़ न किया जाए तो यह शरीर में ही सूख जाता है और इसकी वजह से शरीर में छोटे -छोटे दाने निकल आते हैं जिन्हें हम घमौरियां या प्रिकली हीट कहते हैं | घमौरी एक प्रकार का चर्म रोग है जो गर्मियों तथा बरसात में त्वचा पर हो जाता है | इसमें त्वचा पर छोटे -छोटे दाने निकल आते हैं ,जिनमें हर समय खुजली होती रहती है | घमौरियों से निजात पाने के लिए हम आपको कुछ सरल उपाय बताते हैं -

१- मेंहदी के पत्तों को पीसकर नहाने के पानी में मिला लें | इस पानी से नहाने से घमौरियां ठीक हो जाती हैं |

२- देसी घी की पूरे शरीर पर मालिश करने से घमौरियां मिटती हैं|

३- शरीर पर मुल्तानी मिटटी का लेप करने से घमौरियां मिटती हैं और इनसे होने वाली जलन और खुजली में भी राहत मिलती है |

४- नारियल के तेल में कपूर मिला लें | इस तेल से रोज़ पूरे शरीर की मालिश करने से घमौरियां दूर हो जाती हैं |

५- नीम की पत्तियां पानी में उबाल लें | इस पानी से स्नान करने से घमौरियां मिटती हैं |

६- तुलसी की लकड़ी पीस लें | इसे पानी में मिलकर शरीर पर मलने से घमौरियां समाप्त हो जाती हैं |

सेहत के नुस्खे Health tips3

गर्भिणी स्त्री (गर्भावस्था) में बवासीर हेतु

गर्भ की अवस्था में स्त्री को शौच (पाखाना) साफ होता रहे यह ध्यान रखना चाहिए। इस हेतु मुनक्का (बड़ी दाख) बीजेें निकालकर २५० ग्राम जल में धीमी अग्नि से उबालो चौथाई शेष रहने पर उतार कर मसलकर छानकर मिला दो। इससे दस्त होता है। ताकतवर भी है। इससे गर्भवती को परेशानी नहीं होती है। अथवा १ चम्मच त्रिफलाचूर्ण गर्म जल से पिलाओ।
बवासीर नाशक मन्त्र

ॐ भिभिति द्वि: ऊँ ठ: निवासिनि गरलं विषं संभव मनार्श नाशय नाशय फट स्वाहा। विधि— इस मंंत्र से ७ बार कुशों के द्वारा जल पढ़कर पीने से ७ दिन में बवासीर नष्ट होती है इसके अतिरिक्त निम्न दवाएँ भी ले सकते हैं। मरचादि चूर्ण, पपर्टीरस व्यौवाय चूर्ण। ये सभी दवाएँ वैद्यनाथ डाबर आदि कम्पनी की ले सकते हैं। अन्तर फिसर बवासीर जब पखाना (लेटरीन) कड़ी उतरने के कारण गुदा बवासीर में मस्से अवश्य होते हैं एवं कड़ी टट्टी जाने से छिल जाती उससे खून गिरने लगता है तो है वह खून उससे भी गिरता है जब तक खून नहीं गिरता है वह बवासीर नहीं है। क्योंकि इसमें मस्से नहीं होते। वादी बवासीर खून गिरने पर खूनी बवासीर कहलाती है। अत:(लग्जेटिव) रेचक दवा लेना एवं मल्हम चिकित्सा पीछे अनुसार करें। लगाना चाहिए।
तीक्ष्ण अग्नि की चिकित्सा

दाख, हरड़, कुटकी, विदारीकन्द, चन्दन, बाँसा (अहूसा) नागरमोथा, परबल, चिरायता, पीपल, खरेंटी, गोरख, मुन्डी, अतीस, बाल छड़, लोंग, पदमाख, भाँगरा, धनिया, खजूरिया, सभी बराबर—बराबर लेकर १/२ चम्मच चूर्ण १ चम्मच बूरा मिला गरम दूध में १ चम्मच घीं मिलाकर पिलाओ। इसे तीक्षण अग्नि समान होती है। दुबला शरीर पुष्ट होता है, शेध (सूजन) दाह अय पाण्डू हलीमक और कामला रोग ठीक होता है।
भस्मक रोग

१. विदारी कन्द का रस, घी और दूध मिलाकर पीने से भस्मक रोग दूर होता है।

२. ओधा (चिरचिरे) के बीज और दूध की खीर खाने से घोर भस्मक रोग दूर होता है। नोट—भस्मक रोग में व्यक्ति की खुराक बहुत होती है। क्षुधा तृप्त नहीं होती है किन्तु बहुत खाने के बाद भोजन उदर में भस्म हो जाता है। १५—१५ दिन महीनों तक टट्टी (पखाना) नहीं जाता है। और खाता बराबर रहता है।

३. बेर की गुठली के अन्दर के बीजों का चूर्ण १/२ चम्मच पानी से लेने पर भस्मक रोग ठीक हो जाता है। ज्वालामुखी चूर्ण/ (क्षुद्यावर्धक)

१. भूख बढ़ाने हेतु— हींग, अमलवेल, त्रिकुटा (सौंट, पीपर, पीपलमूर) चितावर की जड़, जवारवार, पोहर—कयूर, त्रिफला, (हर्र, बहेड़ा आँवला) और अनार, इन सभी को समान भाग लेकर महीन पीसकर छान कर रखें चूर्ण के वजन के बराबर पुराना गुड़ मिला दो १० ग्राम चूर्ण सुबह—शाम पानी से सेवन करें भूख बढ़ती है। हाजमा होता है। नोट—हीं घी में भूनकर डालें।

२. हिग्वाष्टक चूर्ण— सौंठ, मिर्च, पीपल, सेंधानमक, सफेद जीरा, कालाजीरा, अजमोद, ये सातों बराबर—बराबर चूर्ण पीस छानकर इनके आँठवा भाग हींग घी में भूनकर मिला दो। विधि— १ चम्मच चूर्ण ५ (ग्रास) रोटी महीन मीड़कर उसमें १ चम्मच घी डालकर उसी में चूर्ण मिला दें। फिर उसे भोजन में सबसे पहले ५ कौर खाएँ बाद मेें भोजन करते रहें। सभी प्रकार उदर शूल, एवं मदाग्नि दूर कर देता है।

३. दवानल चूर्ण— सेंधानमक १० ग्राम पीपलामूर २० ग्राम पीपर ३० ग्राम चव्च ५० ग्राम चीतू की छाल (चितावर) ५० ग्राम सौंठ ६० ग्राम हरड़ ६० ग्राम इन सबको कूट पीस कर छान लें।

४. हर्र, पीपल, सौंठ, ५०—० ग्राम प्रत्येक लेकर चूर्ण छान लो इसे (त्रिसम) कहते हैं। १/२—१/२ चम्मच चूर्ण पानी के साथ सेवन करें भूख बढ़ती है। प्यास शान्त होती है। छाछ (मट्ठे) में मन्दाग्नि नष्ट करने की पूरी सामथ्र्य है इसे ऋतु अनुसार इस प्रकार सेवन करना चाहिए। सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं। मट्ठे में सौंठ, कालीमिर्च, पीपल का चूर्ण मट्ठे की मात्रानुसार १ लीटर मट्ठे १० ग्राम चूर्ण एवं सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से सर्वरोग दूर होते हैं।

(१) पकी मीठी इमली के पने में सेंधानमक कालीमिर्च, और भुनी हींग थोड़ी डालकर पीने से मन्दाग्नि ठीक होती है। भूख बढ़ती है।

(२) चने का खार कुछ दिन सेवन करने से बिगड़ी पाचन शक्ति सुधर जाती है।
अजीर्ण (अपच) का उपचार

१. छोटी हरड़ सौंठ, नागकेशर, कालानमक, प्रत्येक, ५०—५० ग्राम लेकर चूर्ण कर लें। फिर ५ ग्राम में घी भूनी हींग मिला दें। १/२—१/२ चम्मच चूर्ण सुबह—दोहपर—शाम तीन बार पानी से सेवन करें हाजमा ठीक होगा।

२. भुना गटान का गटा, १० ग्राम भुनी पीपल १० ग्राम, अजवान १० ग्राम, सौंठ भुनी २० ग्राम, सेंधानमक २० ग्राम, सभी का चूर्ण बना लें। १—१ चम्मच चूर्ण सुबह—शाम पानी से सेवन से तीव्र भूख बढ़ती है एवं पाचन ठीक होता है।

३. भुनी हर्र का १—१ चम्मच चूर्ण गरम जल से लेने से मन्दाग्नि ठीक होती है।

४. कच्ची हर्र का चूर्ण गरम जल से लेने से दस्त साफ होता है।

५. पाचक पिप्पली— ्नाीबू के रस में सेंधानमक मिलाकर उसमें पीपले को डाल दो ४ दिन भीगी रहने दो बाद में निकालकर छाया में सुखा लो उसमें से उम्रानुसार १/२ या १ पीपल खाने से अजीर्ण नष्ट हो, स्वाद अच्छा हो, भूख बढ़ती है।

६. नीबू के रस में जायफल घिसकर पीने से दस्त साफ हो जाता है।

७. तारपीन के तेल में कपूर मिलाकर पेट पर मलने से वायु जनित पीड़ा ठीक होती है।
कृमि रोग (पेट के कीड़े नाशक) उपचार

१. ५ ग्राम खुरासानी अजवान पीसकर १० ग्राम गुड़ मिलाकर पीने से कोठें के सारे कृमि नष्ट हो जाते हैं।

२. अजवान और गुड़ खाने से कृमि नष्ट होते हैं।

३. ढाक (पलास) के बीजों का स्वरस पीने से कृमि नष्ट होते हैं।

४. ढाक के बीज ५ ग्राम पीस छाछ में पीने से कृमि नष्ट हों।

५. वायविंडग का चूर्ण गुड़ के साथ खाने से कीड़े नष्ट हो। सभी प्रयोगक अजमूदे हैं। अवश्य लाभ करते हैं।
गंजापन दूर हो / बाल जल्दी जमें

१. कड़वे परमल के पत्तों का रस लगाने से बाल जल्दी आ जाते हैं। अर्थात् गंजापन ठीक होता परीक्षित प्रयोग।

२. रीठे के पत्तों से सिर घोकर करंज का तेल नींबू का रस और कड़वे परवल के बीजों का तेल मिलाकर सिर पर लगाने से गंजापन ठीक होगा।
नींद (हेडिंग) आने की दवा

१. काक जंघा की जड़ सिर पर धारण करने से नींद आयेगी।

२. मकोय की जड़ को सूत में बाँधकर निरन्तर मस्तक पर धारण करने से नींद आएगी।

३. सर्पगन्धा जड़ी का चूर्ण २ १/२ ग्राम पानी के साथ सेवन से नींद आती है।

४. सर्पगन्धा घन बटी (डाबर/वैद्यनाथ वंâ) की २ गोली शाम को पानीसे लेने से नींद आएगी। हार्ट/बल्डप्रेसर को को भी आराम होता है।

५. आँग को बकरी के दूध में पीसकर पावों पर लेप करों नींद आएगी।

६. थूहर की जड़ को गुड के साथ खाने से अवश्य नींद आती है लगभग ५ ग्राम जड़ १० ग्राम गुड़ की १ खुराक पानी के साथ लेना।

७. अरण्डी का तेल और अलसी का तेल बराबर—बराबर लेकर काँसे की थाली में काँसे की कटोरी से घौंटकर आँखों में आँजो (लगाओ)। तत्काल नींद आवेगी आजमूदा प्रयोग है।

८. काली मिर्च और कस्तूरी बराबर—बराबर लेकर पानी में घिस कर नेत्रों में आँजने से ३ दिन से गई निद्रा भी आ जाती है। (कस्तूरी असली हो)
कान के रोग

१. कान का दर्द—अजवान के तेल की १० बूँद में शुद्ध सरसों का ३० बूँद तेल मिलाएँ, फिर उसे धीमी आग पर गुनगुना करके (ज्यादा गरम न हो) दर्द वाले कान में ४—४ बूँद तेल डालकर रूई का फाहा लगा दें। इसके पश्चात् बालू और अजवान मिलाकर पोटली बना लें। उसे हल्का गरम कर सिकाई करें (कान में आजू बाजू) तुरन्त आराम होगा।

