Tuesday, August 18, 2015

प्राणायाम के द्वारा मिलने वाले लाभ


प्राणायाम के द्वारा व्यक्ति को मिलने वाले वाले अनेक लाभ हैं-
•प्राणायाम द्वारा प्राण (वायु) को सुरक्षित रखने का अभ्यास किया जाता है। यह सांस विज्ञान पर आधारित क्रिया है। सांस लेना और छोड़ना जीवन का मुख्य आधार है। इस क्रिया द्वारा वैसे ही सांसों को अपने वश में किया जाता है, जैसे व्यक्ति अपने प्राण को वश में करता है।
•प्राणायाम के द्वारा सांसों पर नियंत्रण किया जाता है, जिससे सांस लेने व छोड़ने की गति कम हो जाती है और अधिक गहरी व लम्बी सांस लेने का अभ्यास हो जाता है। इससे सांसों को बचाने से आयु बढ़ती है और व्यक्ति अधिक समय तक जीवित रहता है। जो व्यक्ति अधिक हांफते हैं या जल्दी-जल्दी सांस लेते हैं, उनकी आयु कम होती जाती है और वह अकाल मृत्यु को भी प्राप्त करते हैं।
•वायुमण्डल में फैले ऑक्सीजन को ही प्राणवायु कहते हैं और जीवनी भी वायु को ही कहते हैं। अत: प्राणायाम के द्वारा हम उसी वायु को अधिक से अधिक अपने अंदर एकत्र करने की कोशिश करते हैं। इसलिए प्राणायाम के द्वारा हमारे अंदर वायु (प्राणशक्ति, जीवनी) की मात्रा अधिक हो जाने से प्राणशक्ति के साथ आयु और शारीरिक क्षमता भी बढ़ जाती है।
•प्राणायाम का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को किसी प्रकार का रोग नहीं होता और इसका प्रतिदिन अभ्यास करने से शरीर में उत्पन्न हो चुका रोग भी खत्म हो जाता है।
•योग के अभ्यास के लिए प्राणायाम का अभ्यास आवश्यक है। ´घेरण्ड संहिता´ और ´हठयोग प्रदीपिका´ में प्राणायाम के महत्वों को बताते हुए कहा गया है कि प्राणायाम के अभ्यास के बिना प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
•प्राणायाम न केवल सांसों को संचित (बचाना) करने का अभ्यास होता है, बल्कि यह मन को शांत व स्थिर भी करता है। इससे बुद्धि का विकास होता है और चिंतन व मनन की क्षमता भी बढ़ती है।
•´योगदर्शन´ में प्राणायाम के बारे में बताते हुए कहा गया है कि इसके अभ्यास से बुद्धि व विवेक से अज्ञानता का नाश होता है। इससे व्यक्ति अंधकार रूपी अज्ञान से निकलकर ज्ञान रूपी प्रकाश में आ जाता है। इसके द्वारा मनुष्य के अंदर इतनी शक्ति आ जाती है कि वह अपने मन को जिस स्थिति में रखना चाहे, रख सकता हैं। इससे मन व इन्द्रियां वश में हो जाती हैं, जिससे प्रत्याहार के अभ्यास से समाधि तक के अभ्यास में लाभ मिलता है।
•प्राणायाम के अभ्यास से शुद्ध वायु का बहाव खून के साथ होने से शरीर के विकार दूर होते हैं। इससे शरीर स्वस्थ रहता है और शरीर में लचक, स्फूर्ति, चुस्ती और सुन्दरता व चमक आ जाती है।
•प्राणायाम से इन्द्रियों में उत्पन्न होने वाले विकार दूर हो जाते हैं। इससे शरीर, मन और प्राण में स्थिरता व स्वास्थ्यता आती है। मनुस्मृति में कहा गया है कि जैसे आग में धातु आदि को गलाकर उसे आकार दिया जाता है, उसी तरह प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों, मन व मस्तिष्क के विकारों को दूर करके मन को स्वच्छ, निर्मल व धार्मिक विचारों को ग्रहण करने योग्य बनाया जाता है।
•मस्तिष्क की शक्तियों का कोई अंत नहीं है इसलिए प्राणायाम के द्वारा मानसिक शक्ति को बढ़ाकर अनेक असाधारण कार्य किये जा सकते हैं। मानसिक शक्तियों में से एक शक्ति इच्छाशक्ति भी है। मस्तिष्क को इच्छाशक्ति गति देती है, जिससे ´विचार´ जो मन की परमाणुमय शक्ति है, उसके सधने से कहीं भी आ जा सकते हैं। इस इच्छाशक्ति को कोई भी रोक नहीं सकता। अपने विचारों को अपने अंदर से ही उत्पन्न किया जा सकता है, जो प्रकृति का आवश्यक तत्व है। हमारे चारो ओर एक विद्युत शक्ति हमेशा मौजूद रहती है और यह विद्युत प्रवाह मनुष्य के अंदर भी होता है। इसे इच्छाशक्ति के अभ्यास के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है और अपने अंदर की इच्छाशक्ति को बढ़ाया जा सकता है। इच्छाशक्ति से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का प्रवाह अंगुलियों के स्पर्श के द्वारा रोगों को भी खत्म करने में किया जा सकता है। ध्यान रखें कि इच्छाशक्ति के साथ ´प्राणायाम कुम्भक´ करना आवश्यक है। ´त्राटक´ के द्वारा दृष्टिशक्ति, कुम्भक के द्वारा सांस को इकट्ठा करके प्राण को बढ़ाने की शक्ति और मन के द्वारा इच्छाशक्ति बढ़ाने की शक्ति प्राप्त करने के बाद ही अपनी इच्छाशक्ति से दूसरों को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए इच्छाशक्ति को बढ़ाने के लिए भी प्राणायाम का अभ्यास आवश्यक है।
•प्राणायाम के अभ्यास से व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ जाती है और उसके अंदर दृढ़ विश्वास पैदा हो जाता है। इस तरह के विश्वासों से व्यक्ति असम्भव काम को भी करने में सफलता प्राप्त कर लेता है- जैसे अधिक वजन उठाना, सीने पर या पेट पर गाड़ी को चलाना, लोहे को मोड़ना आदि। कुछ व्यक्ति प्राणायाम की सिद्धि इस तरह प्राप्त कर चुके थे कि वे अपनी छाती पर हाथी को भी चढाकर करतब दिखाया करते थे।  प्राणायाम व ब्रह्यचर्य के बल पर किसी भी प्रकार के बल प्रयोग में व्यक्ति सक्षम हो सकता है। इस तरह की सभी क्रियाएं देवी चमत्कार नहीं है, बल्कि यह प्राणायाम की साधना का प्रभाव है।
•प्राणायाम के अभ्यास से मानसिक एवं स्नायु संबंधी रोगों का भी इलाज किया जाता है।
•बिना प्राणायाम के अभ्यास के ही रोगों को ठीक करने का असफल प्रयास करने वाले और लोगों को धोखा देने वाले व्यक्ति मूर्ख और अज्ञानी होते हैं। परन्तु प्राणायाम के अभ्यास से रोगों का उपचार कर उसे ठीक करते देखा गया है। इस तरह के रोगों को ठीक करने के लिए शक्ति प्राणायाम से ही मिलती है।
•प्राणायाम के द्वारा अनेक चमत्कारी कार्य किये जा सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यास से व्यक्ति अपनी नाड़ी की गति व हृदय के गति को भी रोक सकता है। आकाश या पानी में भी चल सकता है। यह सभी योग प्राणायाम से ही करने सम्भव हो सकते हैं।

