Monday, April 25, 2016

पीड़ित व्यक्ति को स्ट्रेचर पर अस्पताल पहुंचान


TAKING VICTIM TO THE HOSPITAL ON A STRETCHER

          अक्सर जब कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना आदि में घायल हो जाता है तो घायल व्यक्ति को दुर्घटना स्थल से ले जाने के लिए सबसे पहले एक स्ट्रेचर की जरूरत पड़ती है। स्ट्रेचर पर ही घायल व्यक्ति को सीधा या आरामदायक स्थिति में लिटाकर अस्पताल ले जाया जा सकता है। अस्पताल आदि में तो स्ट्रेचर हर समय उपलब्ध ही होती है लेकिन दुर्घटना स्थल पर स्ट्रेचर मिलना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इसके लिए आसपास पड़े हुए सामान का प्रयोग करके ही स्ट्रेचर तैयार की जा सकती है। 

स्ट्रेचर बनाने की विधि-

•सबसे पहले लगभग दो या ढाई मीटर लंबे, गोल और मजबूत दो डंडे ले लें।
•फिर उन डंडों पर लपेटने के लिए ढाई से डेढ़ मीटर मजबूत कैनवस के टुकड़ों को ले लें।
•कैनवस के दोनों लंबे किनारों को इस प्रकार सिल लें कि डंडों को उनमें पिरोया जा सके।
•कैनवस को तना हुआ रखने के लिए उसके चौड़े किनारों पर एक-एक आड़ा करके डंडा लगा दिया जाता है।
•स्ट्रेचर बनाते समय उसके डंडों के किनारों को घिस लिया जाता है ताकि उन्हे पकड़ने वाले व्यक्तियों के हाथ में वह चुभे नहीं।
•कैनवस के एक चौड़े किनारे पर तकिया रख सकते हैं लेकिन यह तकिया भूसा, तिनकों या छोटे-छोटे कपड़ों के टुकड़ों से भरा हुआ होना चाहिए, रूई से नहीं।
•इस तकिए का एक सिरा खुला रखना चाहिए ताकि पीड़ित व्यक्ति के सिर को आरामदायक स्थिति में रखने के लिए उसमें से भूसा, तिनके या छोटे-छोटे कपड़ों को निकाला या डाला जा सके।
कामचलाऊ स्ट्रेचर-

•इस प्रकार की स्ट्रेचर तैयार करने के लिए सबसे पहले दो मोटे और लगभग ढाई मीटर लंबे डंडे या बांस और एक मजबूत कंबल ले लें।
•फिर कंबल को फोल्ड करके उसके अंदर लंबाई की ओर एक डंडा घुसेड़ दें।
•इसके बाद दूसरे डंडे पर कंबल के दोनों सिरों को लपेट दें।
•अगर कंबल ज्यादा चौड़ा हो तो उसके एक सिरे को पहले डंडे की ओर ले आएं और उस पर लपेट दें।
•इस स्ट्रेचर पर पीड़ित व्यक्ति को आराम से लिटाकर अस्पताल ले जाया जा सकता है।
•एमरजैंसी पड़ने पर मोटा कंबल आदि न मिलने पर 2-3 कोटों या बास्केटों का प्रयोग करके भी कामचलाऊ स्ट्रेचर तैयार की जा सकती है।
•इसके लिए कोटों की बांहों को अंदर की ओर उल्ट लिया जाता है।
•फिर कोटों को बटन बंद करके उसकी बांहों में डंडे फंसा दिये जाते हैं।
नोट-

•बास्केट में बांहें नहीं होती इसलिए उसके बटन बंद करके उसकी बांहों के छेद में डंडे फंसाए जा सकते हैं।
•दो डंडों पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चौड़ी पट्टियां बांधकर भी कामचलाऊ स्ट्रेचर तैयार की जा सकती है।
•यदि स्ट्रेचर बनाने के लिए कंबल तो मिल जाए लेकिन डंडों का इंतजाम न हो पाए तो ऐसी स्थिति में पीड़ित को उठाकर अस्पताल ले जाया जा सकता है।
•इसके लिए पीड़ित व्यक्ति को कंबल के बीच में लिटा दें।
•फिर कंबल के लंबे किनारों को गोल करके पीड़ित व्यक्ति के पास तक ले जाएं।
•अब पीड़ित व्यक्ति के दोनों ओर 2-2 व्यक्ति खड़े हो जाए और झुककर कंबल के मुड़े हुए किनारों को उठा लें।          
•स्ट्रेचर या कंबल आदि न मिलने पर पीड़ित व्यक्ति को लकड़ी के चौड़े पटरे, लकड़ी के दरवाजे या कार आदि की सीट पर लिटाकर ले जाया जा सकता है। पटरे या लकड़ी के दरवाजे पर पीड़ित व्यक्ति को लिटाने से पहले उस पर भूसा या घास आदि बिछा देने चाहिए।
•ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से बेहोशी की अवस्था में हो या रीढ़, छाती, सिर आदि पर लगी गहरी चोट के कारण वह न तो उठ सकता हो और न ही बैठ सकता हो या न ही करवट ही ले सकता हो, उसके अस्पताल तक ले जाने के लिए प्राथमिक उपचारकर्ता को सही तरीका इस्तेमाल करना चाहिए, अन्यथा पीड़ित व्यक्ति को हानि हो सकती है। इस काम के लिए प्राथमिक उपचारकर्त्ता को अपने साथ और भी तीन व्यक्तियों की जरूरत पड़ती है। इसके लिए उन व्यक्तियों को पीड़ित को उठाने का तरीका अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए और प्राथमिक उपचारकर्त्ता के आदेशानुसार ही काम करना चाहिए।
•इसके लिए तीन व्यक्ति पीड़ित के उस ओर खड़े हो जाएं जिस ओर उसके चोट आदि न लगी हो।
•फिर वे पीड़ित व्यक्ति के पैरों के पास अपने घुटनों पर झुकें और एक साथ उसे धीरे से, थोड़ा सा दूसरी ओर खिसका दें।
•तीनों व्यक्ति पीड़ित व्यक्ति के शरीर के नीचे अपने-अपने हाथ डालकर उसे थोड़ा सा ऊपर उठा लें।
•इसी दौरान चौथा व्यक्ति पीड़ित व्यक्ति के नीचे स्ट्रेचर सरका दें।
•अब तीनों व्यक्ति पीड़ित व्यक्ति को आराम से स्ट्रेचर पर लिटा दें।
•अस्पताल पहुंचने पर पीड़ित व्यक्ति को स्ट्रेचर पर से उतारने के समय इसी तरीके को उल्टे क्रम में दोहराया जा सकता है।
•पहले स्ट्रेचर को बहुत ही सावधानी से नीचे रखें।
•फिर तीन आदमी रोगी के एक ओर खड़े होकर उसको एकसाथ अपने घुटनों तक उठा लें।
•इसके बाद रोगी को छाती की ऊंचाई तक उठाकर एंबुलैंस या बिस्तर पर लिटा सकते हैं।
          स्ट्रेचर पर हमेशा 1-2 कंबल रहते ही हैं और हर कंबल को इस प्रकार रखा जाता है कि उसकी दो तहें स्ट्रेचर पर बिछी रहती है और उसका मुक्त सिरा नीचे की ओर लटका रहता है। रोगी को स्ट्रेचर पर लिटाते समय दोनों कंबलों की दो-दो तहें नीचे लटकी रहती है। इन लटकते सिरों से बाद में रोगी को ढका भी जा सकता है। ज्यादा हालातों में रोगी को गरम रखना जरूरी होता है। कंबलों को दो तहें उसे गरम रखने के लिए काफी होती है।