२. बहरापन— नियमित रूप से कुछ दिनों तक दालचीनी का तेल टपकाते रहने (डालने) से बहरापन ठीक होगा।

३. सारिबादि वटी— (वैद्यनाथ कं.) २—२ गोली छोटे को १—१ गोली पानी के साथ सुबह शाम दें।

४. कान में डालने हेतु— ‘इयर सेफ’ ड्राफ्स।

५.गेंदा के पत्ते का रस २—२ बूँद में डालने दर्द ठीक होता है।

६ कान में आवाज होने पर — पीपल, हींग, बच और लहसुन समभाग लेकर सरसों के तेल में धीमी अग्नि पर पकाकर हल्का गरम गरम कान में डालने पर कान शब्द होना एवं तकलीफ मिल जाती है।

७. विल्वादि तेल— डाबर/ २ से ४ बूँद डालने से कान के रोग ठीक होते हैं। बहरापन ठीक होता है।

८. अदरख के रस की २—४ बूँद डालने से कान का दर्द ठीक होगा।
नेत्र रोग

१. आँखों की सुरक्षा बहुत ही आवश्यक हैं। नेत्र दृष्टि बिना सब संसार सूना प्रतीत होता है अत: नेत्रों की सुरक्षा हेतु— प्रात:काल ठन्डे जलसे आँखों को ८—१० बार धोना चाहिए।

२. त्रिफला (हर्र बहेड़ा, आँवला) के चूर्ण को १ चम्मच १० ग्राम लेकर ५०० ग्राम जल में मिट्टी के साफ बर्तन में जो पानी भरते भरते पुराना हो गया हो तो उसमें त्रिफला रात्रि में भिगों दें प्रात:काल उसके छने पानी से आँखे धोने से नेत्र के समस्त रोग दूर हो जाते हैं।

नोट—आईवास नाम से प्लास्टिक का छोटा गिलास भी आता है उससे आँख धोने में सुविधा रहती है। ३. अन्धा भी देखें — अर्थात् नेत्र शीध्र बढ़े चस्मा उतर जाएँ इस हेतु।

२० ग्राम त्रिफला चूर्ण को २५० ग्राम जल में धीरे—धीरे पकाएँ चौथाई शेष रहने पर उतार कर छान लें फिर उसमें २—१/२ ग्राम जल लौंह भस्म १०० पुटी की ३० पुड़िया बनाकर रख ले उसमें से १ पुडिया दवाई २ चम्मच देशी घी २ चम्मच चीनी (बूरा) मिलाकर प्रतिदिन पीने से नेत्र ज्योति शीध्र बढ़ जाती है। कम से कम २—३ माह करते रहे। अन्धा भी देखने लगें।

नोट— मिर्च, खटाई, कम खाएँ। ४. आईफ्लू— पर पाईरिमोन डालें।

बेटनीसोल आई ड्राप्प डालने से ठीक होती है। आँखों पर काला चस्मा लगाए रखें। ५. फुली— आँख फुली होने पर लाल चन्दन स्वच्छ पत्थर पर पानी (जल) से घिसकर लगाने से फुली कटा जाती है।

६. मोतियाबिन्द— आँखों में मोतियाबिन्द होने न पाए इसके लिए पूर्व से ही इलाज करें।

१. होम्योपेथी में Cineraria-Maritima Eye dropsप्रतिदिन पूर्व से डालते रहें (मोतियाबिन्द नहीं आने पाऐगी।)

२.‘‘आईटोन ड्राप्स सामान्य आँख के रोगी को डालते रहने से आँखों के रोग दूर रहते हैं।

३. मोतियाबिन्द आने पर छट जाएँ — ७—८ हल्दी की छोटी—छोटी गाँठें ७ दिन तक अमृत धारा में भिगोकर रखें। बाद में निकाल कर पत्थर पर घिसकर जल में लगाएँ।

४. आँख में पानी झरना— निर्मली के बीच को पानी या गुलाब जल में घिसकर आँखों में आजने से पानी का गिरना बन्द हो जाता है।

५. रतौंधी— सौंठ, कालीमिर्च, पीपल—समभाग शहद में पीसकर अंजन करनेसे रतौधी दूर हो जाती है।
नाक के रोग

अधिक दिनों तक (सर्दी जुकाम ) रहने से नाक में तरह—तरह के रोग हो जाते हैं। इस हेतु उपाय— १. यदि नाक में सर्दी के कारण फुन्सियाँ हो गई हों, तथा नाक में सूजन आ गई हो तो ‘षड्बिन्दु’ तेल (डाबर/वैद्यनाथ के) का लेकर २ से ४ बूँद सीधे लेटकर नाक में ३—४ बार डालते रहें एवं ऊपर से थोड़ी रूई लगा दें कम से कम ३० मिनट लेटे रहें। इस प्रकार करने से नाक की फुन्सियाँ ठीक हो जाती है। नाक से बदबू आना रूक जाती एवं नाक में हड्डी बढ़ने की सम्भावना रूक जाती है।

२. यदि नाक में बड़ी—बड़ी पुफुन्सी बिना सर्दी के अचानक हो जाए तो इतवार (रविवार) बुधवार की सुबह—सुबह से कोई पूफूल मँगाकर सूंघ कर रास्ते मेंफैक दो। फुन्सियाँ ठीक हो जाएगी यह तंत्र है आजमूदा है।

३. नाक से खून गिरना (नकसीर)— रात्रि में २० गा्रम मुल्तानी मिट्ठी २५० ग्राम पानी में भिगो दें खूब हिलाएँ २—३ बार हिला दें सुबह उसका ऊपर का जल पीने से नाम का खून बंद हो जाएगा। आजमूदा प्रयोग है।

४. अनार के फूलों का रस अथवा दूब के स्वरस की नस देने से नाम का खून गिरना बन्द हो जाता है।
हड्डी मजबूत बङ्का समान हो

बबूर के बीजो का चूर्ण तीन दिन तक ५—५ ग्राम सीरा से मिलाकर खाएँ तो हड्डी बङ्का की हो जाती है।
हड्डी जुड़े

लहसन, लाख, खांड़ शक्कर का सीरा का कल्फ में घी डालकर पिलाएँ जो छिन्न—भिन्न हड्डी बहुत शीघ्र जुड जाती है। खाएँ तो हड्डी वङ्का के हो जाती है। श्वेत कुष्ठ रोग (सपेद दाग) १. यह रोग पूर्व पाप एवं वर्तमान में किए गए पापों का फल है इसमें शरीर में मुख और हाथ पैर आदि स्थानों पर चमड़ीे का मूल भूत रंग बदल कर सफेद दाग हो जाते हैं। जो भद्दे लगते हैं। समाज में उसे घृणित मानते हैं।

२. दूसरा यह रोग अधिक समय तक ए.सी. में रहने वालों को भी हो जाता है।

३. अधिक शीत/उष्म पदार्थों के सेवन से प्रिज का अधिक ठन्डा पानी पीना विपरीत आहार लेने से भी श्वेत कुष्ठ हो सकता है।
सपेद उपचार (चिकित्सा)

१. पीली चमेली, गज पीपली, गज पीपली, कसीस, मैनसिल, गोरोचन, सैनाव सभी सम भाग पीसकर छान ले पश् चात् गोमूत्र में पीसकर लेप करने से श्वेत कुष्ठ ठीक होता है।

२. काक ढोढ़ी, फूट, पीपरी, सभी समभाग पीसकर बकरी के मूत्र में पीसकर लेप करने से श्वेत कुष्ठ ठीक होता है।

३. बकुची, अमलवेत, लाख कठगुलरी, पीपरी, रसौत, लौह चून, काले तिल सभी समभाग पीसकर, गौमूत्र में पीसकर लेप करने से श्वेत कुष्ठ ठीक होता है।

४. घुँघसी (श्वेत घुची की जड़) भी पानी में पीसकर लगाएँ। इससे ठीक होता है।

५. मैनसिल, चिरचिरा की राख पानी में पीस कर लगाएँ।

६ आँवलासारक गन्धक,कसीस, हरताल, त्रिफला को पीसकर गौमूत्र में पीसकर लेप से कुष्ठ रोग दूर होता है।

७. ९० ग्राम समुद्र फैन, मुन्डी २०० ग्राम पीस छान कर ५ से ६ ग्राम खुराक घी के साथ खाने से एवं चीत (चितावर) और कनेर की जड़ नीबू के साथ पीस श्वेत दाग पर लगाने से श्वेत दाग ठीक हो जाते हैं।
सपेâद खाज खुजली—उपचार

अधिकांश खून के खराब होने से चर्म रोग होते हैं अत: प्रथम रेचक औषधि से कुछ दस्त लेने के बाद खून शुद्ध की औषधि एवं लगाने की औषधि प्रयोग करना चाहिए। खाने की औषधि— राज बटी (गन्धक बटी) २—२ गोली बड़ी उम्र के १—१ गोली १० बर्ष से २० वर्ष तक पानी के साथ सेवन करेें इससे रक्त शुद्ध होता है। (डाबर/ वैद्यनाथ कम्पनी ) में आती है। लगाने की औषधि— १. हरड़ बावची, नीम के फल (निवोरी आँवला, एवं कनेर के पत्ते आँक के पत्तों का रस सभी पीसकर कड़वे तेल में खरल से घौंटे तब वह मरहम शीशी में रख लगाने से खाज शीघ्र ठीक होती है।

२. िंरगोझिन मलहम, वीटेक्स मलहम, स्किन मैनट, वेटनीवेट सी, आदि मलहम भी इसी खाज खुजली दाद में लाभकारी है।

३. खैर, सुहाग, अफीम, हल्दी पवाँड़, गेंदा की पत्ती, सभी बराबर नींबू के रस में घोंटे फिर शीशी में रखें एवं खाज में लगाएँ इसमे ९०० ग्राम सरसों का तेल डाल लें।

४. आँक (मदार, अकौआ) के दूध में में कालीमिर्च पीसकर छाजन पर मलने से (लगाने से) छाजन ठीक होती है।

५. पकी खाज (बड़ी फुन्सी जिसमें मवाद आती है।) उपचार गन्धक, मस्टर, नीलाथोथा, पमाड़ के बीज, अमर बेल ५०—५० ग्राम दवाएँ इन सबको पीसकर थोड़े से सरसों के तेल में पहले चमकदार कड़ाही में (घोटे) पश् चात् आवश्यकतानुसार तेल एवं कपूर १० ग्राम पीस मिलाकर मल्हम रख लें। एवं दो बार लगाएँ।
सिर दर्द

१. लवंग २७ बार णमोकार मंत्र पढ़कर २—२ लोंग खाने से सिर दर्द दूर होता है।

२. धृत कुमारी तेल को सिर में धीरे—धीरे मलें इससे आराम हो जाता है। किसी भी प्रकार का दर्द हो तो— पीपरामूर १०० ग्राम पीसकर उसे छानकर रख लें उम्रानुसार मात्रा १/४ एवं १/२ चम्मच से १ चम्मच तक गाय के दूध से सेवन कराना चाहिए।
आधा शीशी दर्द

लौंगन चन्दन लाल पुनि सहित आँवरे पीस। फूल डाल चम कुन्द के मिट हैं आधा शीशी।। अर्थांत्— लोंग लालचन्द आँवला, समभाग पीसकर मचकुन्द के फूल डाल के पानी पीसकर सिर में लगाएँ।
मुख से खून गिरने पर

अडूसा की पत्ती मिश्री के साथ (बाँसा, रूसो, अहूसा) इनकी हरी १५—२० पत्ती में मिश्री के साथ पीस कर खाने से मुँह से खून गिरना बन्द हो जाता है।
गले का काग बढ़ने पर

उपचार—चूल्हे की मिट्टी निकालकर उसमें थोड़ी कालीमिर्च पीसकर अपनी अंगुली में लगाकर चतुराई से (कहवा) पर लगा देवे ठीक हो जाता है।
हारनियाँ एवं गठिया वात (सन्धिवात रोग)

हारिनिया— १. केसुला के फूलों को उबालकर उससे बफारा दिया जाए, वही फूल हल्के गरम हारनिया पर बाँध दे तो हारनिया ठीक हो जाता है।