प्राणायाम द्वारा रोग निवारण उपचार



          यदि शरीर के किसी अंग में दर्द हो, सूजन हो, हाथ-पांव ठंड के कारण सुन्न हो गए हों, सिर में तेज दर्द हो अथवा नाक, कान आदि अंगों का कोई विशेष रोग हो तो ऐसे रोगों को दूर करने के लिए शुद्ध वायु (प्राण) से खून को शुद्ध करके रोग ग्रस्त अंगों की ओर उस शुद्ध रक्त को प्रवाहित कराने से रोग में लाभ मिलता है। इस तरह प्राणायाम के द्वारा शुद्ध वायु को शरीर में पहुंचाने से शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ जाती है और रोग धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। कभी-कभी इस क्रिया का 1 से 2 बार अभ्यास करने से ही रोग ठीक हो जाते हैं।

रोगग्रस्त अंगों की ओर रक्त (खून) को प्रवाहित करने की विधि-

          रोग वाले अंग की ओर खून को प्रवाहित करने के लिए और प्राण का अभ्यास करने के लिए पहले सीधे बैठ जायें। यदि रोग में बैठना सम्भव न हो तो पीठ के बल सीधा लेट कर भी इस क्रिया को कर सकते हैं। अब बैठने या लेटने की स्थिति बनने के बाद सामान्य रूप से 5 से 10 बार सांस ले व छोड़ें। ध्यान रखें कि सांस (वायु) अन्दर खींचते हुए 10 बार ´ॐ´ का जाप करें। फिर सांस को अन्दर रोककर 5 बार ´ॐ´ का जाप करें और अंत में सांस (वायु) को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए 10 बार ´ॐ´ का जाप करें। 10 बार ´ॐ´ का जाप करते हुए जब सांस (वायु) को बाहर निकाल दें, तो कुछ क्षण रुककर पुन: सांस (वायु) को अन्दर खींचते हुए पहले वाली क्रिया को करें। इस तरह यह क्रिया जब 5 से 10 बार हो जाए, तो अंत में गहरी सांस लेते हुए मन में कल्पना करें-´´रक्त संचार के साथ ही मेरा सूर्यचक्र स्थिर प्राण प्रवाह रोगग्रस्त अंग की ओर दौड़ रहा है।´´ फिर सांस को अन्दर रोककर मन ही मन कल्पना करें-´´मेरे अन्दर प्राणशक्ति कार्यशाली है और उसके द्वारा रोगग्रस्त अंगों को शक्ति मिल रही है। शरीर के अन्दर शुद्ध वायु के प्रवाह से रोगग्रस्त अंग शुद्ध हो रहे हैं तथा उनमें नई प्राणशक्ति का संचार हो रहा है। मेरे अन्दर विजातीय तत्व अर्थात दूषित तत्व व रोग पर शुद्ध प्राणशक्ति का अधिकार हो गया है। ´´इसके बाद सांस (वायु) को बाहर छोड़ते हुए भी मन में कल्पना करें-´´वायु को बाहर छोड़ने के साथ ही मेरे अन्दर के सभी दोष, विकार और सूजन, दर्द या अन्य कोई भी रोग जो मेरे शरीर में है, वह हवा की तरह ऊपर आसमान में उड़े जा रहा है। ´´जब सांस को बाहर निकाले दें, तो सांस को बाहर ही रोककर पुन: मन ही मन कहें-´´प्राणशक्ति का प्रवाह रोगग्रस्त अंगों पर होने से वह अंग शुद्ध हो गया है।

          इस क्रिया को 15 मिनट से आधे घंटे तक करना चाहिए। प्राणायाम के द्वारा की जाने वाली इस क्रिया से आपको अनुभव होने लगेगा कि अंगों में उत्पन्न दर्द तेजी से कम हो रहा है। इस क्रिया को 6-6 घंटे के अन्तर पर दिन में 3 बार कर सकते हैं। यदि हल्का कष्ट या दर्द हो तो दिन में 2 बार ही इस क्रिया को करें। परन्तु बड़े रोग जैसे जीर्ण रोग को खत्म करने के लिए इस क्रिया को लगातार कुछ दिनों या कुछ सप्ताहों तक करने की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए धैर्यपूर्वक बिना घबराये मन से गलत भावनाओं को समाप्त कर पूर्ण हृदय से इस प्राणायाम को करने से अवश्य ही रोगों में लाभ मिलता है।

          दर्द को खत्म करने वाले इस उपचार के समय अपने रोगग्रस्त अंग को अपने ही हाथों का मृदु स्पर्श (हल्के हाथ से दर्द वाले अंगों पर सहलाना) देकर प्राण विद्युत के प्रवाह को तेज करने में बड़ी मदद मिलती है। ऐसा करने पर इच्छाशक्ति बढ़ती है, क्योंकि स्पर्श से रक्त और प्राण (जीवनी) उस ओर दौड़ते हुए देखे जाते हैं।

सावधानी-

•सिर के ऊपरी भाग में दर्द हो, तो प्राण संचार को ऊपर से नीचे की ओर ही करना चाहिए क्योंकि उर्ध्वांगों (शरीर के ऊपरी अंग) में खून का दबाव बढ़ने से ही अक्सर दर्द उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में मस्तिष्क की ओर ध्यान करने से मस्तिष्क की ओर खून का दबाव बढ़ जाता है, जिसके फल स्वरूप लाभ होने के स्थान पर हानि होने की संभावना रहती है।
•रोगग्रस्त अंगों पर अंगुलियों को मोड़कर मन ही मन बोलें ´निकल जाओ´ ´निकल जाओ´ ´विकार भाग´ ऐसा कहते हुए मार्जन (सहलाना) भी किया जा सकता है। इस क्रिया को वैसे ही करना चाहिए जैसे कोई भूत-प्रेत को झाड़ते समय करता है। अंगुलियों को रोगग्रस्त अंग पर मार्जन (सहलाना) करने से अंगुलियों से लगातार निकलने वाली चुम्बकीय किरणें (प्राणशक्ति) रोग वाले स्थान में प्रवाहित होने लगती है और रोगग्रस्त अंगों में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है। इस तथ्य को ´डॉ. किलनर´ के ओरों स्कोप नामक यंत्र के द्वारा सिद्व करके दिखाया गया है। अत: मार्जन (अंगुलियों से सहलाना) के द्वारा विद्युत प्रवाह विकृत अंग पर डालने से प्राकृतिक रोग को खत्म करने के लिए अंगों को शक्ति मिलती है, जिससे रोग को खत्म करने में सहायता मिलती है।
प्राणायाम के द्वारा अनेक रोगों को दूर करना-  