          अगर स्ट्रेचर पर कंबल न बिछे हो तो रोगी को स्ट्रेचर पर ऐसे ही लिटाया जा सकता है। रोगी को ढकने के लिए तौलिए आदि किसी भी कपड़े का प्रयोग किया जा सकता है।

          कई बार प्राथमिक उपचारकर्ता को, दुर्घटनास्थल पर मदद के लिए तीन-चार व्यक्ति नहीं मिल पाते। ऐसी स्थिति में एक ही व्यक्ति की मदद से पीड़ित को आसानी से कंबल पर लिटाया और उठाकर अस्पताल तक ले जाया जा सकता है। पहले कंबल के लंबे सिरे को रोल करके एकदम रोगी के पास तक ले जाया जाता है। फिर रोगी को थोड़ा सा खिसकाकर कंबल को उसके नीचे से निकालकर उसे उल्टी ओर कंबल पर करवट दिला दी जाती है।

          अगर ऐसा लगता है कि पीड़ित व्यक्ति की रीढ़ पर चोट आई है तो ऐसी स्थिति में उसे छाती के बल उल्टा अर्थात चेहरा नीचे की ओर करके लिटाएं।

          ज्यादातर रोगियों को चित्त अर्थात पीठ के बल सीधा लिटाया जाता है और इसी स्थिति में स्ट्रेचर पर लिटाकर अस्पताल ले जाया जाता है। स्ट्रेचर पर ले जाते समय रोगी की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि चोट उसके शरीर के किस अंग में लगी है।

          जिन रोगियों के केवल ऊपरी अंगों जैसे- सिर, छाती, पेट, भुजा इत्यादि में चोट लगी हो उन्हें लिटाने की बजाय बैठाना अधिक आरामदेह रहता है। जिन रोगियों की टांग टूट गई हो, स्ट्रेचर पर ले जाते समय उनकी टांग पर तकिया बांधना अच्छा रहता है। तकिया, तौलिया इत्यादि उपलब्ध न होने पर टूटी टांग को स्वस्थ टांग से बांध दिया जाता है।

          गरदन पर चोट लगी होने पर पीड़ित को कठोर सतह पर, पीठ के बल सीधा लिटाकर उसकी गरदन के पीछे छोटा-सा तकिया लगा दें और दोनों ओर रेते के बोरे रख दें।

          बेहोश व्यक्तियों को स्ट्रेचर पर अधलेटी अवस्था में लिटाएं। इससे उनकी नाक या मुंह से निकलने वाला रक्त या उल्टी बराबर बाहर निकलती रहेगी; सांस नली में फंसेगी नहीं। बेहोश व्यक्ति की स्थिति उसे लगी दूसरी चोटों पर भी निर्भर होती है।

          जिस पीड़ित व्यक्ति को छाती में चोट लगी हो उसे उसी स्थिति में स्ट्रेचर पर लिटाना चाहिए, जिसमें वह दुर्घटनास्थल पर पड़ा हुआ था। दुर्घटना के बाद अगर वह पीठ के बल लेटा हुआ हो, तो उसे पीठ के बल लिटाकर ही अस्पताल ले जाएं।

          जिस व्यक्ति की रीढ़ में चोट आई हो अथवा रीढ़ की हड्डी टूट गई हो उसे अस्पताल ले जाते समय कम से कम हिलाएं-डुलाएं और झटके बिल्कुल न लगने दें।

         पीड़ित को ले जाते समय स्ट्रेचर के उस भाग को आगे रखें जिस ओर पीड़ित के पैर हैं। ऊंचाई या ढलान पर स्ट्रेचर को घुमाया जा सकता है। सामान्य नियम के अनुसार पीड़ित के निचले अंगों में चोट लगने पर, स्ट्रेचर को ढलान पर ले जाते समय पीड़ित का सिर आगे की ओर रखा जाता है। ऊंचाई पर चढ़ते समय पीड़ित का सिर वाला भाग आगे रखते हैं। एंबुलेंस पर लादते समय भी पीड़ित के सिरवाले सिरे को पहले चढ़ाया जाता है।

          यदि पीड़ित व्यक्ति किसी खान, गड्ढ़े या संकरी जगह पर पड़ा हुआ हो, तो उसे उठाकर बाहर निकालने के लिए निम्नलिखित तरीकों का उपयोग किया जा सकता है।

उठाने वाले व्यक्ति दो होने पर- दोनों व्यक्ति, पीड़ित व्यक्ति की ओर मुंह करके खड़े हो जाएं। एक उसकी बाईं ओर, दूसरा दाहिनी ओर। पहला व्यक्ति पीड़ित व्यक्ति के सिर के पास झुककर अपनी अग्रभुजाएं उसके कंधों के नीचे रखे और दूसरा झुककर अपनी बाईं बांह उसकी जांघों के नीचे और दाहिनी बांह उसके घुटनों के नीचे रखे। फिर दोनों व्यक्ति झुके रहकर ही एक साथ आगे बढ़े। बढ़ते समय दोनों व्यक्ति एक साथ अपने-अपने बाएं पैर आगे बढ़ाएं और छोटे-छोटे कदम बढ़ाएं। पीड़ित व्यक्ति को जमीन से ज्यादा ऊपर नहीं उठाएं। स्ट्रेचर के पास आने पर दोनों व्यक्ति अपने एक-एक पैर स्ट्रेचर के एक-एक ओर कर लें। पीड़ित व्यक्ति को स्ट्रेचर के बिल्कुल ऊपर लाकर धीरे से, सावधानीपूर्वक, स्ट्रेचर पर रख दें।

उठाने वाले व्यक्ति तीन होने पर- स्ट्रेचर को पीड़ित के पास सिर की ओर रख दें। एक व्यक्ति पीड़ित के एक ओर खड़ा हो जाए और दूसरा दूसरी ओर। उनके मुंह आमने-सामने होने चाहिए। पहला व्यक्ति पीड़ित के पैरों के पास अपने बाएं घुटने को जमीन पर टेककर और दाहिने घुटने को मोड़कर बैठ जाए। वह अपने दोनों हाथ पीड़ित के घुटनों के नीचे रख दें।

          दूसरा और तीसरा व्यक्ति पीड़ित के सिर के पास पहले व्यक्ति की तरह ही, अपने बाएं घुटने को टेककर और दाहिने घुटनों को मोड़कर बैठ जाएं। वे अपने हाथों को पीड़ित के सिर और नितंबों के नीचे से निकालकर अपने हाथों को आपस में पकड़ लें।

          फिर तीनों धीरे से एक साथ उठ खड़े हों। वे एक साथ स्ट्रेचर की ओर धीरे-धीरे चलें। उस समय यह ध्यान रखें कि पीड़ित ज्यादा हिले-डुले नहीं और उसकी स्थिति लगातार वैसी ही बनी रहे। स्ट्रेचर के पास पहुंचने पर पीड़ित को धीरे से उस पर लिटा दें। 