२. नूरानी तेल की हल्की मालिश करने से लाभ होता है।

३. हार श्रृंगार के पत्तों का काढ़ा पिलाएँ।

४. ‘‘वृद्धि वाटिका वटी’’ (वैद्यनाथ कं. की उम्रानुसार १ से २ गोली सुबह शाम देने से अण्डकोष वृद्धि एवं हारिनियाँ दोनों ठीक हो जाते है।
सन्धिवात (गठिया) (जोड़ो का दर्द)

५०० ग्राम तिल्ली का तेल कढ़ाही में अच्छा उबालो धीमी अग्नि से एवं ५० ग्राम हल्दी डाल दो ताकि तेल शान्त हो जाए फिर उसमें २० कच्चे कुचला को डाल दो, जब कुचला काला पड़ जाए तब तेल उतार लो,एवं ठन्डा होने पर कुचला निकालकर जमीन में गाड़ दो पुन: धतूरे के पत्ते का रस २०० ग्राम निकालकर फिर धीमी अग्नि पर चढ़ावैं इसके, बाद १० ग्राम अफीम बारीक कर डालकर तेल में हिलाकर मिलावें। इस तेल की मालिश से गठियावात शीघ्र ठीक होता है। परहेज— बादी चीजे, भिन्डी, उड़ददाल, सेम, बैंगन, अधिक ठण्डा पानी, मसूर दाल, आम इमली बन्द रखें। गठियाबात हेतु—सहजना, वकायन, अन्डा की जड़, धतूरा, अकौआ, शूहर सम्हालू, ये सभी बराबर जड़े कूटकर कल्प तिल का तेल में धीमी आँच से उबालकर तेल पका छान लें। सभी बात लकवा, गृहसी, कमर दर्द सभी प्रकार ठीक हो जाता है।
एडी में जलन, पाँव में थकान आने पर उपचार

१.इमली का पत्ता सूखा चाहे गीला हो पानी में उबालें और फिर नमक डालकर पानी हिलाकर हल्की सिकाई करें कम गरम में पैर डुबा लें।

२. फिटकरी एवं नमक को गरम जल में डाल हल्की सैंक करें।

३. सरसों के तेल में कपूर मिला मालिश करें।

४. पैर के तलवे में जलन होने पर एक पुरानी ईट को खूब लाल गरम करें फिर उसे नीचे रखकर उसके ऊपर थोड़ी—थोड़ी छॉछ (मट्ठा) छोड़ते जाएँ एवं उसकी वाष्प से ऐड़ी तलवा की सिकाई करें जलन ठीक होगी आजमूदा प्रयोग है।

५. चन्दनादि वटी १ से २ गोली पानी से खिलाएँ।

६. थकान के कारण जब गला सूख जाए आँखों और सिर में चक्कर आएँ। तो काँसे की थाली में घी और बारीक कपूर डालें, तब दोनों पाँव थाली में घिसते रहें उष्मता (गर्मी) निकलकर सिर हल्का हो जाएगा।

७. पैरों बिमाई फटी का इलाज— राल, कत्था, कालीमिर्च गाय का घृत चमेली का तेल इन्हें पीसकर घृत या तेल में मल्हम बना लगाएँ। एवं व्रेâकक्रीम लगाने से बिमाई ठीक होती है।
कैंसर रोग उपचार

१. दही के साथ तुलसी के ८ —१० पत्ते खाने से लाभ होता है।

२. गेहूँ के कोमल पत्ते पीसकर उसमें बूरा (शक्कर) मिला ठन्डाई पीने से लाभ होता है।

३.हरे मैनार की सब्जी खाने से शीघ्र लाभ होता है।
गुर्दा (किडनी) पेशाब की थैली का उपचार

१. गुर्दे की बीमारी हो तो चाँदी की छड़ (काम) को अग्नि मेें एकदम लाल करो, और पहले से एक भगौनी में १ लीटर पानी छना रख लो, उसमें उस गरम छड़ को छोड़ दो, एवं ढक दो। ठन्डा होने पर हल्का गुनागुना यही पानी दिन में ३—४ बार पिलाते रहें किड़नी ठीक हो जाएगी

२. असाध्य शूल (पेट दर्द पर)— पका कुम्हड़ा चीर कर धूप में सुखा लें इसे पीतल के बर्तन में रखकर जलाकर कोयला बना लें (राख न होने दें) फिर इस कुम्हड़ा के कोयला का चूर्ण बना उसमें बराबर की सौंठ मिला लें १—१ चम्मच दवा पानी से सेवन करें असाध्य सूल दर्द ठीक होवे।
गैस हरण चूर्ण

सौंठ १०० ग्राम, असगन्ध ५० ग्राम, शुद्ध सुहाग ५० ग्राम, सेंधानमक ५० ग्राम, हींगड़ा १० ग्राम (घी में भूल लें) पीपल २० ग्राम अजमोद ५० ग्राम, अजवान ५० ग्राम, सौंफ २० ग्राम, इलायची ५ ग्राम, शुद्ध औरासार गन्धक १०० ग्राम। विधि— इन सभी को एकत्र कर खरल से कूट पीसकर छान लें, पश्चात् सोजने एवं नींबू के रस को निचौड़ कर डुबो दें। दवा फूल जाने पर पत्थर की सिल पर घोंटे चिकनी होन पर जंगली बेर के बराबर गोलियाँ बना लें। सेवन विधि— २—२ गोली सुबह—शाम गर्म पानीसे बच्चों को १—१ गोली की है। परहेज—मिर्च, तेल, खटाई तली चीजें न लें।
सुगर, मधुमेह, (डाईविटीज) उपचार

वर्तमान में सुगर की बीमारी नवयुवकों को एवं वृद्धों को तीव्र गति से बढ़ रही है, इसका कारण दिमागी तनाव एवं गरिष्ठ आहार के बाद शारीरिक श्रम न करने से ऋतु विपरीत आहार के सेवन से अनेकों रोग उत्पन्न होते हैं। उनमें मधुमेह भी एक है। उपचार— १. गुड़मार की पत्ती— बिनोले की मिगी, जामुन की गुठली, नीम के पत्ते सूखे, सूखी बेल पत्ती, करेला के बीज, इन सबको बराबर बराबर लेकर कूट कपड़छन रखें १—१ चम्मच चूर्ण सुबह शाम पानी से सेवन करें। इसी का काढ़ा बनाकर पीएँ तो शीध्र लाभ होता है। २. करेले के रस (जूस) ५० ग्राम अथवा नीम की कोंपल प्रतिदिन साफ धोकर २०—३० पत्तियाँ खाली पेट खाने से सभी रोग ठीक होते हैं।

३. रेंवजा की फली (जिसमें बीज न पड़े हो) लाकर सुखा लें फिर पीसकर रखों। १/२ चाय चम्मच खुराक पानी से सेवन कराने से सुगर ठीक होती है।

४. मैंथी दाना १० ग्राम २५० ग्राम उबले पानी में रात्रि में भिगो दें। प्रात: खाली पेट वह पानी छानकर पीने से लाभ होगा। मैथी साग बनाकर लें।

५. नीम की निबौली की मिगी रख लो ८—१० निबोरी मिगी खाली पेट खायें। सुगर, ज्वर, पेट, के कृमि सभी रोग ठीक होते हैं।
दन्त रोग चिकित्सा

अधिकतर दांतों के रोग की परेशानी अहार की गड़बड़ी से होती है अधिक ठन्डा पानी पीना अधिक खटाई मिर्च लेना तथा गर्म चाय आदि के बाद तुरन्त ठन्डा पानी लेने से दाँत कमजोर होकर टूट जाते हैं।
दाँतों के रोग में निम्न चिकित्सा करें—

१. कूट, दारूहल्दी, धाय के फूल, पाठा, कुटकी, हल्दी, तेजबल, मोथा, लोघ सभी बराबर बराबर लेकर चूर्ण छान कर रख लें फिर जीभ, दाँत की जड़ों में मलने से दाँत का दर्द , रक्त गिरना, मसूड़ोंं की जलन ये सभी रोग दूर होते हैं।

२. त्रिफला (हर्र, बहेड़ा आँवला) त्रिकुटा (सौंठ पीपर पीपलामूर) तूतिया (शुद्ध नीलाथोथा) सौंद्या नमक माजूफल पतंग (अकोला की लकड़ी) इन सभी को पीसकर छानकर मंजन बना लें।

३. पाईरिया— असली सरसों का तेल में महीन कपड़े से छना सेंधानमक मिलाकर धीरे—धीरे दाँतो मसूड़ों एवं से मलते रहें एवं लार नीचे टपकाते रहें। कुछ ही दिनों में पाईरिया ठीक हो जाएगा।

४. दाँत चमवें बादाम छिलका, (पुंगीसुपाड़ी) दोनों पीस सेंधानमक मिलाकर मंजन बना लें। ‘‘छिलका ले बादाम का पुगी सहित जलाय। नमक महीन मिलाइए दाँत देय चमकाय।।

५. अजवान २०० ग्राम, नीम की छाल सूखी २०० ग्राम, बबूल छाल २०० ग्राम को जलाकर कोयला करें (राख न होवे) फिर पीसकर १०० ग्राम, सेंधानमक १२ ग्राम, पिपरमेंट ५ ग्राम मिलाकर पीस लें। इस मंजन से दाँत दर्द ठीक होकर चकमते हैं। बदबू दूर होती है।

६ बरगद की दातौन करने से हिलते दाँत ठीक हो जाते हैं।
स्त्री गुप्त रोग चिकित्सा

१. गमिर्णी का वमन (उल्टी)—चाँवल के धोवन का पानी, २५० ग्राम धनिया ५० ग्राम मिश्री पीसकर इस पानी को २—३ बार देते रहें। उल्टी बन्द होगी। किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं करता है। २. सरसों की जड़ कमर में बाँधने पर प्रसव शीध्र हो प्रसव होने पर तुरन्त छोड़ देना चाहिए। ३. हर्र की गुठली की मिगी (बिजी) में समुद्र फैन को पीस नित लगाने से योनी के पानी बहना रूक जाता है।
मासिक धर्म में अधिक रक्त आने पर—

कुड़ा की छाल मिश्री (बूरा) मिलाकर काड़ा बनाकर पीने से ठीक होता है। रक्त प्रदर— चिरौंजी ( आचार) के पेड़ के कोमल पत्तों का जूस (रस) २०—२० ग्राम पीने से रक्त प्रदर ठीक होता है। कुशा की जड़ चावल के धोवन के जल से पीसकर उसमें ५ ग्राम रसौंत पीसकर मिलाकर पीने से ठीक होता है।
रजोधर्म रूकने पर खोलने हेतु

१.पका पपीता खिलानें से स्तनों में दुग्ध वृद्धि होती है। २.शतावर ५—५ ग्राम दूध के साथ पीसकर पिलाने से दूध बढ़ता है। मासिक धर्म— अधिक खून आने पर (कष्टावर्त, अत्यावर्त) इमली के ३—४ बीजों को फूलों उसी पानी में पीसकर चासनी से खाने पर अधिक खून आना बन्द हो जाता है।
सर्प विष चिकित्सा

१. केले के पेड़ के छिलके का रस २० ग्राम १०—१२ कालीमिर्च के साथ पीसकर सर्प के काटे रोगी को पिलाने से लाभ होगा। १—१ घण्टे से दें एवं काटे स्थान पर छिलका पीसकर लगाए।

२. जामुन के पत्तों को पीसकर पीने से सर्प का जहर ठीक हो जाता है। (८—१० पत्ते लेना चाहिए।) नोट— आवश्यक होने पर डाक्टर को दिखाएँ। एलाल अचूक लिखे हैं विश्वास से करें। ध्यान दें— सर्प काट लेने पर घबराएँ नहीं सभी सर्प जहरीले नहीं होते रोगी को सोने न देें। पानी के छीटे डालकर साहिसक बातें करते रहें।

३. मदार (आँक) की जड़ पानी में घिसकर पिलानें से सर्प विष ठीक होता है।

४. रीठे के छिलका को पानी में पीसकर चने बराबर गोली २—२ दूध से पिलाएँ।

५. रीठे के छिलका को महीन पीस लें। सलाई से रोगी की आँख में लगाएँ। रोगी चिल्लाएगा आँख सूझ जाएगी पर चिन्ता न करें सर्प विष उतर जाएगा। बाद में आँख आईड्रोप्स डालते रहें।