          प्राणायाम के द्वारा अनेकों रोगों को समाप्त किया जा सकता है। रोगों को समाप्त करने के लिए बताए गए सभी प्राणायामों का अभ्यास स्वच्छ-शांत व स्वच्छ हवा के बहाव वाले स्थान पर करें। ध्यान रखें कि प्राणायाम वाले स्थान पर हवा का बहाव तेज न हों। इससे सांस लेने में कठिनाई हो सकती है।

कब्ज को खत्म करने के लिए-

          कब्ज को दूर करने के लिए प्लाविनी कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए। यह पुराने से पुराने कब्ज में भी अत्यधिक लाभकारी होता है।

कुम्भक प्राणायाम की विधि-

          अभ्यास के लिए पहले स्थिरासन में बैठ जाएं। फिर नाक के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे-धीरे अन्दर खींचें और पेट को फुलाते जाएं। पेट में पूर्ण रूप से वायु भर जाने पर सांस को जितनी देर तक अन्दर रोकना सम्भव हो रोककर रखें। इसके बाद नाक के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इसके बाद पुन: इस क्रिया को करें। इस क्रिया को सुविधा के अनुसार जितनी बार कर सकते हैं, करें।

          कब्ज को दूर करने के लिए दक्षिण रेचक प्राणायाम का भी अभ्यास कर सकते हैं।

पेट के रोगों को दूर करने के लिए-

          पेट के रोगों को दूर करने के लिए मध्य रेचक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह प्राणायाम पेट के सभी रोगों व दोषों को खत्म करने में लाभकारी माना गया है।

मध्य रेचन प्राणायाम की विधि-

          मध्य रेचक प्राणायाम के लिए स्वास्तिक या उत्कटासन में बैठें। अब अन्दर की वायु को बाहर निकालकर सांसों को रोककर रखें। इसके बाद उड्डियान बन्ध लगाकर आंतों को इस तरह से ऊपर उठायें कि वह बेलन की तरह पेट में उभर आए। दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर रखें और पेट के दोनों बगलों में दबाव देते हुए बाहरी कुम्भक करें (अन्दर की वायु को बाहर निकाल कर सांसों को रोककर रखें)। इस स्थिति में सांसों को रोककर जितनी देर तक रहना सम्भव हो रोककर रखें। फिर बन्ध को हटाकर व हाथों का दबाव बगल से हटाते हुए धीरे-धीरे सांस अन्दर खींचें। इस क्रिया में सांस को रोककर रखने के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते जाएं। ध्यान रखें कि इस क्रिया का अभ्यास सावधानी से करें और हो सके तो किसी अनुभवी योग साधक की देख-रेख में अभ्यास करें।

          इस प्राणायाम से आंतों के विकार दूर हो जाते हैं और आंते शक्तिशाली बनती हैं। यह कब्ज को दूर करता है तथा पेट के सभी रोगों को खत्म करता है। यह तिल्ली व जिगर के दोषों को भी खत्म करता है।

खट्टी डकारों के लिए-

          खट्टी डकारों को दूर करने के लिए चन्द्र भेदन प्राणायाम का अभ्यास करें। नाक के बाएं छिद्र को चन्द्र नाड़ी तथा बाएं छिद्र को सूर्य नाड़ी कहते हैं। इस प्राणायाम में वायु को नाक के बाएं छिद्र से अन्दर खींचा जाता है (पूरक किया जाता है) इसलिए इसे चन्द्र भेदन प्राणायाम कहते हैं।

चन्द्र भेदन प्राणायाम की विधि-

          चन्द्र भेदन प्राणायाम के अभ्यास के लिए पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। इसके बाद दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करें और नाक के बाएं छिद्र से आवाज के साथ वायु को अन्दर खींचें। अब सांस को अन्दर जितनी देर तक रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें और फिर नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इस क्रिया का अभ्यास कई बार करें। इस क्रिया का अभ्यास अपनी सुविधा के अनुसार करना चाहिए।

पेट की चर्बी कम करने व शरीर को पतला करने के लिए-

          भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास से पेट की अधिक चर्बी कम होती है और शरीर पतला व सुडौल बनता है। इसका अभ्यास सावधानी से करें।

भस्त्रिका प्राणायाम की विधि-

          इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए पहले सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। अब दाएं हाथ को ऊपर उठाते हुए कोहनी को कंधे की सीध में रखें और अंगुलियों से नाक के बाएं छिद्र को बन्द करें। अब नाक के दाएं छिद्र से तेज गति के साथ वायु को बाहर निकालें और फिर अन्दर खींचें। इस क्रिया से सांस को बिना रोकें कम से कम 8 से 10 बार सांस लें और छोड़ें। अंत में सांस अन्दर खींचकर सांस को रोककर रखें। सांस को जितनी देर तक आसानी से रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें। इसके बाद दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करें और नाक के बाएं छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। फिर नाक के बाएं छिद्र से ही तेज गति के साथ लगातर 8 से 10 बार सांस ले व छोड़ें। अंत में वायु को अन्दर खींच कर उसे अन्दर ही अपनी क्षमता के अनुसार रोककर रखें और फिर नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। यह प्राणायाम का 1 चक्र है और इस तरह इस क्रिया का 3 बार अभ्यास करें। इसका अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए तथा धीरे-धीरे इसकी संख्या को भी बढ़ाते रहना चाहिए।

          इसके अतिरिक्त अग्नि प्रसारण प्राणायाम, वामरेचक प्राणायाम और कमनीय कुम्भक प्राणायाम से भी शरीर की अधिक चर्बी को कम किया जा सकता है।

सावधानियां-

         इस प्राणायाम का अभ्यास सावधानी से करना आवश्यक है अन्यथा इससे हानि हो सकती है। इसके अभ्यास में सावधानी न रखने पर थूक के साथ खून आदि आने की संभावना रहती है। इससे दमा व खांसी की भी शिकायत हो सकती है। इसलिए इस प्राणायाम का अभ्यास प्राणायाम के अनुभवी गुरू की देख-रेख में करना चाहिए। इसके अभ्यास के क्रम में दूध व घी का सेवन करना चाहिए। कमजोर व्यक्ति को इसका अभ्यास तेजी से नहीं करना चाहिए, अन्यथा सिर में चक्कर आने की संभावना रहती है।

रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर या ब्लडप्रेशर) को सामान्य रखने के लिए-

          रक्तचाप की गति को सामान्य रखने के लिए शीतली कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह एक अच्छा प्राणायाम है और इससे मिलने वाले अनेकों लाभों के बारे में ´घेरण्ड संहिता´ में बताया गया है, जिनमें पित्त विकार, कफ विकार व अजीर्ण (पुराना कब्ज) रोग को विशेष रूप से खत्म करने के लिए बताया गया है।