          जब दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति किसी ऊंचें स्थान या ऊपरी मंजिल पर हो तो उसे प्राथमिक उपचार के बाद नीचे उतारतना कठिन कार्य होता है। यह कार्य उस समय और भी कठिन हो जाता है जब पीड़ित व्यक्ति बेहोश होता है।

          बेहोश व्यक्ति को ऊपरी मंजिल से उतारने के लिए चारपाई को उल्टा करके (पाए ऊपर करके) भी इस्तेमाल किया जा सकता है। चारपाई पर कंबल आदि बिछाकर बेहोश व्यक्ति को लिटा दें। उसे 6- 7 स्थानों पर चौड़ी पट्टियों से चारपाई के साथ बांध दें। चारपाई के दोनों लंबे किनारों को दोनों सिरों के पास मजबूत रस्सी से बांध दें और चारों रस्सियों को ऊपर की ओर इकट्ठा करके बांध दें। इससे यह पूरी व्यवस्था रस्सियों के झूले जैसी बन जाएगी। अब पीड़ित को रस्सी की मदद से आसानी से नीचे उतारा जा सकता है।

          गहरे गढ्ढे में पड़े बेहोश व्यक्ति को भी इसी तरीके से ऊपर लाया जा सकता है। इसके लिए बेहोश व्यक्ति को ऊपर की ओर खींचना होता है।

विविध व्याधियां MISCELLANEOUS DISEASES



          ज्यादातर दुर्घटनाओं के बाद आपातकालीन अर्थात एमरजैंसी स्थिति पैदा हो जाती है। एमरजैंसी स्थिति शरीर में अचानक दर्द उठ जाने या किसी दवाई के उल्टे प्रभाव से या एलर्जी से भी पैदा हो सकती है। अपेंडिसाइटिस, अचानक उठने वाला दर्द या गुर्दे में पथरी के कारण होने वाली असहनीय पीड़ा ऐसी ही परिस्थितियों के उदाहरण हैं। ऐसी स्थितियों में यह जरूरी होता है कि डॉक्टर के जाने तक पीड़ित व्यक्ति की हालत और न बिगड़ने पाए। इसलिए पीड़ित को समुचित प्राथमिक उपचार की जरूरत होती है।

नीचे कुछ ऐसे प्राथमिक उपचारों के बारे में बताया जा रहा हैं जो एमरजैंसी स्थितियों में किए जाने चाहिए-

अपेंडिसाइटिस- अक्सर अपेंडिक्स में उठने वाले दर्द के लक्षण असली दर्द उठने से कुछ दिन पहले प्रकट होने लगते हैं। यह लक्षण पीड़ित में अजीर्ण और कब्ज के रूप में प्रकट होते हैं। लेकिन आमतौर से इन लक्षणों को आने वाले रोग के पूर्व-संकेत न समझकर स्वयं रोग समझ लिया जाता है। पीड़ित अपेंडिसाइटिस की चिकित्सा के लिए कोई कदम नहीं उठाता और न ही शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार होता है। इसी कारण से वह अपेंडिसाइटिस को अचानक से पैदा होने वाला रोग समझ लेता है।

          अपेंडिसाइटिस में पीड़ित के पेट के निचले, दाहिने भाग में तेज दर्द होती है। इसके साथ ही उसे उल्टी और हल्का बुखार भी हो सकता है। ऐसी स्थिति पैदा होते ही तुरंत डॉक्टर को बुला लें। डॉक्टर के आने तक प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति को पीड़ित की हालत को बिगड़ने से बचाने के लिए उसके शरीर के दर्द वाले स्थान पर आइसबैग (बर्फ की थैली) रखनी चाहिए।

          ऐसे पीड़ित को गर्मी से बचाना चाहिए और उसे खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं देना चाहिए।

          ऐसे पीड़ित को किसी भी परिस्थिति में जुलाब नहीं देना चाहिए।

सांस में रुकावट- सांस में रुकावट केवल दुर्घटनाओं के फलस्वरूप ही पैदा नहीं होती बल्कि हृदय रोग, दमा, मिर्गी, टिटेनस, अधिक नींद की गोलियां खाना आदि कारणों से भी सांस में रुकावट हो सकती है। इन कारणों से फेफड़ों तक जरूरत अनुसार ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती।

          पानी में डूबते हुए व्यक्ति की श्वासनली में अक्सर पानी भर जाने से उसकी सांस में रुकावट आ जाती है। ज्यादा गर्म पानी से गले की भीतरी मांसपेशियां सूज जाने के कारण भी सांस की नली में रुकावट आ जाती है। गर्दन में रस्सी, कपड़े आदि को कसकर बांधने, गले को अंगुलियों से दबाने, शिशु के ऊपर भारी बोझा डालने या बेहोश व्यक्ति को छाती के बल तकिए पर लिटाने से भी सांस में रुकावट आ सकती है।

बिजली का झटका लगने, ऊंचाई से गिरने, खान में खुदाई करने, किसी वाहन से कुचल जाने आदि कारणों से भी सांस लेने में रुकावट पैदा हो सकती है। नकली दांतों के मसूड़ों से निकलकर आहार नली में फंस जाने पर भी सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

प्राथमिक उपचार- किसी भी कारण से सांस बंद हो जाने पर अगर जल्दी ही पीड़ित व्यक्ति को प्राथमिक उपचार न किया जाए तो उसकी हालत बिगड़ सकती है, वह बेहोश होने लगता है, मुंह से झाग निकलने लगते हैं और कभी-कभी उसे दौरे पड़ने लगते हैं। इसलिए सबसे पहले उसका प्राथमिक उपचार करना चाहिए।

          यदि किसी व्यक्ति की सांस रुक रही हो तो सबसे पहले उन कारणों को दूर करें जिनसे उसकी सांस रुक रही हो। फिर बेहोश व्यक्ति को पीठ के बल सीधा लेटा दें। जिन कारणों से व्यक्ति बेहोश हो रहा हो अगर उन्हे दूर करना संभव न हो तो बेहोश व्यक्ति को ही उठाकर उस स्थान से सुरक्षित स्थान पर ले जाएं जहां उसे स्वच्छ हवा मिल सके। फिर पीड़ित व्यक्ति को पीठ के बल लेटा दें और उसकी गर्दन के पीछे अपनी हथेली रखकर सिर को नीचे की ओर धीरे से दबाएं। 

          यदि पीड़ित व्यक्ति होश में हो तो उससे मुंह खोलने के लिए कहें लेकिन अगर वह बेहोश हो तो उसके जबड़े को पीछे से आगे की ओर दबाएं। ऐसा करने पर उसका मुंह खुल जाएगा फिर उसके मुंह में झांककर या अंगुली डालकर मालूम कर लें कि उसकी सांस की नली में भोजन का टुकड़ा, नकली दांत या कोई अन्य चीज तो नहीं फंसी या उल्टी हुई जीभ तो नहीं अटकी हुई है। यदि ऐसा हो तो उस अटकी हुई चीज को निकाल दें और जीभ उल्टी हुई हो तो उसे सीधा कर दें। ऐसा करने से अगर सांस रुकी हुई हो तो वह चलने लगती है। मुंह में अंगुली डालते समय ध्यान रखें कि बेहोशी की हालत में पीड़ित व्यक्ति आपकी अंगुली काट भी सकता है।