६. कुचले को थोड़ा सा नींबू के रस में घोल कर चम्मच से गले में डाले फिर शरीर पर पारा मले तुरन्त ठीक होगा कब्र के लिए तैयार सर्प। वाला ठीक होगा। (कुचला थोड़ा धिसे अधिक नहीं)

७. रीठे का छिलका पीसकर जब तक खिलाएँ जब तक कड़वा न लगे रोगी बच जायेगा।
कुत्ता, शियार, बन्दर, काटने पर उपचार

१. सबसे सस्ता घरेलु, आजमूदा ईलाज काटे स्थान पर लाल मिर्च पानी में पीसकर लगा दें। ऐसा ३—३ बार करें।

२. ग्वार पाठे का (गूदा) में थोड़ा सेंधानमक मिलाकर काटे स्थान पर बाँधे ३ दिन बाँधने पर जहर ठीक हो जाता है।

३. शुद्ध हरताल ३ ग्राम २५० ग्राम दही में मिलाकर खाएँ।

४. शुद्ध कुचला २ नग या (५ ग्रामचूर्ण) २५ ग्राम कालीमिर्च दोनों को पानी में पीसकर १—१ रत्ती की गोली बना लें। १ गोली पानी से लेने पर कुत्ते/सियार/बन्दर सभी जहर पूर्ण नष्ट होते हैं।
बिच्छू काटने पर उपचार

१. बिच्छू काटने पर अपामार्ग (ओगा, अदिया झारों) की जड़ दिखाने से ही बिच्छू उतर जाता है यदि कम आराम हो तो उसी जड़ को पानी से धिसकर काटे स्थान पर लगा दें।

२. फिटकरी को तवे पर गरम करके उसे गरम—गरम काटे स्थान पर लगाएँ दर्द शान्त होगा।

३. पलास पापड़ा आँक के दूध में घिसकर लगाने से बिच्छू का जहर उतर जाता है।

४. इमली के बीज को छीलकर उसके सफेद भाग को पानी से पत्थर पर घिसकर काटे स्थान पर चिपका दें बिच्छू का जहर उतर जाएगा।

५. जायफल को नीबू के रस में घिसकर दंश स्थल पर लगाने से तुरन्त बिच्छू का दर्द ठीक होता है।
अफीम का विष

१. सुहागा १ ग्राम पानी में पीसकर पीने से अफीम का जहर उतर जाता है।

२. यह बेहोस हो तो (हिंगड़ा) हींग १ ग्राम तक पीसकर पिलाएँ तुरन्त ठीक हो जाएगा।
भाँग का नशा

उपचार— तुअर (अरहर) की दाल का धोवन जल पीने से भाँग उतर जाती है एवं खट्टे पदार्थ—आम इमली का आचार देने से ठीक हो जाता है
विष चिकित्सा

१. सर्प के काटने पर—तुरन्त काटे स्थान के आगे भाग पर अच्छे मोटी रस्सी से बाँध दें ताकि विष का असर सारे शरीर में पैâलने न पाए फिर काटे स्थान पर न्यूब्लेड धोकर वहाँ चीरा लगा कर खून निकालें वहाँ से काला खून जब तक निकलता रहे निकाल दें। विष का असर कम हो जाएगा। चिकित्सा— १. संजीवनी ४—४ गोली पानीसे खिलाएँ।

२. श्यामा तुलसी के पत् तों का २०—३० ग्राम रस निकाल २—४ बार पिलाएँ। ३. राई लहसुन, प्यास को एकत्र पीस जितना खा सके खिला दें।

४. शुभ नक्षत्र में अपमार्ग की जड़ लाकर व्यक्ति के दाएँ कान में बाँधने से सर्प—विच्छू का जहर उतर जाता है।

५. मयूर पुख साबूत चिलम में भरकरफूक देने से सर्प जहर दूर होता है। रोगी बेहोश है तो दूसरा, व्यक्ति चिलम फूक कर रोगी की नाक में जोर से धुवाँ पेâके उससे सर्प विष उतर जाता है।

६. सर्प नहीं काटेगा— बारसिंगा के सींग का एक ताबीज बना गले में बाँधे तो उसे सर्प नहीं काटेगा। (तंत्र से)
पेशाब (मूत्रावरोध) हेतु उपाय

१. मूत्रावरोध में रोगी की नाभि के चारों ओर ढाक (पलास, छेवला, टेसू) के फूल पानी में पीसकर नाभि के चारों और लेप कर दें। ४—५ मिनट में पेशाब हो जाएगी। २. केले के वृक्ष की छाल का रस ४० ग्राम घी २० ग्राम दोनों मिलाकर पिलाने से बन्द पेशाब खुल जाती है।
दाढ़ के कीढ़—

घुन्चु की जड़ कान में बाँधने से दाढ़ के कीड़े में ल निकल जाते हैं। काँटा निकल जाए— धतूरे के पत्ते को गुड़ में लपेट कर खिला देने से शरीर के किसी अंग में कांटा लगा है। पानी की तरह बह जाता है। काँच निकल जाए— इमली के बीजों की गिरी का चूर्ण मक्खन के साथ देने पर काँच निकल जाता है। कौढ़ी का दर्द— असली हींग २ ग्राम बीज निकल मुनक्का में लपेट कर १ घूँट पानी के साथ देने से कौड़ी के दर्द में आराम होगा। वर्थ कन्ट्रोल— केले के तने का रस ५० ग्राम ८ दिन निरन्तर पिलाने से बिना नशबन्दी के सन्तान नहीं होगी। बगल गन्ध (काँख की गन्ध) दूर हेतु— जामुन के पत्ती का पानी के साथ पीसकर लगाने से बगल गन्ध दूर होती है। एवं फुन्सियाँ भी नहीं होती।
मोतिया बिन्द हेतु

१. नौसादर को सुर्मे की भाँति बारीक घोंटकर अजंन करने से मोतिया बिन्द कट जाता है।

२. निमर्ली के बीज शक्कर के साथ पानी में घिसकर लगाने से मोतियाबिन्द कट जाता है।

३. ५—६ गाँठे हल्दी को अमृतधारा में डाल दें ७ दिन तक पड़ी रहने के बाद निकालकर इसे थोड़ी—थोड़ी पानी में या गुलाब जल में घिसकर लगाने से मोतिया बिन्द नहीं आता है। आया मोतियाबिन्द कट जाता है।

४. वच २ ग्राम हींग, १ ग्राम सौंठ १ ग्राम चासनी (सीरा) के साथ खाने से मोतिया बिन्द ठीक होता है।
मोटापा कम करने के लिए

१. प्रात:काल चावलों का मांड नमक मिलाकर पीसे से ठीक होता है।

२. गिलोय चूर्ण ± त्रिफला दोनों ३—३ ग्राम चासनी से सेवन करें।

३. भोजपत्र की पत्ती १० ग्राम की चाय उबालकर प्रतिदिन पीने से मोटापा कम होगा।

४. छाछ के साथ १/२ चम्मच त्रिफला चूर्ण लेते रहे मोटापा ठीक होगा।

५. पुनर्नवा १० ग्राम जड़ी, त्रिफला १० ग्राम दोनों का काड़ा बनाकर उसमें पुनर्नवा मण्डूर भस्म १/२ से १ ग्राम मिलाकर पीने से मोटाफा दूर होता है। सूजन ठीक होती है। रक्त वृद्धि होती है।
वायगोला (शूलपेट दर्द)

१. अरण्डी का तेल (कास्टर आईल) ६ ग्राम दही ६ ग्राम दोनों मिलाकर रोगी को पिलाएँ, चमत्कारिक लाभ होगा जीवन भर को ठीक हो जाएगा।

२. २५० ग्राम गाय के दूध में ५ लाल मिर्च बीजों सहित साबूत धीमी अग्नि पर पकाएँ दूध शेष रहने पर उतार कर मिर्चों को हल्के हाथ से मसल दें, फिर छन्नी से छान लें, उनमें थोड़ी सी मिश्री (या बूरा ) मिलाकर गर्म कर हल्का गर्म पिलाएँ। भयंकर वायुगोला दर्द के रोगी को तुरन्त आराम हो जाएगा।

३. अरंडी का तेल २० ग्राम अदरख रस २० ग्राम दोनों मिलाकर गर्म गर्म पिलाएँ आराम हो जाएगा।

४. ढ़ाक के पत्तों की ठुड़ी २० नग तोड़कर ताजे पानी में पीसकर रोगी को पिलाकर उसक चित्त लिटा दें आधा घन्टे में दर्द ठीक हो जाएगा।

नोट— अदरख न होने पर सौंठ उबाल लें। ५. चीते की जड़ (चितावर) इन्द्रजौं, पाठ की जड़ कुटकी, अतीस, हर्रे सभी सम भाग लेकर कूट पीस चूर्ण छान लें। २ से २ १/२ ग्राम (एक चाय चम्मच चूर्ण) गर्म पानी से १ माह तक पिलाएँ। यह अमोघ औषधि है। छाजन (चर्म रोग) का उपचार— आंक के दूध में कालीमिर्च पीसकर लगाने से छाजन ठीक हो जाती है।
शक्ति का खजाना

हल्दी की ५०० ग्राम गाँठे, अनबुझा (खड़ाहर्रा) चूना— एक किलो, पानी दो किलो, मिट्टी के साफ बर्तन में डाल दें फिर उसमेें पानी छोड़ दें। पानी ऊपर से डालने पर चूना पकने लगेगा। (उबाल सी उठेगी।) उस चूने में उक्त हल्दी २ माह तक पड़ी रहने दें। पश्चात् निकालकर गाँठों को सुख लें बाद में कूट छानकर बाटल में रख लें। सेवन विधी— इस दवा को १—१ चम्मच हल्दी चूर्ण २ चम्मच सीरा में मिलाकर खाएँ अपार शक्ति बढ़ती है।

सेहत के नुस्खे Health tips3

हकलाना या तुतलाना

१. कल्याणक चूर्ण— हल्दी, बालबच (मीठी बच) छोटी पीपल, सौंठ, जीरा, अजमोद, मलैठी, मीठा वूâठ, सम—भाग लेकर सभी पीसकर छानकर रखें। इसे घी अथवा सीरा के साथ एक आना भर की खुराक दिन में ३ बार खिलाएँ। (ऊपर से पानी न दें।)

२. कुलंजन (पान की जड़) को पीसकर गुड़ में मिलाकर खिलाएँ।

३. केवल कत्था एवं चूने (कम चूना हो) लगा पान पत्थर पर घिसकर पीसकर घूटी के रूप में देने से लाभ होता है। ४. श्यामा तुलसी के पत्तों का स्वरस सीरा से देना ऊपर से काली बकरी का दूध पिलाए।

५. स्वाइन फ्लू— (१) हल्दी एवं नीम पत्ती का काढ़ा में रूमाल भिगोकर मुँह पर फैरने से रोगाणु दूर रहते हैं।

(२) १५/२० लहसुन कली गले में पहने रोगाणु दूर हो जाते हैं।

(३) अदरख, तुलसी दल, गिलोय, कालीमिर्च के काढ़े को बनाकर सुबह शाम पीवें।
यकृत/प्लीहा/चिकित्सा

हृदय के नीचे दक्षिण भाग में यकृत (लीवर) स्थिति है। जिसमें अनेक प्रकार के दुख देने वाले रोग उत्पन्न होते हैं। १. सर्वाङ्ग सुन्दर रस (रसेन्द्रसार संग्रह) फार्मूला— शुद्ध गन्धक/ पारद की कज्जली १५—१५ ग्राम की पर्पटी बना लें। २—३ दिन की रखी कज् जली की पर्पटी बनाई जा सकती है। आगे बनाना ठीक नहीं। जायफल, दक्षिणी, जावित्री इलायची के बीज १५—१५ ग्राम लेकर सबको मिला चूर्ण छान लें। यह ५ वर्ष तक के बालकों की अमृत समान गुणकारी है। ज्वर, दूर कर अग्नि दीप्त होती है। बालक बढ़ता है। यकृत रोग में अदभुत कार्य करता है। सेवन विधि— ाqपप्पली चूर्ण १ से ३ मासा एवं सर्वाङ्ग सुन्दर रस १ से ६ रत् ती उम्र अनुसार इसमें घोलकर देना चाहिए। तंत्र— (१) ऊँट कटारा— की जड़ पुष्प नक्षत्र में लकड़ी की नोक से खोदकर लाएँ ७ शाखाओं वाली जड़ सर्वश्रेष्ठ होती है इसे सोने की ताबीज में गले में बाँधने से सब बाधाएँ दूर होती हैं। दरिद्रता दूर होती है।