शीतली प्राणायाम की विधि-

          इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए सुखासन में बैठ जाएं और दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। जीभ को दोनों किनारों से मोड़कर एक नली की तरह बनाएं और मुंह से हल्का बाहर निकाल कर होठों को बन्द कर लें। अब जीभ से बनी नली के द्वारा धीरे-धीरे वायु (सांस) को अन्दर खींचें। जब पूर्ण रूप से वायु अन्दर भर जाएं, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार अन्दर रोककर रखें। वायु को अन्दर रोकने की स्थिति मेंघबराहट हो तो दोनों नासिका से वायु को बाहर निकाल दें। इस क्रिया को पुन: करें। इसका अभ्यास करते समय वायु को अन्दर खींचने के समय व अन्दर रोकने के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते रहें।

सावधानी-

          इस प्राणायाम का अभ्यास कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम का अभ्यास गर्मी के मौसम में करना चाहिए तथा सर्दी के मौसम में इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। अभ्यास के समय घबराहट होने पर वायु को नासिका द्वारा बाहर निकाल दें।

हृदय की धड़कन के लिए-

          हृदय की बढ़ी हुई धड़कन के लिए वक्षस्थल रेचक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। इससे धड़कन की गति सामान्य होती है।

वक्षस्थल रेचन प्राणायाम की विधि-

          इसके अभ्यास के लिए स्वच्छ वातावरण में सुखासन में बैठ जाएं। इसके बाद नाक के दोनों छिद्रों से सांस (वायु) अन्दर खींचें और फिर धीरे-धीरे सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। जब सांस (वायु) पूर्ण रूप से बाहर निकल जाए, तो सांस को रोक लें (बाहरी कुम्भक करें)। अब कोहनियों को ऊपर उठाते हुए दोनों हाथों को कंधे पर रखें। इसके बाद छाती को हल्का ढीला करते हुए कंधे हल्के से सिकोड़ें (संकुचित करें) और फिर कंधे को आगे की ओर करें। आसन की इस स्थिति में जितनी देर तक सांस को रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें। फिर धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़ें। यह वक्षस्थल रेचन प्राणायाम का एक चक्र है। इस तरह इसका अभ्यास कई बार करें और धीरे-धीरे इसके अभ्यास का चक्र बढ़ाने की कोशिश करें।

कफ दोषों को दूर करने के लिए-

          फेफड़ों को शुद्ध (साफ) करने के लिए और कफ को खत्म करने के लिए कपाल भांति प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। ´घेरण्ड संहिता´ और ´हठयोग प्रदीपिका´ दोनों में इस प्राणायाम के अभ्यास की अलग-अलग विधियां बताई गई हैं। इन दोनों विधियों से प्राणायाम का अभ्यास करने पर इसके लाभ समान प्राप्त होते हैं।

कपाल भांति प्राणायाम के अभ्यास की विधि-

´घेरण्ड संहिता´ विधि-

         कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास पद्मासन में बैठकर या खड़े होकर कर सकते हैं। इसके अभ्यास के लिए आसन की स्थिति में बैठ जाएं और दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके नाक के बाएं छिद्र से धीरे-धीरे सांस (वायु) अन्दर खींचें। फिर नाक के बाएं छिद्र को बाकी अंगुलियों से बन्द करके दाएं छिद्र से सांस (वायु) को बाहर छोड़ें। पुन: नाक के दाएं छिद्र से ही सांस (वायु) अन्दर खींचें और दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। इस तरह बाएं से सांस लेकर दाएं से निकालना और फिर दाएं से ही सांस लेकर बाएं से निकालना। इस तरह इस क्रिया का कई बार अभ्यास करें।

´हठयोग प्रदीपिका´ विधि-

         इस क्रिया के लिए पहले पद्मासन की स्थिति में बैठ जाएं। अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़े। अब जल्दी-जल्दी सांस लें और छोड़ें। सांस लेते व छोड़ते समय ध्यान रखें कि सांस लेने में जितना समय लगे उसका एक तिहाई समय ही सांस छोड़ने में लगाएं। इस तरह सांस लेने व छोड़ने की क्रिया को बढ़ाते रहें, जिससे सांस लेने व छोड़ने की गति 1 मिनट में 120 बार तक पहुंच जाए। ध्यान रखें कि सांस लेते व छोड़ते समय केवल पेट की पेशियां ही हरकत करें तथा छाती व अन्य अंग स्थिर रहें। इस क्रिया को शुरू करने के बाद क्रिया पूर्ण होने से पहले न रुकें। इस क्रिया में पहले 1 सेकेण्ड में 1 बार सांस लें और छोड़ें और बाद में उसे बढ़ाकर 1 सेकेंड में 3 बार सांस लें और छोड़ें। इस क्रिया को सुबह-शाम 11-11 बार करें और इसके चक्र को हर सप्ताह बढ़ाते रहें। इस क्रिया में 1 चक्र पूरा होने पर श्वासन क्रिया सामान्य कर लें और आराम के बाद पुन: इस क्रिया को दोहराते हुए 11 बार करें।

जुकाम का नाश व सुरक्षा के लिए-

          जुकाम को खत्म करने व सुरक्षा के लिए अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम की विधि-

           इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए पद्मासन में बैठ जाएं। इसके बाद दाएं हाथ से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से तीव्र गति से अन्दर की सांस (वायु) को बाहर निकालें (रेचक करें)। फिर जिस गति से सांस (वायु) को बाहर निकाला गया है, उसी गति से सांस (वायु) को अन्दर खींचें। इसके बाद नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से तीव्र गति से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें और फिर नाक के बाएं छिद्र से ही सांस (वायु) को अन्दर खींचें। फिर दाएं से बाहर निकाल दें। इस तरह इस क्रिया को दोनों नासिका से बदल-बदल कर कम से कम 20-20 बार अभ्यास करें। प्राणायाम के इस अभ्यास को धीरे-धीरे बढ़ाएं।

कंठ रोगों को दूर करने के लिए-

          कंठ की नाड़ियों को शक्तिशाली बनाने व कंठ और गले के रोगों को खत्म करने के लिए ´चतुर्मुखी प्राणायाम´ का अभ्यास करना चाहिए। चतुर्मुखी प्राणायाम का अर्थ बिना कुम्भक किये पूरक व रेचक करते हुए मुंह को चारों ओर बाएं, दाएं, नीचे और ऊपर की ओर करना होता है। इस क्रिया को 15 बार रोजाना करना चाहिए और धीरे-धीरे इसके अभ्यास को बढ़ाना चाहिए।

चतुर्मुखी प्राणायाम की विधि-

          इसके अभ्यास के लिए पद्मासन में बैठ जाएं। अब मुंह को बाएं कंधे की ओर घुमाएं। इसके बाद नाक से आवाज करते हुए तीव्र गति से सांस (वायु) को अन्दर खींचें। फिर दाएं हाथ से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से सांस (वायु) को अन्दर से बाहर निकालें। इसके बाद मुंह को दाएं कंधे की ओर घुमाएं और नाक के बाएं छिद्र से सांस (वायु) अन्दर खींचकर नाक के दाएं छिद्र से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। इसके बाद मुंह को ऊपर व नीचे की ओर करके भी इस क्रिया का अभ्यास करें। इस तरह मुंह को चारों ओर घुमाकर करने से अभ्यास का 1 चक्र पूरा होता है। इस तरह इसके चक्र को अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास करना चाहिए।