          यदि किसी बच्चे की सांस की नली में कोई चीज अटक रही हो तो बच्चे को पेट के बल लिटाकर उसका सिर नीचे की ओर करके उसकी पीठ पर हल्के-हल्के मुक्के से मारें। इससे सांस नली में अटकी हई चीज निकल जाएगी और उसकी सांस चलने लगेगी।

यदि सांस नली साफ करने के बाद भी सांस चालू न हो तो पीड़ित को निम्न प्रकार से कृत्रिम सांस दें-

•सांस बंद हो जाने पर पीड़ित व्यक्ति को पीठ के बल लेटाकर उसकी गर्दन के नीचे हाथ रखकर उसे ऊपर की ओर उठाएं। इससे उसका सिर पीछे की ओर झुक जाएगा और मुंह खुल जाएगा।
•इसके बाद अपने अंगूठे तथा तर्जनी अंगुली से पीड़ित व्यक्ति की नाक बंद करके अपने मुंह से उसे कृत्रिम सांस दें।
•यदि किसी बच्चे की सांस बंद हो गई हो तो सबसे पहले उसका सिर पीछे झुकाएं तथा पीठ के नीचे तकिया रखें और फिर सांस कृत्रिम सांस दें। कृत्रिम सांस देने पर पीड़ित बच्चे के फेफड़ें फूलते-सिकुड़ते हैं जिन्हे देखा जा सकता है। पीड़ित बच्चे को कृत्रिम सांस देने के बाद अपने मुंह को उसके मुंह से हटा लें। फिर गहरी सांस लेकर उसे दुबारा से कृत्रिम सांस दें। इस तरह पहली चार सांस जल्दी-जल्दी दें ताकि पीड़ित को ऑक्सीजन जल्दी मिल सके। यह क्रिया हर 5 सेकेंड में दोहराएं।
•मुंह अलग करने पर फेफड़ों से अशुद्ध वायु बाहर आ जाती है। यदि पीड़ित के मुंह से हवा बाहर निकलने की आवाज सुनाई नहीं दे तो उक्त क्रिया को फिर दोहराएं। बेहोश व्यक्ति के मुंह से भी सांस बाहर निकलने की आवाज आती है। ऐसा न होने पर समझ ले कि हवा रोगी के फेफड़ों में नहीं जा रही है। ऐसी स्थिति में पीड़ित के निचले जबड़े को आगे की ओर खींचकर उक्त क्रिया को फिर दोहराएं। .
•कृत्रिम सांस देने की क्रिया एक व्यस्क व्यक्ति को एक मिनट में 12 बार तथा बच्चों में प्रति मिनट 16 से 20 बार की दर से दोहराएं।
•अगर पीड़ित के जबड़े में चोट लगने या किसी और कारण से मुंह से उसे कृत्रिम सांस देना संभव न हो तो उसके मुंह को बंद करके अपना मुंह उसकी नाक पर रखकर सांस दें।
•नवजात शिशु तथा छोटे बच्चों का मुंह छोटा होता है इसलिए उनकी नाक और मुंह दोनों को अपने मुंह से ढककर उन्हे कृत्रिम सांस दें।
•बच्चे को सांस देते समय एक बात का ध्यान रखें कि अधिक तेज सांस न दें क्योंकि इससे उसके फेफड़े पर असर पड़ सकता है। बच्चों को कृत्रिम सांस देते समय अपना एक हाथ हल्के से उसके पेट पर रखें। ऐसा करने से फेफड़े जरूरत से अधिक नहीं फूल पाते।
•कृत्रिम सांस देने की क्रिया तब तक करते रहे जब तक पीड़ित व्यक्ति की सांस चलनी शुरू न हो जाए। ऐसी क्रिया से सामान्यतः 15 मिनट में सांस चलनी शुरु हो जाती है। लेकिन अगर पीड़ित की सांस फिर रुक जाए या उसकी सांस लेने की दर प्रति मिनट 12 से कम हो तो ऊपर बताई क्रिया को दुबारा दोहराएं तथा इस क्रिया को कोई डॉक्टरी सहायता मिलने तक करते रहें।
          कुछ लोगों का मानना है कि जो हवा हम मुंह से निकालते हैं वह दूषित होती है इसलिए मुंह से सांस देना सही नहीं है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि आपातकालीन स्थिति में ऐसा करना सही है और इससे किसी पीड़ित व्यक्ति की जान बच सकती है। जब हम सांस लेते हैं तो उसमें ऑक्सीजन की मात्रा 20 प्रतिशत और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा 0.03 प्रतिशत होती है परंतु जब सांस मुंह से बाहर निकालते हैं तो वायु में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग 16 प्रतिशत होती है और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा लगभग 4 प्रतिशत होती है।

          कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक होने के कारण शरीर से बाहर निकलने वाली वायु दूषित होती है। जिसे लेने से हमारा दम घुटने लगता है लेकिन जिस व्यक्ति के शरीर में ऑक्सीजन की बहुत कमी हो गई हो और उस कमी के कारण उसके शरीर की महत्वपूर्ण क्रियाएं रुकने लगी हों या बहुत अधिक गड़बड़ी हो सकती हो तो उसके लिए 16 प्रतिशत ऑक्सीजन वाली वायु ही काफी रहती है। ऐसा करने पर उसके शरीर की बंद क्रियाएं फिर चालू हो जाती है।

हृदय की धड़कन फिर शुरू करना- फेफड़ों का कार्य दूषित खून को शुद्ध करके हृदय तक पहुंचाना और हृदय का कार्य शुद्ध खून को विभिन्न अंगों तक पहुंचाना है। अगर हमारे शरीर के किसी अंग से दूषित खून न हट पाए और शुद्ध खून से उसकी पूर्ति निरंतर नहीं हो पाए तो वह अंग सही तरीके से काम नहीं कर पाता और उसमें ऐसी गड़बड़ी पैदा हो सकती है जो कितने ही उपचार के बाद भी ठीक नहीं हो पाती। अगर मस्तिष्क को लगातार 3 मिनट तक और हृदय को 7-8 मिनट तक शुद्ध खून न मिले तो उनमें ऐसी खराबी पैदा हो जाती है जिनके फलस्वरूप व्यक्ति दुबारा स्वस्थ हो जाने के बाद भी जीवनभर कई तरह के मानसिक एवं शारीरिक रोगों से पीड़ित रहता है। हमारा हृदय अनेक कारणों से अपना काम करना बंद कर देता है- हृदय पर गंभीर चोट लगने से, बिजली का जोरदार झटका लगने से तथा शरीर से बहुत अधिक मात्रा में खून निकल जाने से हृदय की धड़कन बाद हो जाती है।        

          हृदय की धड़कन रुक जाने या बहुत कम हो जाने के कारण नब्ज धीमी पड़ जाती है या उसका स्पंदन बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति का चेहरा नीला या पीला पड़ जाता है, उसकी आंखों के तारे फैल जाते हैं और वह अचेत हो जाता है। धड़कन को कुछ मिनटों में ही फिर चालू नहीं किया जाए तो पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