(२) शोथ लोह— सौंठ मिर्च, पीपल, हर्र, बहेड़ा आँवला, मुनक्का, पोहकर मूल, सुगन्धवला, कचूर, लौह—भस्म, घुड़वच, लौंग, कड़कड़ासिग्गी, दालचीनी सौफ, बायविडंग,धाय की फूल, सम भाग १—१ तोणी चूर्णकर कपड़छन करें। पश्चात् मण्हूर भस्म १० ग्राम मिलाकर कम से कम ३ घण्टे पत्थर के खरल में घोंटे(घिसें) फिर कुड़े की छाल का स्वरस अथवा काढ़े में घोंटकर गोला बनाकर इस गोले का जामुन के कोमल पत्रे में लपेटकर ऊपर मिट्ठी का लेप कर सुखा लें पश्चात् जंगली उपले (कपड़े) की अग्नि में लघुपुट (कम आँच) से पकाएँ। पीसकर छानकर रखें। औषधि निकाल कर प्रयोग करें। प्रयोग— २ रत्ती की मात्रा दूध से लेना। गुण— सारे शरीर की सूजन, को नाश कर चमत्कारी लाभ कराती है। ३. ताप्यादि लौह— हर्र, बहेड़ा आँवला, सौंठ, मिर्च, पीपल, चित्रकमूल वायविडग, ५—५ ग्राम दारूहल्दी, दालचीनीऔर च्वय, १०—१० ग्राम शुद्ध शिलाजीत, स्वर्णमाक्षिक भस्म,तथा लौह भस्म प्रत्येक १० ग्राम मण्डूर भस्म २० ग्राम मण्डूर भस्म २० ग्राम मिश्री ३२ तोला। सभी चूर्ण कर छान लें पहले काष्टिक दवा अलग पीसे बाद में भस्म मिलावें।गुण— पाण्डू यकृत, बालकों का यकृत रोग ठीक होते हैं। बालकों के पक्षाधात में एवं पोलियों में भी गुणकारी है।
बालकों के पक्षाघात में एवं पोलियों में

कारण— सौंठ १ तोला, सम्भालु के पत्र १ तोला करंज की छाल १ तोला तीनो कूटकर ४८ तोला जल में धीमी अग्नि से पकाएँ ६ तोला शेष रहने पर छानकर शीशी में रख लें। १—१ चम्मच प्रतिदिन २—३ बार पिलाएँ। लाभ होगा। १. रस औषधि— बात गंजाकुश रस २ ग्राम शीतांसु रस २ ग्राम ताम्रभस्म १ भाग सभी को एकत्र कर पीसें फिर मिलाकर शीशी में रखें। खुराक— १/२ रत्ती से १ रत्ती खुराक दूध से देना चाहिए। दिन में सुबह—शाम दो बार।
मसूढ़ों के दर्द

१. अमरूद के पत्तों के काढ़े से कुल्ला करने से मसूढ़ों का दर्द एवं सूजन कम होती है।

२. नीम की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से मसूढ़ों का असहाय दर्द ठीक होता है।

अतीस अति उत्तम मेहु अतीस उसे करि चूर्ण अनेकन रोग में दीजे।। ज्वर ताप घटे अतिसार हटे, अरू लावै पसीना न शक्तिहू छीजै।। कुइनाइन की समता इसमें, बहुबार परीक्षित है। यश तीजे। शिशु रोगन को तुलसी सो, यह नाशति शीघ्र न संशय कीजे।। मासिक धर्म की अनियमितता

कच्चा सुहागा ३ ग्राम केशर ३ ग्रेन (१ ग्राम) दोनों को खरल कर बारीक घोटकर प्रात: सायं ठंडे पानी के साथ दें। दूसरी मात्रा की जरूरत नहीं होती एक ही बार में ठीक हो जाता है।
मासिक धर्म खोलने हेतु

कलिहारी की जड़ पानी में पीसकर मस्तक पर लेप करने से स्त्रियों की महावारी खुलजाती है।
कर्ज मुक्ति उपाय

भूमि का ढलान ईशान दिशा की ओर रख दें। यदि पहले थोड़ा है तो कुछ और बढ़ा दें एवं किसी सुहागन को सुहाग सामग्री दें। अमावस्या को लोभान जलाकर पूरे घर में घुमाएँ। कर्ज की प्रथम किस्त शुक्ल पक्ष के मंगलवार को देना प्रांरभ करें। तो कर्ज मुक्ति अवश्य होगा।
टोने टोटके का असर खत्म हो

चंदन, कुमकुम, कूट लौंग नेत्रवाला, देवदारू, चासनी जायफनी, लोभान, जायपत्ती, गूगल, केशर को बराबर लेकर धीमी अग्नि से धूनी देवें तो असर खत्म होता है।
रतौंधी (आँख रोग)

ढांक (पलाश) वृक्ष के तने में संध्या समय कुल्हाड़ी तीक्ष्ण शस्त्र से गोदा मार दें। इस गोदे में रस चूने लगेगा। इस रस को रूई में भिगों ले और तुरन्त लाकर रतौंधी वाले रोगी की आँखों में २—४ बूँद टपका दें। रतौंधी २—३ दिन में ठीक होकर जीवन भर को ठीक हो जाएगी।
लकवा

१. औंक के पत्तों को तेल में पकाकर मालिश करने से लाभ होता है। २. उड़द को सौंठ के साथ काड़ा बनाकर पीने से आराम होता है।
स्त्रियों का रक्त स्त्राव

लज्जावन्ती का ३ ग्राम चूर्ण फंकाकर ऊपर से बताशों का शरबत पिलाने से स्त्रियों का रक्त प्रभाव श्राव बन्द हो जाता है। रजोदर्शन रज: प्रर्वाक—खुलना। इन्द्रायण के बीज ४ ग्राम कालीमिर्च ६ नग दोनों को कूटकर २०० ग्राम जल में औटाएँ ५० ग्राम रहने पर छान—कर पिला दें। रजो दर्शन होने लगेगा।
मृगी (अपस्मार)

१. छोटी कटेरी (पसर कटेली) के फल का रस निकालकर नस्य देने से मृगी शीघ्र दूर होती है।

२. बच का कपडछन चूर्ण २ ग्राम चासनी से लेने से मृगी/हिस्टीरिया दूर होता है। एक माह पिलाने से रोग दूर होता हैं।

३. दो ग्राम अधिक ठण्डे जल में पीसकर प्रतिदिन निरन्तर १ माह पिलाने से हिस्टिरीया दूर होता है।

४. करौंदे के पत्ते १० ग्राम दही या मट्ठे के साथ १०—१५ दिन सेवन करें।

५. ५० ग्राम नौसादर को १ लीटर केले के पत्ते के रस में डालकर रखें। मृगी आने पर नाक में टपकाएँ दौरा शान्त होगा।
मूत्रलयोग (पेशाब साफ लाने हेतु)

१. फिटकरी ५० ग्राम कलमी शोरा ५० ग्राम श्वेत चन्दन २५ ग्राम तीनों कूट पीस कपड़छन कर लें पानी से ३ ग्राम खुराक सेवन करें। २. जवारवार ४ ग्राम फिटकरी ३ ग्राम अकरकरा ३ ग्राम हल्दी ३ ग्राम सबको पीसकर कपड़छन कर गाय कीछाछ में मिलाकर पिलाने से मूत्र शीघ्र उतरता है। मुखमण्डल के सौन्दर्य के लिए चेहरे की खूबसूरती बढाने के लिए तगर और चिरोंजी पीसकर मक्खन मिलाकर चेहरे पर उबटन लगाएँ। मुहासे— मसूर की दाल का चूर्ण घी में मिलाकर दूध से पत्थर में घोटों फिर मुंह पर लेप करों। आधे घन्टे बाद धो डालें। नोट: प्रथक से सेना? ‘व्यापार में घाटा हो रहा हो तो— शुक्ल पक्ष में एक चुटकी आटा व १ चुटकी नमक लेकर दूकान के मुख्य द्वार के दोनों और स्वास्तिक बनाएँ। पाँच लौंग व एक जायफल पूजा स्थान में रखें तथा महावीर का जाप करें। १. मुकदमा— यदि मुकदमें में हार की उम्मीद हो तो— अथवा रोग मुक्त न हो रहा हो तो उस व्यक्ति के वजन के बराबर कोयला पानी में बहा दें। लाभ होगा।

२. अनिद्रा— सोते समय १ नींबू का रस एवं सीरा १ गिलास पानी से लेने से नींद आएगी।

३. हाथ पैरों का पसीना— कंडी की राख और पीली कोड़ी का राख पीसकर मालिश से लाभ होगा।

४. कारावास का भय हो तो— ७ नारियल या ४५ पुराने सिक्के जो चलन में न हों उन्हें बहते पानी में बहा दें तो और पार्श्वनाथ स्त्रोत का पाठ करें भय दूर होगा।

५. टोटके— घर में अशान्ति रहने पर— गाय के गोबर का छोटा सा दीपक बनाकर उसमें रूई की बत्ती तथा तिल का तेल भर दें एक छोटी सी गुड़ की खली डालकर घर के दरवाजे के बीच में रख दें।

६. धन हानि बन्द होवे— काले तिल परिवार के सभी सदस्यों के शिर पर से ७—७ बार उतारकर घर के उत्तर दिशा में फैक देें धनहानि बन्द होगी।


अतिसार (दस्त् डाईरिया)

कारण— बहुत भारी, चिकने रूखे, गरम, शीतल संयोग विरूद्ध, प्रकृति विरूद्ध, देश विरूद्ध, ऋतु विरूद्ध, पदार्थों के खाने पीने से, उदर विकार हो जाता है अठराग्नि कमजोर हो जाती है। जिससे पाचन संस्थान विगड़ कर अतिसार (दस्त ) होने लगते हैं।
अतिसार की सम्प्रति

ऊपर लिखे कारणों से रस जल रूधिर, मूत्र, पसीना, मेद, कफ और पित्त प्रकृति पतली धातुएँ कुपित होकर, जठराग्नि या पाचकाग्नि मन्द हो जाती है और स्वयं मल में लिप्त हो जाती हैं। पीछे गुद्दा में रहने वाली अपान वायु उनको नीचे ढकेलती है, तब नदी के वेग की तरह गुद्रा से निकलती है। इन सबके इस तरह निकलने को अतिसार कहते हैं।अतिसार के पूर्व लक्षण—जिनको अतिसार रोग होने वाला होता है, उसके हृदय, नाभि, गुदा, पेट, और कुख में तोड़ने जैसी वेदना होती है। शरीर दु:खी सा रहता है। खाना पीना नहीं पचता। तात्पर्य यह है कि अतिसार होने के पहले ये लक्षण (चिन्ह) नजर आते हैं। अनिसार के पूर्व लक्षण—जिनको अतिसार रोग होने वाला होता है, उसके हृदय नाभि, गुदा, पेट, और कूख में तोड़ने जैसी वेदना होती है। शरीर दु:खी सा रहता है। गुदा की हवा रुक जाती है। मलावरोध हो जाता है, पेट फूल जाता है। खाना पीना नहीं पचता। तात्पर्य यह है कि अतिसार होने के पहले ये लक्षण (चिन्ह) नजर आते हैं। अतिसार ६ प्रकार के (भेद) होते हैं। १. बातातिसार २. पित्तातिसार ३. कफातिसार ४. सन्नपातिसार ५.शोकतितार ६. आगातिसार। नोट— विशेष जानकारी चिकित्सा चन्द्रोदय भाग ३ देखें। अन्य आचार्यों ने ‘भयातिसार’ भी कहा है। शास्त्र में कहा है ‘‘रागद्वेष भयाच्चेव ते स्युरागन्वो गदा’’। अर्थात् राग द्वेष और भय से रोग होता है उसे ‘‘आगुन्तुज’’ कहते हैं।