ध्यान रखें-

          इसके अभ्यास में पहले सांस छोड़ते व लेते समय नासिका को बन्द करने के लिए हाथ का प्रयोग करें और अभ्यास होने पर बिना हाथ की सहायता के ही सांस लेने व छोड़ने की क्रिया का अभ्यास करें। सांस लेते व छोड़ते (पूरक व रेचक करते समय) समय नाक से आवाज आनी चाहिए।

ताड़ासन का चमत्कारिक प्रयोग



ताड़ासन करने से प्राण ऊपर के केन्द्रों में आ जाते हैं जिससे पुरुषों के वीर्यस्राव एवं स्त्रियों के प्रदररोग की तकलीफ में तुरंत ही लाभ होता है।

वीर्यस्राव क्यों होता है ? जब पेट में दबाव (Intro-abdominal pressure) बढ़ता है तब वीर्यस्राव होता है। इस दबाव(प्रेशर) के बढ़ने के कारण इस प्रकार है-

ठूँस-ठूँसकर खाना, बार-बार खाना, कब्जियत, गैस होने पर भी वायु करे ऐसी आलू, गवारफली, भिंडी, तली हुई चीजों का अधिक सेवन एवं अधिक भोजन, लैंगिक (सैक्स सम्बन्धी) विचार, चलचित्र देखने एवं पत्रिकाएँ पढ़ने से।

इस दबाव के बढ़ने से प्राण नीचे के केन्द्रों मे, नाभि से नीचे मूलाधार केन्द्र में आ जाते हैं जिसकी वजह से वीर्यस्राव हो जाता है। इस प्रकार के दबार के कारण हर्निया की बीमारी भी हो जाती है।

ताड़ासन की विधिः

सर्वप्रथम एकदम सीधे खड़े होकर हाथ ऊँचे रखें। फिर पैरों के पंजों के बल पर खड़े होकर रहें एवं दृष्टि ऊपर की ओर रखें। ऐसा दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) 5-10 मिनट तक करें।

यदि पैरों के पंजों पर खड़े न हो सकें तो जैसे अनुकूल हो वैसे खड़े रहकर भी यह आसन किया जा सकता है।

यह आसन बैठे-बैठे भी किया जा सकता है। जब भी काम(सेक्स) सम्बन्धी विचार आयें तब हाथ ऊँचे करके दृष्टि ऊपर की ओर करनी चाहिए।

कुछ उपयोगी बातें



घी, दूध, मूँग, गेहूँ, लाल साठी चावल, आँवले, हरड़े, शुद्ध शहद, अनार, अंगूर, परवल – ये सभी के लिए हितकर हैं।

अजीर्ण एवं बुखार में उपवास हितकर है।

दही, पनीर, खटाई, अचार, कटहल, कुन्द, मावे की मिठाइयाँ – से सभी के लिए हानिकारक हैं।

अजीर्ण में भोजन एवं नये बुखार में दूध विषतुल्य है। उत्तर भारत में अदरक के साथ गुड़ खाना अच्छा है।

मालवा प्रदेश में सूरन(जमिकंद) को उबालकर काली मिर्च के साथ खाना लाभदायक है।

अत्यंत सूखे प्रदेश जैसे की कच्छ, सौराष्ट्र आदि में भोजन के बाद पतली छाछ पीना हितकर है।

मुंबई, गुजरात में अदरक, नींबू एवं सेंधा नमक का सेवन हितकर है।

दक्षिण गुजरात वाले पुनर्नवा(विषखपरा) की सब्जी का सेवन करें अथवा उसका रस पियें तो अच्छा है।

दही की लस्सी पूर्णतया हानिकारक है। दहीं एवं मावे की मिठाई खाने की आदतवाले पुनर्नवा का सेवन करें एवं नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग करें तो लाभप्रद हैं।

शराब पीने की आदवाले अंगूर एवं अनार खायें तो हितकर है।

आँव होने पर सोंठ का सेवन, लंघन (उपवास) अथवा पतली खिचड़ी और पतली छाछ का सेवन लाभप्रद है।

अत्यंत पतले दस्त में सोंठ एवं अनार का रस लाभदायक है।

आँख के रोगी के लिए घी, दूध, मूँग एवं अंगूर का आहार लाभकारी है।

व्यायाम तथा अति परिश्रम करने वाले के लिए घी और इलायची के साथ केला खाना अच्छा है।

सूजन के रोगी के लिए नमक, खटाई, दही, फल, गरिष्ठ आहार, मिठाई अहितकर है।

यकृत (लीवर) के रोगी के लिए दूध अमृत के समान है एवं नमक, खटाई, दही एवं गरिष्ठ आहार विष के समान हैं।

वात के रोगी के लिए गरम जल, अदरक का रस, लहसुन का सेवन हितकर है। लेकिन आलू, मूँग के सिवाय की दालें एवं वरिष्ठ आहार विषवत् हैं।

कफ के रोगी के लिए सोंठ एवं गुड़ हितकर हैं परंतु दही, फल, मिठाई विषवत् हैं।

पित्त के रोगी के लिए दूध, घी, मिश्री हितकर हैं परंतु मिर्च-मसालेवाले तथा तले हुए पदार्थ एवं खटाई विषवत् हैं।

अन्न, जल और हवा से हमारा शरीर जीवनशक्ति बनाता है। स्वादिष्ट अन्न व स्वादिष्ट व्यंजनों की अपेक्षा साधारण भोजन स्वास्थ्यप्रद होता है। खूब चबा-चबाकर खाने से यह अधिक पुष्टि देता है, व्यक्ति निरोगी व दीर्घजीवी होता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि प्राकृतिक पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के सिवाय जीवनशक्ति भी है। एक प्रयोग के अनुसार हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से कृत्रिम पानी बनाया गया जिसमें खास स्वाद न था तथा मछली व जलीय प्राणी उसमें जीवित न रह सके।

बोतलों में रखे हुए पानी की जीवनशक्ति क्षीण हो जाती है। अगर उसे उपयोग में लाना हो तो 8-10 बार एक बर्तन से दूसरे बर्तन में उड़ेलना (फेटना) चाहिए। इससे उसमें स्वाद और जीवनशक्ति दोनों आ जाते हैं। बोतलों में या फ्रिज में रखा हुआ पानी स्वास्थ्य का शत्रु है। पानी जल्दी-जल्दी नहीं पीना चाहिए। चुसकी लेते हुए एक-एक घूँट करके पीना चाहिए जिससे पोषक तत्त्व मिलें।