          हृदय के ऊपर हाथ रखकर उसकी धड़कन को महसूस किया जा सकता है। लेकिन उसको महसूस करने का सबसे सही अंग होता है कलाई। कलाई द्वारा नब्ज के धड़कने का पता बहुत ही आसानी से चल जाता है। लेकिन जब किसी कारण से हृदय की धड़कन धीमी हो जाती है तो कलाई पर नब्ज का स्पंदन महसूस नहीं हो पाता। इसलिए प्राथमिक उपचारकर्ता को इस बात की पुष्टि करने के लिए की पीड़ित व्यक्ति के हृदय की धड़कन चल रही है या नहीं, उसकी गर्दन के निचले हिस्से में बाईं ओर स्थित कैरोटिड धमनी या जांघ में स्थित फीमर धमनी की जांच करनी चाहिए। कैरोटिड धमनी का स्पंदन भी महसूस न होने पर प्राथमिक उपचारकर्त्ता को पीड़ित व्यक्ति के हृदय की धड़कन दुबारा चालू करने की कोशिश करनी चाहिए।

प्राथमिक उपचार करने के लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति को पीठ के बल लिटा दें। उसके सिर के नीचे कोई तकिया न रखें बल्कि उसके पैरों के नीचे कोई वस्तु रखकर पैरों को जमीन से 40-50 सेमी ऊपर उठा दें। ऐसा करने से खून का बहाव तेजी से पैरों से हृदय की ओर होने लगेगा। पैरों में लगभग डेढ़ लीटर खून होता है जो हृदय की धड़कन को दुबारा से चालू करने में बहुत सहायक हो सकता है।

          यदि इस क्रिया द्वारा हृदय की धड़कन शुरु न हो तो पीड़ित व्यक्ति को उपचार की जरूरत होती है। इसके लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति के शरीर में उसके हृदय की स्थिति का पता लगाएं। हृदय की सही स्थिति की जानकारी इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर हृदय के स्थान पर धोखे से किसी दूसरे अंग पर हृदय को चालू करने का प्राथमिक उपचार कर दिया जाए तो पीड़ित व्यक्ति को लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है। आमतौर पर सामान्य व्यक्ति को हृदय की वास्तविक स्थिति का आसानी से पता नहीं चल पाता। इसलिए सबसे पहले हृदय की स्थिति का पता लगाएं और फिर निम्न उपाय करें-

•प्राथमिक उपचार करने के लिए रोगी को पीठ के बल लिटाकर उसके हृदय वाले स्थान पर अपने दोनों हाथों की हथेलियों को एक-दूसरे के ऊपर रखें। दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसा लें।
•हथेली के निचले भाग से छाती को एक सेकेंड में एक बार दबाएं। छाती पर इतना दबाव डालें कि वह 1.5 से 5 सेंटीमीटर तक नीचे धंस जाए। छाती को दबाएं और तुरंत दबाव हटा लें, पर हथेलियों को उसी स्थान पर रहने दें। फिर लगभग एक सेकेंड बाद फिर दबाव डालें। इस प्रकार एक मिनट में लगभग 60 बार दबाव डालें लेकिन ध्यान रखें कि छाती 5 सेंटीमीटर से अधिक न दबें।
•दबाव डालते समय कोहनियों को बिल्कुल सीधा रखें उनमें जरा सा भी झुकाव न आने दें।
•यदि आप अकेले हों तो पीड़ित व्यक्ति को पहले एक बार सांस देने के बाद 5 बार हृदय पर दबाव डालें, फिर एक बार सांस देकर 5 बार दबाव डालें।
•यदि आप दो व्यक्ति हैं और प्राथमिक उपचार दे रहे हैं तो एक व्यक्ति पीड़ित को सांस दें और दूसरा व्यक्ति उसकी छाती पर हृदय के पास दबाव डालें। दोनों में अच्छा तालमेल रखकर उपचार दें। ध्यान रखें कि सांस देते समय हृदय पर दबाव न पड़ें।
•हर पांच मिनट के उपचार के बाद पीड़ित व्यक्ति की नाड़ी और सांस दोनों की जांच करते रहें।
•नाड़ी की गति स्वाभाविक होने तक दबाव डालने तथा सांस देने की क्रिया नियमित रूप से चालू रखें।
•5-6 साल के बच्चे की छाती पर एक ही हाथ का दबाव काफी होता है तथा हृदय पर दबाव डालने की गति प्रति मिनट 80 बार होनी चाहिए।
•शिशुओं की छाती पर दो अंगुलियों का दबाव काफी होता है। इनके दबाव डालने की गति प्रति मिनट 100 बार होनी चाहिए और छाती को लगभग 2 सेंटीमीटर तक ही दबाएं।
•वयस्क व्यक्ति के हृदय पर दबाव डालने के अंतराल में हाथ उसकी छाती से न हटाएं।
•छाती पर दबाव डालते समय बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत हैं क्योंकि ज्यादा जोर से दबाव देने से पीड़ित की पसलियां टूट सकती है।
•सांस देने तथा दबाव देने की क्रिया तब तक करते रहें जब तक पीड़ित व्यक्ति अस्पताल न पहुंच जाए। यह क्रियाएं आधे घंटे तक की जा सकती हैं।
•सांस देने और छाती पर दबाव देने की इस क्रिया को सही रूप से किया जाए तो हृदय की धड़कन फिर से शुरु हो जाती है और खून का बहाव लगभग 100 मिलीलीटर हो जाता है। इस क्रिया के द्वारा मस्तिष्क को मिलने वाले कुल खून की मात्रा में से 25 से 30 प्रतिशत मात्रा मिलने लगती है।
जानकारी- एक बात ध्यान रखें कि हृदय की धड़कन रुकने के साथ पीड़ित व्यक्ति की सांस भी रुक जाती है। ऐसी स्थिति में धड़कन शुरु करने के साथ-साथ सांस को शुरू करने की कोशिश भी करनी चाहिए।

पानी में डूबना- आमतौर पर बहुत से तैराक पानी के नीचे जाने से एकदम पहले गहरी सांस ले लेते हैं। ऐसा करने पर उनके शरीर में से कार्बन डाइऑक्साइड की काफी मात्रा बाहर निकल जाती है। सामान्य अवस्था में यह कार्बन डाइऑक्साइड उस व्यक्ति को लगातार सांस लेने के लिए बाध्य करती है। कार्बन डाइऑक्साइड की अधिक मात्रा शरीर से बाहर निकल जाने के कारण तैराक बार-बार सांस लेने की कोशिश नहीं करता और ऑक्सीजन की कमी के कारण बेहोश हो जाता है। एक बार बेहोश हो जाने के बाद वह अपनी शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता और पानी में डूब जाता है। 

          जल्दी-जल्दी डाइव लेने वाले व्यक्ति के साथ भी लगभग इसी प्रकार की क्रियाएं होती हैं। दो डाइवों के बीच के कम समय में वह कई बार गहरी सांस लेता है और निकालता है। इस प्रकार वह भी अपने शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड की काफी मात्रा बाहर निकाल देता है जिसके कारण उसकी सांस लेने की इच्छा नहीं होती। इसीलिए सांस लेने के लिए पानी से बाहर आने की बजाए वह पानी के भीतर ही रहता है और ऑक्सीजन की कमी होने के कारण बेहोश होकर डूब जाता है। पानी में डूबने का कारण चाहे कोई भी हो लेकिन इसके कारण डूबने वाले व्यक्ति की सांस रुक जरूर जाती है। पानी में डूबने वाले व्यक्ति को सांस की रुकावट को दूर करने के लिए निम्नलिखित प्राथमिक उपचार करने से लाभ मिलता है-