नोट— अतिसार, संग्रहणी, विशूचिका (हैजा— कालरा) घोर अजीर्ण और कृमि रोग प्रभति में पतले दस्त होते हैं, पर इनके दस्तों में फर्वâ हैं। अन्तर १. अतिसार रोग में मल पानी जैसा पतला होता १. हैजा में भी दस्त पतले होते हैं।

२. अतिसार के दस्तों में मल होता है २. हैजा के दस्तों में मल नहीं होता।

३. अतिसार के दस्त, लाल—पीले, हरे, काले, ३. हैजा के दस्त चाँवल के धोबन जैसे ही होते हैं। धूमिल प्रभृति अनेक रंग के होते के होते हैं। इसमें मल का न होना मुख्य बात है।

४. हैजा में पैशाब आना बहुधा बन्द हो जाती है।

वात, पित्त, कफज आदि अतिसार रोगी को अधिक उबला ठन्डा करके देना चाहिए। ४ किलो जल का १ किलो बचे अति उत्तम है। रोगी को प्यास ज्यादा लगती है। तो उसी जल में उबारते समय ५० ग्राम सौंफ ५० ग्राम नागर मोथा वैंथ बेल १०० ग्राम सौंठ ५० ग्राम पीसकर डाले एवं उबलने पर छानकर पिलाए, रोगी को पूर्ण आराम मिलेगा। आहार में छाछ में कालानमक सौंठ डालकर पिलाएँ। यदि आवश्यक हो तो समा के चावल मठा में उबालकर खीर बनाकर खिलाएँ। परहेज पथ्य— गरिष्ठ, आहार, रोटी, दलिया न दें।
गभिर्णी स्त्री के दस्त का उपाय

सामान्य ऊपरी अचूक ईलाज १. केवल बकरी का दूध सेवन कराने से गर्मिणी स्त्री का अतिसार दूर होता है।

२. ३ ग्राम ईश्वगोल को २० ग्राम जल में भिगो दो भोजन के मध्य में देने से गभिर्णी के दस्त ठीक होते है।

३. आम की पुरानी गुठली कि के गोई (भीतर का दल बेलगिरी, लोध और धनिया, तथा इन चारों दवाईयों को बराबर—बराबर लेकर चूर्ण बनाकर छान लें।

प्रयोग विधि— १. चम्मच (चायचम्मच) दवाई का चूर्ण बनाकर बूरा या मिश्री के साथ थोड़ा दही मिलाकर खाने से गर्भावस्था का अतिसार ठीक हो जाता है। पथ्य— हर तरह के दस्तों में हल्का भोजन लाई के फूला, दही छाछ मट्ठा गुणकारी है। ४. सूखा आँवला का चूर्ण, रूमीमस्तंगी, धनिया और छोटी इलायची सबको बराबर—बराबर लेकर चूर्ण कर १ छोटी चम्मच दवा बेल के शर्वत से देना चाहिए।

५. आम की गुठली का आचार रखकर देते रहने से लम्बे समय के दस्त ठीक होते हैं।

६ सौंठ चूर्ण— १ पाव सौंठ के छोटे—छोटे टुकड़े कर लें फिर उसे १ किलो गाय के मुट्ठे छाँछ में २४ घन्टे के लिए ५० ग्राम सेंधानमक पीस डालकर पूâलने दें। २४ घन्टे बाद निकालकर धूप में सूखा लें। पश्चात तवे पर घी नमक डालकर भून लें एवं उसे डिब्बे में रखें। २—३ पीस सौंठ दिन में ३—४ बार सेवन से पाचक ठीक होता है। भूख बढ़ती है। जायकेदार है।
बालरोग

बालकों के अतिसार (डायरिया) की चिकित्सा १. कौरेया की जड़, अरण्ड की जड़ रतन जोत की जड़ सम्भाग पीसकर उम्रानुसार मात्रा, थोड़ी सी हींग मिलाकर देने से बालकों के भयंकर अतिसार दूर होता है। (परीक्षत प्रयोग है।)

२. यदि मरोड़ देकर दस्त हो तो (वैद्यनाथ कं.) की जन्मघुटी में मरोड़फली देने से लाभ होगा।

३. कड़कड़ा सिंग्गी का चूर्ण २—३ ग्राम सीरा में या छुहारा (खारक) में घोंटकर देने से लाभ होगा।

४. यदि बहुत छोटा बच्चा हो तो बाग में पैदा कपास के फूलों को गरम राख में भूनकर रस निकालो एवं ८— १० बूँद रस या ४—५ बूँद रस पिलाओ तुरन्त आराम होगा।

५. केशर, अफीम, हींग तीनों समान भाग मिलाकर पीसकर (पानी में पीसकर ) बाजरे के बराबर गोली बनालें। १—१ गोली माँ के दूध के साथ देने से बालक का पुराना अतिसार भी ठीक हो जाएगा।

६. छुहारे की गुठली, एवं जायफल और अतीश को लेकर छोटे पत्थर के उरसे पर माँ के दूध में घिसकर थोड़ा—थोड़ा पिलाने से अतिसार ठीक होगा।

नोट: डायरिया में बालक को माँ का दूध न पिलाएँ। ७. खसखस दानें को पानी में पीसकर थोड़ा सा दूध मिलाकर खीर खिलाने से दस्त बन्द होते हैं। ताकत भी बढ़ती है। नोट : ६ माह के कम उम्र को नहीं दें।

८. बेलगिरी और सपेâद कत्था बराबर पीसकर माँ के दूध के साथ देने बालक के दाँत निकलते समय के दस्त बन्द हो जाते हैं।

९. चूने का पानी अमृत— खड़े (डिगला) चूने को ५०० ग्राम लेकर मिट्ठी के धुले बर्तन में २—३ किलो गर्म पानी में बुझा दें पश्चात् थोड़ा लकड़ी से घोल दें। उसे १ सप्ताह रखा रहने दें पानी देखते रहे सूखने न पाएँ। फिर उसमें से ऊपर की पपड़ी सी धीरे से अलग कर उसका पानी बालक को १/२ चम्मच दिन में ३—४ बार पिलाएँ बड़े बच्चों को १—१ चम्मच पिलाएँ यह बालकों को अमृत के समान गुणकारी है। केल्सियम की पूर्ति करता है।
बिना औषधि पानी जैसे अतिसार की बाह्य चिकित्सा

१. ५० ग्राम या २५ ग्राम आँवला को महीन पीसो पीछ उस चूर्ण को घी में पीसकर चटनी सी बना लें। फिर दस्त बाल रोगी को चित्त (सीधा) सुलाकर उसकी नाभि के चारों ओर उसको एक घेरा सा बनाकर उस दीवार सी में अदरख का रस भर दो कम से कम आधा घन्टे लेटा रहने दो ताकि दवा रस गिरने न पाए। इस उपाय से नदी के प्रवाह जैसे दस्त भी बन्द हो जाते हैं। (आजमूदा नुक्सा है।) इरा आँवला लें। यदि ना हो तो सूखे छोटे आँवले लें। नोट: (जहाँ गीला ताजा आँवला हो तो उत्तम है।)

२. आम की छाल,दही के तोड़ के साथ पीसकर नाभि के चारों ओर लगाने से दस्त बन्द हो जाते हैं।

३. बरगद (बड़) का दूध नाभि में भर देने से चारो ओर लगाने दस्त बन्द होते हैं।

४. आँवलों को घी में सेंककर (भूनकर) पानी में पीसकर नाभि के चारों ओर लगा दो एवं २—३ बूँद नाक में टपका दो। तुरन्त आराम होगा।

५.ये साधन भी जल्दी न मिले तो विक्स (मरहम) नाभि में भर दो और थोड़ी मलकर पेट पर लगाओ एवं अमृतधारा भी भर सकते हो। शीघ्र आराम होगा। पीलिया (पाण्डु) (ज्यौन्डसी) उर्दू में (चरकान) (कामला) रोग सम्बन्धी पीलिया (कामला के लक्षण)इस रोग में नेत्र अत्यन्त पीले हो जाते हैं। चमड़ा नाखून मँुह भी पीला या हल्दी जैसे रंग का हो जाता है। मल—मूत्र का रंग भी पीला या लाल रंग हो जाता है। शरीर का रंग बरसाती मैढक जैसा हो जाता है। इन्द्रियों की सामथ्र्य जाती रहती है, हृदय में जलन होती है, भोजन नही पचता, शरीरा और शिथिल हो जाता है तथा अन्त में अरूचि हो जाती है।
पाण्डू रोग के पूर्व रूप

‘चरक’— में लिखा है— हृदय का फडकना, देह का रूखा सा होना, पसीना का न आना,एवं बिना मेहनत किए थकान सी होना ये पीलिया के पूर्व लक्षण हैें। ‘सुश्रुत’— ने लिखा है जब पाण्डु रोग होने वाला होता है तब चमड़े का फटना, मुँह से बारम्बार थूकना, अंगो का भड़कना मिट्टी खाने मे रूचि होना, आँखों पर सूजन आना, मल मूत्र पीला होना अन्न कान पचना— ये लक्षण नजर आते हैं। वाग्भट्ट’ ने भी इसी प्रकार मिलते जुलते लक्षण बताए हैं। ‘माधव निदान’ ग्रन्थ में पाण्डुरोग ५ प्रकार के बताए हैं।— (१) वात का (२) पित्त का (३) कफ का (४) सन्निपात का (५) मिट्ठी का। विशेष विवरण हेतु ग्रन्थों से देखें। रोग के कारण—अधिक मैथुन करने से अधिक मिर्च तेल खटाई खने से, शराब पीने से, मिट्टी खाने, दिन में अधिक सोने से। पाण्डु रोग की उत्पत्ति होती है। प्राय: कर अन्य सभी रोग इन्ही कारणों से होते हैं।
कामला के दो भेद

१.कोष्टाश्रय २. शाखाश्रय नोट— जो कोठे के आश्रय से होता है उसे कोष्ठाश्रय कहते हैं जो रक्तादि धातुओं के आश्रय से होता है। उसे शाखाश्रय कहते हैं। कोठे के आश्रय से होने से जिस तरह घड़े का पेट बड़ा और मुँह छोटा होता है उसी तरह रोगी का पेट बड़ा और मुख छोटा होता है तब उसे ‘कुम्भ कामला’ कहते हैं।
पाण्डु रोग के उपचार (चिकित्सा)

१. लोह भस्म, गोदन्ती भस्म, सौंठ, मिर्च पीपल ओर कंकोल ये सब १०—१० ग्राम लेकर कूट पीसकर कपड़े से या मैदा वाली छन्नी से छान लें। नोट : लोह भस्म अलग रखे इसे सब छनी दवा में बाद में मिला दें। इन सभी चूर्ण के बराबर ‘सोनामक्खी भस्म’ मिला दें। नोट : (यह कोई जीव नहीं है यह भस्म शुद्ध है जैसे—कई रोग जानकारी न होने से ‘गोदन्ती भस्म’ की (गाय के दाँत) भस्म मानकर लेने से मना कर देते हैं। यह भी एक पत्थर की भस्म है। सोना मक्खी को स्वर्णमाक्षिक भी कहते हैं। पूरी दवा एकत्र कर जल में पत्थर की सिल पर पानी मिला घोटें और १—१ रत्ती की गोली बना लें। सेवन विधि—१—१ गोली सीरा के साथ खाने से ऊपर से मट्ठा पीने से पाण्डु रोग शीघ्र ठीक हो जाता है (परीक्षित है) इससे सभी प्रकार के पाण्डु रोग ठीक होते हैं।

२. नवासय लौह— सौंठ, मिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा आँवला, नागरमौथा, वायविंडग और चीते की छाल (चितावर) यह वृक्ष की छाल है। सभी द्रव्य एक एक तोला, वूâट पीसकर कपड़े से या झोल से छान लो फिर इसमें तीन तोला लोह भस्म मिला दो एवं सभी को एक शीशी या डिब्बे में रख लो। सेवन विधि—३—३ रत्ती दवा सीरा के साथ या घी के साथ (सुुबह—शाम दो बार) सेवन कराएँ।