वायु में भी जीवनशक्ति है। रोज सुबह-शाम खाली पेट, शुद्ध हवा में खड़े होकर या बैठकर लम्बे श्वास लेने चाहिए। श्वास को करीब आधा मिनट रोकें, फिर धीरे-धीरे छोड़ें। कुछ देर बाहर रोकें, फिर लें। इस प्रकार तीन प्राणायाम से शुरुआत करके धीरे-धीरे पंद्रह तक पहुँचे। इससे जीवनशक्ति बढ़ेगी, स्वास्थ्य-लाभ होगा, प्रसन्नता बढ़ेगी।

पूज्य बापू जी सार बात बताते हैं, विस्तार नहीं करते। 93 वर्ष तक स्वस्थ जीवन जीने वाले स्वयं उनके गुरुदेव तथा ऋषि-मुनियों के अनुभवसिद्ध ये प्रयोग अवश्य करने चाहिए।

स्वास्थ्य और शुद्धिः

उदय, अस्त, ग्रहण और मध्याह्न के समय सूर्य की ओर कभी न देखें, जल में भी उसकी परछाई न देखें।

दृष्टि की शुद्धि के लिए सूर्य का दर्शन करें।

उदय और अस्त होते चन्द्र की ओर न देखें।

संध्या के समय जप, ध्यान, प्राणायाम के सिवाय कुछ भी न करें।

साधारण शुद्धि के लिए जल से तीन आचमन करें।

अपवित्र अवस्था में और जूठे मुँह स्वाध्याय, जप न करें।

सूर्य, चन्द्र की ओर मुख करके कुल्ला, पेशाब आदि न करें।

मनुष्य जब तक मल-मूत्र के वेगों को रोक कर रखता है तब तक अशुद्ध रहता है।

सिर पर तेल लगाने के बाद हाथ धो लें।

रजस्वला स्त्री के सामने न देखें।

ध्यानयोगी ठंडे जल से स्नान न करे।

अपने हाथ में ही अपना आरोग्य



नाक को रोगरहित रखने के लिये हमेशा नाक में सरसों या तिल आदि तेल की बूँदें डालनी चाहिए। कफ की वृद्धि हो या सुबह के समय पित्त की वृद्धि हो अथवा दोपहर को वायु की वृद्धि हो तब शाम को तेल की बूँदें डालनी चाहिए। नाक में तेल की बूँदे डालने वाले का मुख सुगन्धित रहता है, शरीर पर झुर्रियाँ नहीं पड़तीं, आवाज मधुर होती है, इन्द्रियाँ निर्मल रहती हैं, बाल जल्दी सफेद नहीं होते तथा फुँसियाँ नहीं होतीं।

अंगों को दबवाना, यह माँस, खून और चमड़ी को खूब साफ करता है, प्रीतिकारक होने से निद्रा लाता है, वीर्य बढ़ाता है तथा कफ, वायु एवं परिश्रमजन्य थकान का नाश करता है।

कान में नित्य तेल डालने से कान में रोग या मैल नहीं होती। बहुत ऊँचा सुनना या बहरापन नहीं होता। कान में कोई भी द्रव्य (औषधि) भोजन से पहले डालना चाहिए।

नहाते समय तेल का उपयोग किया हो तो वह तेल रोंगटों के छिद्रों, शिराओं के समूहों तथा धमनियों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को तृप्त करता है तथा बल प्रदान करता है।

शरीर पर उबटन मसलने से कफ मिटता है, मेद कम होता है, वीर्य बढ़ता है, बल प्राप्त होता है, रक्तप्रवाह ठीक होता है, चमड़ी स्वच्छ तथा मुलायम होती है।

दर्पण में देहदर्शन करना यह मंगलरूप, कांतिकारक, पुष्टिदाता है, बल तथा आयुष्य को बढ़ानेवाला है और पाप तथा दारिद्रय का नाश करने वाला है

(भावप्रकाश निघण्टु)

जो मनुष्य सोते समय बिजौरे के पत्तों का चूर्ण शहद के साथ चाटता है वह सुखपूर्वक स सकता है, खर्राटे नहीं लेता।

जो मानव सूर्योदय से पूर्व, रात का रखा हुआ आधा से सवा लीटर पानी पीने का नियम रखता है वह स्वस्थ रहता है।

सुखमय जीवन की कुंजियाँ



सनातन संस्कृति का महाभारत जैसा ग्रन्थ भी ईश्वरीय ज्ञान के साथ शरीर-स्वास्थ्य की कुंजियाँ धर्मराज युधिष्ठिर को पितामह भीष्म के द्वारा दिये गये उपदेशों के माध्यम से हम तक पहुँचता है। जीवन को सम्पूर्ण रूप से सुखमय बनाने का उन्नत ज्ञान सँजोये रखा है हमारे शास्त्रों नेः

सदाचार से मनुष्य को आयु, लक्ष्मी तथा इस लोक और परलोक में कीर्ति की प्राप्ति होती है। दुराचारी मनुष्य इस संसार में लम्बी आयु नहीं पाता, अतः मनुष्य यदि अपना कल्याण करना चाहता हो तो क्यों न हो, सदाचार उसकी बुरी प्रवृत्तियों को दबा देता है। सदाचार धर्मनिष्ठ तथा सच्चरित्र पुरुषों का लक्षण है।

सदाचार ही कल्याण का जनक और कीर्ति को बढ़ानेवाला है, इसी से आयु की वृद्धि होती है और यही बुरे लक्षणों का नाश करता है। सम्पूर्ण आगमों में सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया गया है। सदाचार से धर्म उत्पन्न होता है और धर्म के प्रभाव से आयु की वृद्धि होती है।

जो मनुष्य धर्म का आचरण करते हैं और लोक कल्याणकारी कार्यों में लगे रहते हैं, उनके दर्शन न हुए हों तो भी केवल नाम सुनकर मानव-समुदाय उनमें प्रेम करने लगता है। जो मनुष्य नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, धर्म को न जानने वाले, दुराचारी, शीलहीन, धर्म की मर्यादा को भंग करने वाले तथा दूसरे वर्ण की स्त्रियों से संपर्क रखने वाले हैं, वे इस लोक में अल्पायु होते हैं और मरने के बाद नरक में पड़ते हैं। जो सदैव अशुद्ध व चंचल रहता है, नख चबाता है, उसे दीर्घायु नहीं प्राप्त होती। ईर्ष्या करने से, सूर्योदय के समय और दिन में सोने से आयु क्षीण होती है। जो सदाचारी, श्रद्धालु, ईर्ष्यारहित, क्रोधहीन, सत्यवादी, हिंसा न करने वाला, दोषदृष्टि से रहित और कपटशून्य है, उसे दीर्घायु प्राप्त होती है।

प्रतिदिन सूर्योदय से एक घंटा पहले जागकर धर्म और अर्थ के विषय में विचार करे। मौन रहकर दंतधावन करे। दंतधावन किये बिना देव पूजा व संध्या न करे। देवपूजा व संध्या किये बिना गुरु, वृद्ध, धार्मिक, विद्वान पुरुष को छोड़कर दूसरे किसी के पास न जाय। सुबह सोकर उठने के बाद पहले माता-पिता, आचार्य तथा गुरुजनों को प्रणाम करना चाहिए।