          सबसे पहले पानी में डूबने वाले व्यक्ति के मुंह की जांच करके देखें कि उसके मुंह में कोई चीज फंसी तो नहीं है। अगर उसके मुंह में कोई चीज फंसी हो तो सबसे पहले उसे बाहर निकाल दें। फिर तुरंत ही पीड़ित व्यक्ति को कृत्रिम सांस देना शुरू करें। इस क्रिया को उस समय भी किया जा सकता है जब पीड़ित व्यक्ति पानी में हो लेकिन इसके लिए पीड़ित व्यक्ति का मुंह पानी की सतह से ऊपर होना चाहिए। इस तरह पानी में ही सांस देते हुए पीड़ित व्यक्ति को पानी से बाहर निकाल लाएं और जमीन पर पेट के बल लिटा दें। जमीन पर लाने के बाद सांस देना बंद कर दें और पीड़ित व्यक्ति को पेट के बल लिटाकर उसके चेहरे को एक ओर कर दें। उसके हाथ को सिर से ऊपर की ओर करके पूरी तरह फैला दें। ऐसा करने पर उसके मुंह से पानी बाहर निकलने लगेगा।

नोट- शिशुओं और बच्चों के शरीर से पानी बाहर निकालने के उन्हे पैर से पकड़कर उल्टा भी लटकाया जा सकता है।

          फेफड़ों से पूरी तरह पानी बाहर निकालने के लिए पीड़ित व्यक्ति के पेट के भाग को थोड़ा ऊंचा उठा दें ताकि पेट का सारा पानी बाहर निकल जाए। जब पेट से पूरी तरह से पानी बाहर निकल जाए तो व्यक्ति को सीधा करके पीठ के बल सीधा लिटा दें। इसके बाद सांस देने की क्रिया शुरू करें। पीड़ित व्यक्ति को तब तक सांस देते रहें जब तक उसकी सांस फिर से शुरू न हो जाए। कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति को सामान्य अवस्था में आने में दो घंटे लग जाते हैं।

          यदि पीड़ित व्यक्ति का जबड़ा भिंच गया हो तो उसके होंठ अलग करके और उसका मुंह खोलकर दांतों के बीच से उसके मुंह में कृत्रिम सांस देने की कोशिश करें। समुद्र के खारे पानी में डूबने वाले व्यक्ति के शरीर में तरल पदार्थों की कमी हो जाती है जिसके कारण होश में आते ही वह पानी मांगता है। ऐसी स्थिति में उसे जितना पानी वह मांगे पिला देना चाहिए।

          इसके बाद उसके शरीर से सारे गीले कपड़े उतारकर उसे सूखे कपड़े पहना दें और ऊपर से गर्म कंबल आदि ओढा दें। पीड़ित व्यक्ति के सामान्य अवस्था में लौट आने पर भी उसे ज्यादा देर तक बैठने न दें। उसे चाय, कॉफी आदि पीने के लिए दिये जा सकते हैं। फिर पीड़ित व्यक्ति को स्ट्रेचर पर डालकर जल्दी से जल्दी अस्पताल ले जाएं।

सांसनली में कोई वस्तु फंस जाने पर- छोटे-छोटे बच्चों को हर चीज मुंह में डालने की आदत होती है। ऐसे में कई बार वह ऐसी चीजें मुंह में ले लेते हैं जो मुंह से उनके गले में अटक जाती है। इसके कारण उनकी सांसनली में रुकावट आ जाती है। कई बार खाना खाते समय वयस्कों की सांसनली में भी भोजन अटक जाता है जिससे उसमें रुकावट आ जाती है। सांसनली में रुकावट आने के बाद व्यक्ति बोल नहीं पाता है और सांस लेने की पूरी कोशिश करता है। ऐसा करने पर उसकी आंखें बाहर निकलने लगती है और पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण चेहरा नीला हो जाता है। यदि सांसनली पूरी तरह से बंद हो जाए तो उपचार न मिलने की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति कुछ ही देर में बेहोश हो जाता है। यहां तक की उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

          छोटे बच्चों के गले में अगर कुछ फंस जाता है तो उसे बाहर निकालने के लिए पीड़ित बच्चे को टांगों से पकड़कर उल्टा कर दें और उसकी पीठ पर 3-4 बार जोर-जोर से थपकी दें। अगर ऐसा करने पर भी उसके गले में फंसी वस्तु बाहर न निकले तो पीड़ित बच्चे को अपने घुटनों पर उल्टा लिटाकर उसका सिर नीचे की ओर लटका दें। अब ऊपर से उसके कंधों के बीच जोर से थपकी दें। यदि ऐसा करने पर भी फंसी वस्तु बाहर न आए तो उसके गले में दो अंगुलियां डालकर उसे उल्टी करवा दें।

अगर किसी वयस्क व्यक्ति की सांसनली में कोई ग्रास आदि फंसने से उसकी सांस रुक जाती है तो उसको निकालने के लिए निम्नलिखित प्राथमिक उपचार करने से लाभ मिलता है- 

          अगर पीड़ित व्यक्ति लेटी हुई अवस्था में हो तो सबसे पहले उसे पीठ के बल सीधा करके लिटा दें। फिर उसके पैरों की तरफ मुंह करके खड़े हो जाएं और उसकी टांगों के निकट घुटनों के बल इस प्रकार बैठ जाएं कि आपका एक घुटना उसकी टांगों के एक ओर हो और दूसरा दूसरी ओर रहे। अब पीड़ित व्यक्ति के पेट पर नाभि और पसली के बीच अपने एक हाथ की हथेली रखें। फिर उसके ऊपर दूसरी हथेली रखें। अब अपनी हथेलियों को दबाकर ऊपर की ओर तेजी से झटका दें। झटके देने के बाद एक-दो सेकेंड के लिए दबाव हटा लें और फिर झटका दें। ऐसा तब तक करते रहें जब तक उसके गले में फंसी हुई वस्तु बाहर नहीं निकल जाती है।

          इन विधियों द्वारा प्राथमिक उपचार करने पर गले में फंसी वस्तु इसलिए बाहर निकल आती है कि जब सांस रुकने पर भी हमारे फेफड़ों में कुछ हवा होती है। इन क्रियाओं को करने पर वह झटके के साथ बाहर निकलती है और अपने साथ गले में अटकी वस्तु को भी मुंह में धकेल देती है।

          इस क्रिया को करने पर पीड़ित व्यक्ति को उल्टी भी आ सकती है। ऐसा होने पर उसका चेहरा एक ओर झुकाकर उल्टी करा दें।

          वयस्क व्यक्ति की सांसनली में फंसी वस्तु निकल जाने के बाद उसे सांस लेने में कठिनाई महसूस हो सकती है। इसलिए इसके तुरंत बाद उसे कृत्रिम सांस देने की तैयारी करें।