३. पुनर्नवादि मण्डूर— पुनर्नवा (जड़ी) निशोध, सौंठ, कालीमिर्च, पीपल, वायविडंग देवदारू, चीता (चितावर) मीठा वूâट हल्दी, हर्र, बहेड़ा आँवला, दन्ती, चव्य, इन्द्रजो, कुटकी, पीपरामूल, नागरमोथा, कड़कड़ासिंग्गी, कालाजीरा, अजवाइन, कायफल इन सबको ५०—५० ग्राम लेकर चूर्ण कपड़छन कर लो। इनमें सबके बराबर या २५ ग्राम मण्डूर भस्म मिलाकर, पुराना गुड़ मिलाकर ३—३ रत्ती की गोली बना लें। फिर १से २ गोली उम्रानुसार सुबह शाम खिलाए। सभी प्रकार के पीलिया की रामबाण औषधि है।
अजीर्ण के दस्तों के चिकित्सा

१.१ तोला (१० ग्राम ) जायफल को पीसकर २५ ग्राम गुड़ में मिलाकर १/२ (आधा) ग्राम की गोलियाँ बनाकर १—१ घण्टे से १—१ गोली खिलाएँ ऊपर हल्का गरम जल पिलाएँ। इसे बच्चे आराम से खा लेते हैं। तुरन्त लाभ होता है।

२. चूने के पानी में बूरा (मिश्री) मिलाकर खिलाएँ।

३. २ से ४ बूँद अमृत धारा पानी में डालकर पिलाएँ। नाभि टलने पर हुए दस्तों की चिकित्सा

१. नकछिकनी की राख १ तोला, अजवान १ तोला, सौंठ १तोला तीनों कूटपीसकर छान लेवें इसमें ३ तोला पुरानागुड़ जंगली बेर बराबर छोटी—छोटी गोलियाँ बना लें। १ गोली थोड़े से घी के साथ खाने से तुरन्त आराम हो जाता है।

२. फिटकरी १ तोला, माजूफल १ तोला, दोनों महीन पीसकर सिरके में मिलाकर नाभि पर लगा, ऊपर से कपड़े की पट्टी कसकर बाँध दे तो नाभि टलने से दस्तों में आराम हो जाता है।

३. १० ग्राम सौंफ, २० ग्राम गुड़ के साथ खिलाने से नाल (नाभि) हटी हुई अपनी जगह आती है। अतिसार चिकित्सा १. सौंठ, अतीस, बेलगिरी, गिलोय, नागर मोथा, और इन्द्र जो समभाग का काढ़ा पिलाने से ज्वर, अतिसार सूजन सहित ज्वाररितसार नष्ट होता है।

२. दशमूल के काढ़े में १ तोला सोंठ का चूर्ण डालकर पीने से ज्वर अतिसार एवं सूजन युक्त संग्रहणी में आराम होता है।

३. इन्द्र जौ, देवदारु, कुटकी, और गजपीपल, समभाग लेकर काढ़ा पीने से ज्वर अतिसार दाह नष्ट होता है।

नोट— काढ़ा में ५०० ग्राम पानी डालकर धीमी—धीमी अग्नि पर पकाएँ चौथाई भाग शेष रहने पर छानकर पिलाएँ। ४. सौंठ, अतीस, नागरमोथा, गिलोय, चिरायता, इन्द्रजौ, समभाग लेकर काढ़ा बना लें इसे ‘नागरादि क्वांथ’ कहते हैं। यह भयानक अतिसार को नष्ट करता है।
मट्ठा (तक्र) के भेद एवं गुण

सुश्रुत आदि मुनियों ने मट्ठे (तक्र) के ४ भेद कहे हैं— १. तक्र २. घोल ३. मथित ४. उदश्वित १. जो मलाई युक्त दही बिना जल के मथा जाता है उसे ‘धोल’ कहते हैं। (यह भारी होता है।)

२. जो दही मलाई निकालकर, बिना जल के मथा जाता है उसे ‘मथित’ कहते हैं।

३. जो दही चौथाई भाग जल डालकर मथा जाता है उसे तक्र (मट्ठा) कहते हैं। यह गुणकारी होता है।

४. जो दही आधा जल डालकर मथा जाता है, उसे ‘उदश्वित’ कहते हैं।

गुण— मलरोधक, कषौला, खट्ठा, मधुर अग्नि दीपक, उष्णवीर्य, तृप्ति कारक, बात नाशक, दस्त (अतिसार) संग्रहणी रोग में अति गुणकारी है। नोट— जिसमें से सम्पूर्ण घी निकाल लिया हो वह मठ्ठा हल्का, पथ्य कारी होता है। जिसमें थोड़ा घी निकला हो वह भारी होता है। प्रयोग— वात रोग में— सेंधानमक मिलाकर। पित्त रोग में— मट्ठा बूरा मिलाकर प्रयोग करें। कफ रोग में — ज्वाखार, सौंठ कालीमिर्च पीपल का चूर्ण डालकर सेवन करना चाहिए। संग्रहणी अतिसार में— मट्ठे में हींग, जीरा, सेंधा नमक मिलाकर पीना चाहिए। श्वांस खाँसी में— औटाया (गर्म किया) प्रयोग करें। तक्र की प्रशंसा— १.तक्र सेवन करने वाला कभी रोगी नहीं होता। २. तक्र से नष्ट हुए रोग फिर कभी नहीं होते। जिस तरह स्वर्ग में देवों को अमृत सुखदायी हैं, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को मट्ठा है। तक्र की मनाही— गर्मी के मौसम में घाव वाले रोगी को, दुर्बल को, मूर्छित को, भ्रमित को रक्त पित्त रोगी को को मट्ठा नहीं देना चाहिए।
अति तृषा (प्यास अधिक लगने) का उपचार

ग्रीष्म काल में या अन्य समय स्वाभाविक रूप से प्यास लगना अलग बात है किन्तु प्रकृति विरूद्ध बार—बार जल पीने की इच्छा अति तृषा के लक्षण हैं। जिसका उपचार निम्न है— १. सामान्य रूप से बिना दवा खिलाए हलके गीले निचुड़े हुए कपड़ों पर सुलाना। गीली पट्टी सिर एवं गले पर फैरते रहने से तृषा शान्त होती है। (अधिक समय न करें।)

२. १०० ग्राम सौंफ ५० ग्राम सूखा आँवला १० ग्राम बड़ी इलायची को पीसकर उसे २ किलो जल में धीमी अग्नि पर औटाएँ ५०० ग्राम शेष रहने पर उतारकर छान लें एवं ठण्डा करके रोगी को १००—१०० ग्राम बच्चों को २—२ चाय चम्मच पिलानें से अतितृषा, एवं वमन (उल्टी) में शीघ्र लाभ होता है।

३. विजौरा नीबू का रस १० ग्राम, घी, १/२ चम्मच, थोड़ा सेंधानमक मिलाकर पीसकर सिर पर लगा दो। जीभ, तालु, कंठ, सूखता हो तुरन्त आराम होगा। आजमुदा है।

४. अनार, बेल लोध, वैथ और बिजौरा नींबू, इनको महीन पीसकर माथे पर लगाने से प्यास की जलन ठीक होती है।

५. ५० ग्राम धनियाँ १ किलो पानी में डालकर धीमी अग्नि से उबालें। २५० ग्राम बचने पर उतार कर ठण्डा होने पर उसमें ५० ग्राम मिश्री एवं घीं १ चम्मच मिलाकर थोड़ा—थोड़ा पिलाएँ तुरन्त आराम होगा।

६. आमला, कमल की जड़ (मुरार) मीठा कूट, धान का छिलका एवं जड़ सझी खार सभी समान भाग लेकर पानी में पीस गोली छोटी—छोटी बनाकर मुँह से चूसने से शीघ्र आराम होता है।

७. सूखा आँवला २० ग्राम और दुधिया कत्था २० ग्राम पीसकर या छोटे—छोटे पीसकर बनाकर मुँह से चूसने से तृषा शान्त होती है। मँुह के छाले भी ठीक हो जाते हैं।

८. बड़ (बरगद) के अंकुर, पठानी लोघ, अनारदाना, मुलेठी, मिश्री बराबर लेकर पीसकर जल से छोटी—छोटी जंगली बेर के बराबर गोलियाँ बना लो, १—१ गोली मुँुह में रख कर चूसते रहें एवं ऊपर से चाँवलोें का धोवन पीने से तृषा शान्त होगी। परीक्षित प्रयोग है।

९. अक्सर गर्मी में बच्चों को (तौंस, प्यास) रोग हो जाता है। इस हेतु २० ग्राम कमलगट्ठे की (हरी पत्ती) निकालकर वूâटकर बालक के पीने के पानी में पीसकर डाल दो फिर वही पानी बारम्बार पिलाओं शीघ्रे आराम हो जाएगा।

१०. बड़े आदमी को बार—बार प्यास (तौंस) लगती हो तो जंगली कंडो को जलाकर उसकी राख एक काँसे के बर्तन में डालकर, ऊपर से उसमें ठन्डा जल भर दो और उस बर्तन को प्यासे की नाभि पर रख दें। इसके रखते ही जलन मिट जाएगी।

११. कमलगट्ठे को पानी में पीसकर तालू पर लेप करने से प्यास मिट जाती है।

१२. किसमिस को जल में पीसकर उसमें थोड़ी मिश्री (बूरा) मिलाकर पिलाने से प्यास शान्त हो जाती है।

नोट— तृषा मेें— गर्म पदार्थों का गर्मी करने वाले अनाज फल, मिर्च आदि न दें। ठन्डे पदार्थ मधुर रसवाले, गन्ना रस, अनार जूस, सेव, मुसम्मी का जूस आदि देना चाहिए।
बालकों या बड़ों का गुदा (काच) बाहर निकलने को उपचार

यदि अति दस्त लगने से कमजोरी के कारण रोगी वृद्ध, बालक के गुदा में दाह हो गुदा पक जाए, या काच (गुदा) बाहर निकलने लगे तो निम्न उपचार करें। १. पटोल पत्र और मुलेठी समभाग का काड़ा बनाकर ठन्डा करके उस पानी से गुुदा धोना एवं सीचने से लाभ होता है।

२. गुदा में दाह (जलन) हो पक गई हो तो बकरी के दूध में मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिए।

३. गेहूँ के आटे में पानी मिलाकर उसे पकाएँ फिर हल्की गरम गरम गुदा की सैंक करें।

४. कमलनी की कौंपले लाकर सुखा ले फिर कूटकर १/२—१/२ चम्मच खिलाएँ ऊपर से दूध या पानी पिलाएँ।

५. यदि किसी स्त्री की काँच (गुदा) निकल आए तों हुरहुज केफूल (सूरजमुखी) का रस निकाल लें। फिर उसे हाथों में मलकर, गुदा के मुख पर वही हाथ रखें ऐसा ३—४ बार रस लगाएँ अवश्य आराम होगा।

६. अपनी पेशाब (मूत्र) एक बर्तन में रख लो पीछे पखाना जाने के बाद उसी पेशाब से गुदा धोवे और उसके बाद पानी से धोएँ ऐसा करने से ३—४ दिन में गुदा का बाहर निकलना बन्द हो जाती है।

७. यदि गुदा सूज गई हो भीतर न जाती हो तो गुलरोगन को गुदा पर मलो एवं रोगी को हलके गर्म गर्म पानी पर बैठा दो लाभ होगा।

८. गुलरोगन (इत्र बेचने वालों के यहाँ मिलेगा) आम के पत्ते, जामुन के पत्ते, और दोनों की छाल को जो वूâटकर, काढ़ा बनाओं उससे गुदा को धोए ठीक होगा।

९. बबूल के पत्ते एवं फली धाय के फूल का काढ़ा बना हलके गरम काड़े को चौड़े बर्तन में रख रोगी को बैठाओ २—३ दिन में गुदा बाहर निकलनी बन्द हो जायेगी।
अर्श (बवासीर, पाईल्स)