सूर्योदय होने तक कभी न सोये, यदि किसी दिन ऐसा हो जाय तो प्रायश्चित करे, गायत्री मंत्र का जप करे, उपवास करे या फलादि पर ही रहे।

स्नानादि से निवृत्त होकर प्रातःकालीन संध्या करे। जो प्रातःकाल की संध्या करके सूर्य के सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीर्थों में स्नान का फल मिलता है और वह सब पापों से छुटकारा पा जाता है।

सूर्योदय के समय ताँबे के लोटे में सूर्य भगवान को जल(अर्घ्य) देना चाहिए। इस समय आँखें बन्द करके भ्रूमध्य में सूर्य की भावना करनी चाहिए। सूर्यास्त के समय भी मौन होकर संध्योपासना करनी चाहिए। संध्योपासना के अंतर्गत शुद्ध व स्वच्छ वातावरण में प्राणायाम व जप किये जाते हैं।

नियमित त्रिकाल संध्या करने वाले को रोजी रोटी के लिए कभी हाथ नहीं फैलाना पड़ता ऐसा शास्त्रवचन है। ऋषिलोग प्रतिदिन संध्योपासना से ही दीर्घजीवी हुए हैं।

वृद्ध पुरुषों के आने पर तरुण पुरुष के प्राण ऊपर की ओर उठने लगते हैं। ऐसी दशा में वह खड़ा होकर स्वागत और प्रणाम करता है तो वे प्राण पुनः पूर्वावस्था में आ जाते हैं।

किसी भी वर्ण के पुरुष को परायी स्त्री से संसर्ग नहीं करना चाहिए। परस्त्री सेवन से मनुष्य की आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। इसके समान आयु को नष्ट करने वाला संसार में दूसरा कोई कार्य नहीं है। स्त्रियों के शरीर में जितने रोमकूप होते हैं उतने ही हजार वर्षों तक व्यभिचारी पुरुषों को नरक में रहना पड़ता है। रजस्वला स्त्री के साथ कभी बातचीत न करे।

अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि को स्त्री-समागम न करे। अपनी पत्नी के साथ भी दिन में तथा ऋतुकाल के अतिरिक्त समय में समागम न करे। इससे आयु की वृद्धि होती है। सभी पर्वों के समय ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। यदि पत्नी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय तथा उसे भी अपने निकट न बुलाये। शास्त्र की अवज्ञा करने से जीवन दुःखमय बनता है।

दूसरों की निंदा, बदनामी और चुगली न करें, औरों को नीचा न दिखाये। निंदा करना अधर्म बताया गया है, इसलिए दूसरों की और अपनी भी निंदा नहीं करनी चाहिए। क्रूरताभरी बात न बोले। जिसके कहने से दूसरों को उद्वेग होता हो, वह रूखाई से भरी हुई बात नरक में ले जाने वाली होती है, उसे कभी मुँह से न निकाले। बाणों से बिंधा हुआ फरसे से काटा हुआ वन पुनः अंकुरित हो जाता है, किंतु दुर्वचनरूपी शस्त्र से किया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता।

हीनांग(अंधे, काने आदि), अधिकांग(छाँगुर आदि), अनपढ़, निंदित, कुरुप, धनहीन और असत्यवादी मनुष्यों की खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए।

नास्तिकता, वेदों की निंदा, देवताओं के प्रति अनुचित आक्षेप, द्वेष, उद्दण्डता और कठोरता – इन दुर्गुणों का त्याग कर देना चाहिए।

मल-मूत्र त्यागने व रास्ता चलने के बाद तथा स्वाध्याय व भोजन करने से पहले पैर धो लेने चाहिए। भीगे पैर भोजन तो करे, शयन न करे। भीगे पैर भोजन करने वाला मनुष्य लम्बे समय तक जीवन धारण करता है।

परोसे हुए अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। मौन होकर एकाग्रचित्त से भोजन करना चाहिए। भोजनकाल में यह अन्न पचेगा या नहीं, इस प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। भोजन के बाद मन-ही-मन अग्नि का ध्यान करना चाहिए। भोजन में दही नहीं, मट्ठा पीना चाहिए तथा एक हाथ से दाहिने पैर के अँगूठे पर जल छोड़ ले फिर जल से आँख, नाक, कान व नाभि का स्पर्श करे।

पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से दीर्घायु और उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से सत्य की प्राप्ति होती है। भूमि पर बैठकर ही भोजन करे, चलते-फिरते भोजन कभी न करे। किसी दूसरे के साथ एक पात्र में भोजन करना निषिद्ध है।

जिसको रजस्वला स्त्री ने छू दिया हो तथा जिसमें से सार निकाल लिया गया हो, ऐसा अन्न कदापि न खाय। जैसे – तिलों का तेल निकाल कर बनाया हुआ गजक, क्रीम निकाला हुआ दूध, रोगन(तेल) निकाला हुआ बादाम(अमेरिकन बादाम) आदि।

किसी अपवित्र मनुष्य के निकट या सत्पुरुषों के सामने बैठकर भोजन न करे। सावधानी के साथ केवल सवेरे और शाम को ही भोजन करे, बीच में कुछ भी खाना उचित नहीं है। भोजन के समय मौन रहना और  आसन पर बैठना उचित है। निषिद्ध पदार्थ न खाये।

रात्रि के समय खूब डटकर भोजन न करें, दिन में भी उचित मात्रा में सेवन करे। तिल की चिक्की, गजक और तिल के बने पदार्थ भारी होते हैं। इनको पचाने में जीवनशक्ति अधिक खर्च होती है इसलिए इनका सेवन स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है।

जूठे मुँह पढ़ना-पढ़ाना, शयन करना, मस्तक का स्पर्श करना कदापि उचित नहीं है।

यमराज कहते हैं- '' जो मनुष्य जूठे मुँह उठकर दौड़ता और स्वाध्याय करता है, मैं उसकी आयु नष्ट कर देता हूँ। उसकी संतानों को भी उससे छीन लेता हूँ। जो संध्या आदि अनध्याय के समय भी अध्ययन करता है उसके वैदिक ज्ञान और आयु का नाश हो जाता है।" भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र इन त्रिविध तेजों की कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिए।

मलिन दर्पम में मुँह न देखे। उत्तर व पश्चिम की ओर सिर करके कभी न सोये, पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर ही सिर करके सोये।

नास्तिक मनुष्यों के साथ कोई प्रतिज्ञा न करे। आसन को पैर से खींचकर या फटे हुए आसन पर न बैठे। रात्रि में स्नान न करे। स्नान के पश्चात तेल आदि की मालिश न करे। भीगे कपड़े न पहने।

गुरु के साथ कभी हठ नहीं ठानना चाहिए। गुरु प्रतिकूल बर्ताव करते हों तो भी उनके प्रति अच्छा बर्ताव करना ही उचित है। गुरु की निंदा मनुष्यों की आयु नष्ट कर देती है। महात्माओं की निंदा से मनुष्य का अकल्याण होता है।