कार्बन मोनोऑक्साइड की कमी से सांस में रुकावट- सर्दी के मौसम में अक्सर लोग ठंड से बचने के लिए कमरे में कोयले की अंगीठी जलाकर दरवाजे और खिड़कियां बंद करके सो जाते हैं जो बहुत ही गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसा करने से सांस लेने में परेशानी होने लगती है और कुछ समय में दम घुटकर कमरा बंद करके सोने वाले व्यक्तियों की मृत्यु भी हो सकती है।

          ऐसी स्थिति अक्सर कार्बन मोनोऑक्साइड नामक जहरीली गैस के कारण पैदा होती हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड गैस मोटर साईकिल, कार, ट्रक, स्कूटर आदि से निकलने वाली एग्जॉस्ट गैसों में मौजूद रहती है। यह गैस कोयले, लकड़ी आदि ज्वलनशील वस्तुओं के जलने के कारण पैदा होती है। इसके अलावा यह गैस कोयले की खानों में भी पैदा हो जाती है।   यह गैस सांस के साथ शरीर के अंदर जाकर घबराहट पैदा नहीं करती। इसीलिए सोते हुए व्यक्ति को इसकी उपस्थिति का पता नहीं चलता। ऑक्सीजन की तुलना में यह गैस हमारे लाल रक्तकणों के हीमेग्लोबिन के साथ तेजी से काफी ज्यादा मात्रा में मिल जाती है। ऐसा होने से हीमोग्लोबिन को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिसके कारण पैदा होने वाली स्थिति किसी गंभीर दुर्घटना की सूचक होती है।          

          हवा से हल्की गैस होने के कारण कार्बन मोनोऑक्साइड जल्दी ही ऊपर उठ जाती है। लेकिन जिस स्थान पर यह गैस निरंतर पैदा होती रहती है वहां कभी-कभी आपातकालीन स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसा होने पर सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति को उस स्थान से दूर ले जाना बहुत जरूरी होता है। इस दौरान सबसे जरूरी है कि प्राथमिक उपचारकर्त्ता स्वयं 2-3 बार गहरी सांस लें और जितनी देर संभव हो सके सांस को रोककर रखें। इसके बाद उसे रेंगते हुए कार्बन मोनोऑक्साइड के वातावरण में घुसना चाहिए। वायु से हल्की होने के कारण फर्श के निकट इस गैस की सांद्रता अपेक्षाकृत कम होती है। पीड़ित व्यक्ति को फर्श के निकट रखते हुए जल्दी से जल्दी खुली हवा में ले जाएं। यदि पीड़ित व्यक्ति को उस कमरे से बाहर निकालना संभव न हो सके तो सभी खिड़कियां और दरवाजे खोल दें ताकि कमरे में भरी हुई गैस बाहर निकल जाए।

          खुली हवा में बाहर ले जाने के बाद तुरंत ही पीड़ित व्यक्ति सारे कपड़े ढीले कर दें और उसे कृत्रिम सांस देना शुरू करें।

        ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को शुद्ध ऑक्सीजन देना अधिक ज्यादा अच्छा रहता है परंतु इसकी व्यवस्था सिर्फ बड़े अस्पतालों में ही होती है। इसलिए पीड़ित व्यक्ति को जल्दी से जल्दी अस्पताल ले जाएं।

कार्बन डाइऑक्साइड- धुएं या कार्बन डाइऑक्साइड या दूसरी जहरीली गैसों वाले वातावरण में फंसे व्यक्ति का दम घुटने पर प्राथमिक उपचार देने से पहले उसे भी जल्दी से जल्दी उस वातावरण से बाहर निकालना जरूरी होता है। लेकिन ऐसा करने से पहले प्राथमिक उपचारकर्त्ता लिए कुछ सावधानियां बरतनी जरूर है जैसे-

•धुएं से भरे कमरे में घुसने से पहले उसे अपना मुंह और नाक गीले तौलिए से ढक लेना चाहिए।
•कार्बन डाइऑक्साइड से भरे कमरे में घुसने से पहले उस कमरे के सारे दरवाजे और खिड़कियां खोलने की कोशिश करनी चाहिए।
•दो-तीन बार गहरी सांस लेकर जितनी देर तक संभव हो सके सांस रोके रखना चाहिए।
•कार्बन डाइऑक्साइड हवा से भारी होती है और वह फर्श के निकट ही जमा हो जाती है। इसलिए इस गैस से भरे कमरे में झुकें नहीं बल्कि खड़े होकर ही अपनी कार्यवाही जारी रखें।

ड्रैसिंग और पट्टी DRESSING AND BANDAGE



          किसी भी तरह के घाव का उपचार करने में ड्रैसिंग का बहुत महत्व माना जाता है। घाव की ड्रैसिंग कर देने से उसमें संक्रमण होने की आशंका कम हो जाती है और उससे होने वाला रक्तस्राव नियंत्रित हो जाता है। ड्रैसिंग करने से घाव के और अधिक गहरा होने का खतरा कम हो जाता है तथा घाव जल्दी भर भी जाता है।

          उच्च कोटि की ड्रैसिंग का कीटाणुओं से मुक्त होना बहुत जरूरी है। अगर ड्रैसिंग में कीटाणु होंगे तो संक्रमण फैलने के अवसर अधिक बढ़ सकते हैं। ड्रैसिंग में रंध्र या छिद्र होने चाहिए, जिनसे घाव से निकलने वाले स्राव तथा पसीना आदि बाहर निकल सके।

          बाजार में ऐसी कीटाणु मुक्त ड्रैसिंग मिलती हैं जिसे आसानी से घाव पर चिपकाया जा सकता है। इसमें सूती कपड़े का अवशोषक (तरल पदार्थ को सोखने वाले) गॉज का एक पैड होता है, जिसे एक चिपकने वाले पदार्थ की मदद से घाव पर रखा जाता है। ऐसी ड्रैसिंग को घाव पर चिपकाने से पहले उस घाव के आसपास के क्षेत्र को पूरी तरह सुखा दिया जाता है। फिर ड्रैसिंग के सारे किनारों को मजबूती से दबा दिया जाता है।                             

         वैसे प्राथमिक उपचार में चिपकने वाली (एडहेसिव) ड्रैसिंग बहुत सही होती है लेकिन वह हर समय और हर जगह उपलब्ध नहीं होती। इसलिए कई बार प्राथमिक उपचारकर्ता को अन्य प्रकार की ड्रैसिंग, जैसे- रूमाल, कपड़े इत्यादि को भी ड्रैसिंग के रूप में इस्तेमाल करना पड़ता है।

          बाजार में ऐसी ड्रैसिंग भी मिलती है जो कीटाणु मुक्त तो होती है लेकिन चिपकने वाली नहीं। इसमें गॉज की परतों पर रूई की गद्दी लगी होती है और ये एक गोल रोलर पट्टी से बंधी होती है, जिससे वे अपने स्थान से खिसक नहीं पातीं। ये ड्रैसिंग एक सुरक्षात्मक आवरण में सील होती हैं। इस प्रकार की, पहले से तैयार कीटाणु मुक्त ड्रैसिंग, अलग-अलग आकारों में, कैमिस्ट की दुकान पर आसानी से मिल जाती हैं।