वर्तमान युग में लगभग दो दशक दौरान अर्श रोग (बवासीर) का रोग बहुतायत से हो रहा है इससे अधिकांश स्त्री/पुरूष परेशान है। इस रोग का प्रमुख कारण— आहार, विहार, संयम, नियम, का पालन न करने से प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने पर प्रकृति आपके विरूद्ध अपना डालती है। वातादिक दोष—वात, पित्त, कफ, चमड़ा मांस ओर भेद को दूषित करके गुदा में जो माँस के अंकुर (मस्से ) उत्पन्न हो। उनको ही अर्श (बवासीर) कहते हैं। गुदा की बवासीर ही प्रसिद्ध मानी जाती है किन्तु लिंग की सुपाड़ी इन्हें लिङ्गर्श एवं नाक में होने वाली को नासर्श कहते हैं किन्तु चिकित्सक गुदा के मस्सोें को ही बवासीर मानते हैं। नोट— मनुष्य की गुदा मेें तीन आँटे होती है उन्हीं को संस्कृत में आवर्त कहते हैं। या बलि भी कहते हैं। एक आंटा ऊपर, दूसरा नीचे, तीसरा बीच में होता है, ऊपर के आँटे को ‘प्रवाहनी’ कहते हैं। उसका काम मल और हवा को बाहर निकालना है बीच के आँटे या (बलि) का नाम सर्जनी है। उसका काम मल और पवन को बाहर पटकना अर्थात् बाहर फैक देता है। तीसरे आँटे का नाम ग्रहिणी या सँवरणी है। उसका काम मल और हवा को बाहर निकालकर, गुदा को ज्यों का त्यों कर देना है। पहली दूसरी बलियों का परिमाण १ १/२ अंगुल और तीसरी ग्रहणी का एक अंगुल प्रमाण है। बाकी १/२ अंगुल में गुदा द्वार का जो हिस्सा है उसे गुदा का औंठ कहते हैं इन्हीं तीनों में मस्से (अर्श) होती है। बवासीर के साथ मलावरोध या कब्ज की शिकायत लगी हुई रहती है और बवासीर रोग मन्दाग्नि की ही बजह से होता है। जब अन्न अच्छी तरह नहीं पचता है और उसका प्रथक्करण नहीं होता, तभी बवासीर होती है। अत: कुशल बैद्य को बवासीर वाले रोगी को दस्त साफ (पखाना) होने की दवा देनी चाहिए अगर इसका उपाय न करेगा तो रोग ठीक नहीं होगा। बवासीर की चिकित्सा चार प्रकार की होती है— १. औषधि २.क्षार ३. शस्त्र (आपरेशन) ४. अग्नि लेप, स्वेदन, बत्ती से बाहर के आँटे की बवासीर को नष्ट करना चाहिए। अन्तिम आंटे वाली को यानि भीतर वाली बवासीर को दवाओें से नष्ट करना चाहिए।
मस्से

१. अगर मस्से बाहर दिखते हों, तो सेहुड़ के दूध में हल्दी का चूर्ण मिलाकर १—२ बूँद मस्से पर लगाना चाहिए। रोग ठीक होने पर न लगाएँ।

२. औंक (मदार, अकौआ) का दूध पत्ते तोड़ने पर दूध निकलता है उसे मस्से बिना आपरेश के कट जाते हैं। कुछ समय जलन दर्द होगा सो उसमें गरी के तेल में कपूर पीसकर मिलाकर लगाएँ अथवा हेन्डसा, पाईलेक्स, मल्हम लगाते रहें। मस्से जीवन भर को ठीक हो जाएँगे परीक्षित प्रयोग हैं।

३. तौरई की जड़ पीसकर मस्सों पर लेप करें।

४. रूई के डोरे (सूती धागा) पर हल्दी का चूर्ण लगाकर उसक पर सेंहूड का दूध बारम्बार लगाना चाहिए। इसके बाद उसी डोरे (धागे) को मस्सों पर अलग बाँधते जाओ क्रम क्रम से मस्से कट कर गिर जाएँगे।

५. कासीसादि तेल मस्से पर लगाने से मस्से कट जाते हैं।

नोट— कोई भी दवा शौच (पखाना) के बाद लगाना चाहिए ताकि देर तक दवा लगी रह सके। डॉक्टर पूर्व एवं वैद्यक ग्रन्थों में जौंक लगाने को लिखते हैं पर यह आज वर्तमान में प्रयोग कोई नहीं करता है। न कराना चाहिए। विशेष— वबासीर की चिकित्सा करने के पूर्व रोगी को हल्का रेडी तेल (कास्टर आयल) देते हैं। बाद में चिकित्सा करना चाहिए इससे शीघ्र लाभ होता है। अलसी का तेल ५०—५० ग्राम पिलाने से दस्त साफ होता है। मस्से मुरझा जाते हैं। नोट— बवासीर से खून गिरता है तो उसे तुरन्त बन्द नहीं करें खराब खून निकल जाने दें नहीं तो गुदा में रक्त विकार हो जाएगा। इसके बाद खून बंद की चिकित्सा करें।

६. खून बन्द एवं बवासीर की उत्तम चिकित्सा— फिटकरी को पीसकर तवे पर भूने उसमें से पानी—पानी सा निकलेगा तब फिटकरी सूखी हो जाएँ तो उसे उतार कर पीसकर डिब्बे में रख लें। इसी फिटकरी को मस्सों पर लगाएँ एवं १ १/२ ग्राम फिटकरी सीरा से सुबह शाम खाएँ।

७. कल्याण लवण— शुद्ध भिलमा (भिलमा, भल्लातक) त्रिफला, दन्ती की जड़ सभी को बराबर लेकर (समभाग) इन सबके वजन से दूना सेंधानमक लेकर रखो। इन सबको कूट पीसकर नारियल के खप्पतर में भर दो और जंगली कंडो की आग में मन्दाग्नि (धीमी आग) से पकाओ। पक जाने पर उतार कर रख लो। यह नमक बवासीर रोगियों को बहुत हितकारी है।

८. समर्शकर चूण— सौंठ ७ तोले, पीपर ६ तोले, कालीमिर्च ५ तौले (प्रत्येक ग्राम के तौल से ले सकते हैं।) नागकेशर ४ तोले तेजपात ३ तोले इलायची १ तोला मिश्री २० तोले।सभी चूर्ण बनाकर १/२ चम्मच पानी से सेवन करें।
खूनी बवासीर के परीक्षित नुख्से

१. इन्द्र जौ, कुड़े की छाल, नाग केशर, नीलकमल, लौध और धाय के फूल—इनके कल्क द्वारा घी पकाकर ( सभी दवाएँ समभाग लेकर कुटे बराबर गरम जल में १२ घण्टे भिगो दें जब वह पूर्ण फूल जाएगी तो चौगुना शुद्ध घीं में धीमी अग्नि से उबालें जलने न पाएँ। घी शेष रहने पर उतार लें इसे २—२ चाय चम्मच सेवन करें खूनी बवासीर चली जाएगी।

२. लालचन्दन, चिरायता, छमासा और सौंठ इनको बराबर लेकर काढ़ा धीमी आँच से पकाएँ और रोज पीने से खूनी बवासीर का नाश करता है।

३. ढाक हल्दी, खस, नीम की छाल का काढ़ा खूनी बवासीर का नाश करता है।

४. लाजवन्ती, कमलगट्ठा, मोचरस, लोघ, चन्दन समभाग लेकर बकरी के दूध में औंटकर पीने से खूनी बवासीर जाती है। खून गिरना बन्द हो जाता है परीक्षत प्रयोग।

५. नीम की निबौलियाँ, रसौल, हरड़ तीनों का समभाग कूट पीसकर छानकर गुलाब जल में घोंटकर छोटे बेर बराबर गोली बनाकर सुखा लो। २—२ गोली सुबह—दोपहर शाम पानी के साथ सेवन करने से बवासीर निश्चित शान्त हो जाती है परीक्षित है।

६ .पकी नीम की निबौली— पीसकर पुराने गुड़ में मिलाकर गोली खाने से बवासीर ठीक होगी।

७. नीम के मद को पिचकारी में भरकर गुदा को ३—४ बार धोने से भी बवासीर ठीक होती है।

८. हरड़ में घी में भूनकर, उसमें गुड़ और पीपल का चूर्ण मिलाकर (गुड़ दो गुना) हरड़ पीपल बराबर १ तोला दवा गरम जल से सेवन करने से दस्त साफ होता है। बवासीर ठीक होती है।

९. हुलहुल (सूरजमुखी) के बीज २ तोला शक्कर ४ तोला मिलाकर पीसकर भर खुराक सुबह—शाम लेने से खूनी वादी दोनों बवासीर ठीक हो जाती है।

१०. रसौत १०० ग्राम, अनार की छाल, २०० ग्राम गुड़ ४०० ग्राम पहले रसौत एवं अनार की छाल को महीन पीसकर छानकर फिर गुड़ में मिलकर गोलियाँ जंगली बेर बराबर सेवन करें दोनोें तरह की बवासीर नष्ट होगी।

११. अद्भुत प्रयोग— गाय दूध ५०० ग्राम कटोरे में लेकर मँुह के पास रखें और एक घूँट पीए। उसी समय कोई दूसरा आदमी तुरन्त एक या आधा नींबू (कागजी नींबू) का रस दूध में ठपका दें और रोगी झट से पी जाएँ, (एक सेकेण्ड भी देर न करें।) इससे ३ दिन मे ही चमत्कारिक लाभ होता है।

१२. बबूल की पतली फलियाँ जिसमें बीज न पड़े हो, छाया में सुखा लो, फिर कूट पीसकर छान लो, १५ दिन तक चाय चम्मच चूर्ण जल के साथ खाने से सब तरह की बवासीर ठीक होती है।

१३. निमर्ली के फल को जलाकर राख कर लो, १ चम्मच चूर्ण १ चम्मच बूरा (शक्कर) मिलाकर १५ दिन तक खाने से बवासीर ठीक हो जाती है।
मस्से नाशक लेप

१. पिसी हल्दी और कड़वी तुरई दोनों मिलाकर लेप करने से सब तरह के मस्से नष्ट करता है।

२. आँक के पत्ते और सहजन (सौजना, मुनगा) के पत्तों को पीसकर लेप भी मस्सों को नष्ट करता है।

३. नीम और कनेर के पत्तों को पीसकर लेप करने से मस्से नष्ट होते हैं।

४. सेहुंड के दूध में हल्दी का चूर्ण मिलाकर एक बूँद मस्से पर लगाने से मस्सा नष्ट होता है ।

नोट—सभी प्रयोग परीक्षित हैं शौच (परवाना) के बाद लगाएँ ताकि लेप/दक्ष देर तक लगी रह सके।

५. थूहर का दूध मस्सों पर लगाने से मस्से नष्ट होते हैं।

६. हरी कनेर की जड़ पानी में पीसकर शौचालय में ले जाओ पखाने करते समय मसे बाहर निकल आते हैं। तुरन्त लगा दो। दो दिन में मस्से नष्ट हो जाएँगे।

नोट— कोई दवा लगाने पर मस्से फूटने पर पीड़ा करती है डरे नहीं बाद में कोई भी (सौफा रामाईसीन आदि टयूब लगा लें। धीरे—धीरे दर्द शान्त हो जाएगा। जो अंग्रेजी दवा खाते हैं। वे दर्द नाशक १—१ गोली सुबह/शाम दूध से ले सकते है।

७. कड़वी नीम का तेल १ ग्राम में ३ ग्राम नीलाथोथा पीसकर मिलाकर मस्सों पर थोड़ा—थोड़ा लगाएँ सभी मस्से गलकर नष्ट हो जाते हैं।
सूत बाँधकर मस्से काटने की विधि

दो तोले महीन हल्दी पीसकर थूहर के दूध की भावना देकर अच्छा बटा सूती मजबूत सूत उसमें डुबो दो तीन दिन तक डूबा रहने के बाद चौथे दिन, उसे छाया में सुखा लो। फिर उस धागे को बवासीर के मस्सों पर कसकर बाँध दो। सभी मस्से कटकर क्रमश: गिर जाएँगे। भगन्दर की गाँठ भी ठीक हो जाती है।

२५ बिच्छू (एक काँटेदार फल) पंसारी के यहाँ मिलता है सरसों के तेल में डालकर ४० दिन तक धूप में रखो बाद में इस तेल को मस्सों पर लगाओ पीड़ा सहित बवासीर ठीक होती है।

और भी काले तिल (तिली) बल के अनुसार २० ग्राम से ५० ग्राम तक नित्य सबेरे खाकर जल पीने से बवासीर नष्ट होती है। दाँत मजबूत होते हैं। और शरीर पुष्ट होता है। काले तिल २—१/२ ग्राम नागकेशर २—१/२ ग्राम और मिश्री ५ ग्राम पीसकर १ खुराक हैं। प्रतिदिन सुबह—शाम से खूनी बवासीर में लाभ होगा।