सिर के बाल पकड़कर खींचना और मस्तक पर प्रहार करना वर्जित है। दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलाये।

बारंबार मस्तक पर पानी न डाले। सिर पर तेल लगाने के बाद उसी हाथ से दूसरे अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए। दूसरे के पहने हुए कपड़े, जूते आदि न पहने।

शयन, भ्रमण तथा पूजा के लिए अलग-अलग वस्त्र रखें। सोने की माला कभी भी पहनने से अशुद्ध नहीं होती।

संध्याकाल में नींद, स्नान, अध्ययन और भोजन करना निषिद्ध है। पूर्व या उत्तर की मुँह करके हजामत बनवानी चाहिए। इससे आयु की वृद्धि होती है। हजामत बनवाकर बिना नहाय रहना आयु की हानि करने वाला है।

जिसके गोत्र और प्रवर अपने ही समान हो तथा जो नाना के कुल में उत्पन्न हुई हो, जिसके कुल का पता न हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए। अपने से श्रेष्ठ या समान कुल में विवाह करना चाहिए।

तुम सदा उद्योगी बने रहो, क्योंकि उद्योगी मनुष्य ही सुखी और उन्नतशील होता है। प्रतिदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओं के जीवनचरित्र का श्रवण करना चाहिए। इन सब बातों का पालन करने से मनुष्य दीर्घजीवी होता है।

पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने सब वर्ण के लोगों पर दया करके यह उपदेश दिया था। यह यश, आयु और स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला तथा परम कल्याण का आधार है।

टॉन्सिल्स



यह रोग बालक, युवा, प्रौढ़ – सभी को होता है किंतु बालकों में विशेष रूप से पाया जाता है। जिन बालकों की कफ-प्रकृति होती है, उनमें यह रोग देखने में आता है। गला कफ का स्थान होता है। बच्चों को मीठे पदार्थ और फल ज्यादा खिलाने से, बच्चों के अधिक सोने से(विशेषकर दिन में) उनके गले में कफ एकत्रित होकर गलतुण्डिका शोथ(टॉन्सिल्स की सूजन) रोग हो जाता है। इससे गले में खाँसी, खुजली एवं दर्द के साथ-साथ सर्दी एवं ज्वर रहता है, जिससे बालकों को खाने-पीने में व नींद में तकलीफ होती है।

बार-बार गलतुण्डिका शोथ होने से शल्यचिकित्सक(सर्जन) तुरंत शल्यक्रिया करने की सलाह देते हैं। अगर यह औषधि से शल्यक्रिया से गलतुण्डिका शोथ दूर होता है, लेकिन उसके कारण दूर नहीं होते। उसके कारण के दूर नहीं होने से छोटी-मोटी तकलीफें मिटती नहीं, बल्कि बढ़ती रहती हैं।

40 वर्ष पहले एक विख्यात डॉक्टर ने रीडर्स डायजेस्ट में एक लेख लिखा था जिसमें गलतुण्डिका शोथ की शल्यक्रिया करवाने को मना किया था।

बालकों ने गलतुण्डिका शोथ की शल्यक्रिया करवाना – यह माँ-बाप के लिए महापाप है क्योंकि ऐसा करने से बालकों की जीवनशक्ति का ह्रास होता है।

निसर्गोपचारक श्री धर्मचन्द्र सरावगी ने लिखा हैः 'मैंने टॉन्सिल्स के सैंकड़ों रोगियों को बिना शल्यक्रिया के ठीक होते देखा है।'

कुछ वर्ष पहले इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया के पुरुषों ने अनुभव किया कि टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया से पुरुषत्व में कमी आ जाती है और स्त्रीत्व के कुछ लक्षण उभरने लगते हैं।

इटालियन कान्सोलेन्ट, मुंबई से प्रकाशित इटालियन कल्चर नामक पत्रिका के अंक नं. 1,2,3 (सन् 1955) में भी लिखा थाः 'बचपन में टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया करानेवालों के पुरुषत्व में कमी आ जाती है। बाद में डॉ. नोसेन्ट और गाइडो कीलोरोली ने 1973 में एक कमेटी की स्थापना कर इस पर गहन शोधकार्य किया। 10 विद्वानों ने ग्रेट ब्रिटेन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के लाखों पुरुषों पर परीक्षण करके उपर्युक्त परिणाम पाया तथा इस खतरे को लोगों के सामने रखा।

शोध का परिणाम जब लोगों को जानने को मिला तो उन्हें आश्चर्य हुआ ! टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया से सदा थकान महसूस होती है तथा पुरुषत्व में कमी आने के कारण जातीय सुख में भी कमी हो जाती है और बार-बार बीमारी होती रहती है। जिन-जिन जवानों के टॉन्सिल्स की शल्यक्रिया हुई थी, वे बंदूक चलाने में कमजोर थे, ऐसा युद्ध के समय जानने में आया।

जिन बालकों के टॉन्सिल्स बढ़े हों ऐसे बालकों को बर्फ का गोला, कुल्फी, आइसक्रीम, बर्फ का पानी, फ्रिज का पानी, चीनी, गुड़, दही, केला, टमाटर, उड़द, ठंडा पानी, खट्टे-मीठे पदार्थ, फल, मिठाई, पिपरमिंट, बिस्कुट, चॉकलेट ये सब चीजें खाने को न दें। जो आहार ठंडा, चिकना, भारी, मीठा, खट्टा और बासी हो, वह उन्हें न दें।

दूध भी थोड़ा सा और वह भी डालकर दें। पानी उबला हुआ पिलायें।

उपचार

टान्सिल्स के उपचार के लिए हल्दी सर्वश्रेष्ठ औषधि है। इसका ताजा चूर्ण टॉन्सिल्स पर दबायें, गरम पानी से कुल्ले करवायें और गले के बाहरी भाग पर इसका लेप करें तथा इसका आधा-आधा ग्राम चूर्ण शहद में मिलाकर बार-बार चटाते रहें।

दालचीनी के आधे ग्राम से 2 ग्राम महीन पाऊडर को 20 से 30 ग्राम शहद में मिलाकर चटायें।

टॉन्सिल्स के रोगी को अगर कब्ज हो तो उसे हरड़ दे। मुलहठी चबाने को दें। 8 से 20 गोली खदिरादिवटी या यष्टिमधु धनवटी या लवंगादिवटी चबाने को दें।

कांचनार गूगल का 1 से 2 ग्राम चूर्ण शहद के साथ चटायें।

कफकेतु रस या त्रिभुवन कीर्तिरस या लक्ष्मीविलास रस(नारदीय) 1 से 2 गोली देवें।

आधे से 2 चम्मच अदरक का रस शहद में मिलाकर देवें।

त्रिफला या रीठा या नमक या फिटकरी के पानी से बार-बार कुल्ले करवायें।

सावधानी

गले में मफलर या पट्टी लपेटकर रखनी चाहिए।