          आमतौर पर गंभीर घावों की ड्रैसिंग करने के लिए गॉज का इस्तेमाल किया जाता है। गॉज मुलायम होती है, उसे आसानी से मोड़ा जा सकता है और वह घावों से निकलने वाले रक्त आदि स्रावों को आसानी से सोख लेती है। वैसे तो यह ड्रैसिंग घाव पर चिपक जाती है लेकिन इससे रक्त के थक्के बनने में मदद मिलती है और घाव जल्दी ठीक हो जाता है। जब गॉज का उपयोग ड्रैसिंग की तरह किया जाता है तब उस पर रूई की एक-दो परतें रख दी जाती हैं।

          किसी भी तरह की दुर्घटना होने पर अगर दुर्घटनास्थल पर ड्रैसिंग का बंदोबस्त न हो पाए तो ऐसी स्थिति में प्राथमिक उपचार के दौरान घाव पर किसी भी साफ और मुलायम कपड़े का उपयोग किया जा सकता है। रूमाल ज्यादातर हर व्यक्ति के पास रहता है उसका भी उपयोग घाव पर किया जा सकता है लेकिन गॉज को घाव पर से खिसकने न देने के लिए उस पर पट्टी बांध देनी चाहिए।

घावों की ड्रैसिंग करते समय कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी होती हैं जैसे-

•घाव की ड्रैसिंग करने से पहले अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
•घाव को हाथ से या ड्रैसिंग के किसी ऐसे भाग से न छुएं, जो बाद में घाव के संपर्क में नहीं आएगा।
•घाव या ड्रैसिंग के ऊपर या आसपास खांसे नहीं क्योंकि इससे जीवाणु घाव अथवा ड्रैसिंग में जा सकते हैं।
•घाव को रूई की काफी मात्रा से ढक दें। यदि रूई ड्रैसिंग से कुछ बाहर निकली रहे तो अच्छा है। इन दोनों को घाव पर ठीक प्रकार रखने के लिए ऊपर से पट्टी बांध दें।
•अगर ड्रैसिंग घाव के साथ चिपक जाए तो उसे छुड़ाने की कोशिश न करें बल्कि उस हिस्से को कैंची से काट दें, जो आसानी से अलग हो सकता हो।
पट्टी बांधना (Bandaging)- चोट, मोच, हड्डी टूट जाना आदि की स्थिति में शरीर के क्षतिग्रस्त भागों पर पट्टी बांधने की जरूरत पड़ती है।

निम्नलिखित कारणों से भी पट्टी बांधी जा सकती है-

•घाव या चोट लगे अंग को संक्रमण (Infection) तथा बाहरी धूल आदि के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए पट्टी की जाती है।
•खून को बहने से रोकने के लिए पट्टी की जाती है।
•शरीर के किसी भाग पर दबाव डालकर, वहां रक्त-संचालन की गति को धीमा करने के लिए पट्टी बांधी जाती है।
•शरीर के चोट खाये हुए किसी अंग या किसी भाग की पेशिय़ों तथा रक्तवाहिनी-नसों को सहारा देने के लिए पट्टी की जाती है।
•चोट खाये हुए भाग को हिलने-डुलने से रोकने के लिए पट्टी बांधी जाती है।
•सूजन तथा जोड़ की गति को कम करने के लिए पट्टी की जाती है।
•टूटी हुई या अपने स्थान से हट गई हड्डी को जोड़ने या सही स्थान पर बैठा देने के बाद, उसे दुबारा अपने स्थान से न हटने देने के लिए पट्टी की जाती है।
•अगर घाव की ‘ड्रैसिंग’ की गई हो या उस स्थान पर रूई, कपड़ा अथवा खपच्ची को रखा गया हो, तो उसे अपनी जगह से न हटने देने के लिए पट्टी बांधी जाती है।
•ठंडे या गर्म सेंक के लिए पट्टी बांधी जाती है।
नोट- घाव पर अच्छी तरह पट्टी तब तक नहीं बांधी जा सकती जब तक कि उसका पहले कई बार अभ्यास न कर लिया गया हो। इसलिए पट्टी बांधने की विधियों का अभ्यास पहले ही कर लेना चाहिए, ताकि जरूरत के समय पट्टी को ठीक तरह से बांधा जा सके।

पट्टियों की किस्में

पट्टियों के मुख्य दो भेद हैं-

•मरहम पट्टी।
•सामान्य पट्टी।
मरहम पट्टी- किसी चोट ग्रस्त अंग को ढकने के लिए जिन साधनों का उपयोग किया जाता है, उन्हें ‘मरहम पट्टी’ या ‘ड्रेसिंग’ कहा जाता है।

प्राथमिक उपचार करने के दौरान दो प्रकार की ‘ड्रेसिग’ प्रयोग में लाई जाती है-

•सूखी मरहम पट्टी।
•गीली मरहम पट्टी।
सूखी मरहम पट्टी- इसका उपयोग घाव की सुरक्षा, घाव को भरने में सहायता पहुंचाने तथा घाव पर इच्छित-दबाव डालने के लिए किया जाता है।

          इस प्रकार के घावों के लिए सबसे अधिक भरोसेमंद मरहम-पट्टी कीटाणु-रहित फलालेन का वह टुकड़ा होता है, जो सामान्य पट्टी के साथ सिला रहता है। इस प्रकार की मरहम-पट्टी मोमी कागज में बन्द करके लिफाफे में रखी जाती है। इसे एलोपैथिक की दवाईयां बेचने वाली दुकान से खरीदा जा सकता है। मरहम-पट्टी जिस लिफाफे के अंदर बन्द रहती है, उसके ऊपर उसको प्रयोग करने की विधि भी छपी रहती है।

          यदि उपरोक्त प्रकार की कीटाणु-रहित मरहम-पट्टी उपलब्ध न हो तो घाव को ढकने के लिए साफ फलालेन के कपड़े के एक टुकड़े को भी प्रयोग में लाया जा सकता है। दुर्घटना घटित होने के बाद अगर फलालेन का टुकड़ा भी उपलब्ध न हो तो उस समय साफ धुले हुए रूमाल या बिना छपे साफ तथा सफेद कागज के टुकड़े से भी काम चलाया जा सकता है, लेकिन कपड़े, रूमाल या कागज आदि का प्रयोग सिर्फ उतने ही समय तक के लिए किया जाना चाहिए, जब तक कि कीटाणु-रहित मरहम-पट्टी उपलब्ध न हो सके।

गीली मरहम पट्टी- यह पट्टी भी दो प्रकार की होती है।

•ठंडे सेंक वाली।
•गर्म सेंक वाली।
1- ठंडे सेंक वाली मरहम पट्टी- इस प्रकार की पट्टी को दर्द के समय आराम पहुंचाने, सूजन को कम करने या आन्तरिक रक्तस्राव को रोकने के लिए लिए प्रयोग में लाया जाता है।

          साफ रूमाल या फलालेन के टुकड़े की चार परत बनाकर ठंडे पानी में भिगोकर चोट-ग्रस्त अंग पर रखना ही इसकी विधि है। पट्टी को गीला तथा ठंडा बनाये रखने के लिए उसे समय-समय पर बदलते रहना भी जरूरी है।

2- गर्म सेंक वाली मरहम पट्टी- इस प्रकार की पट्टी का प्रयोग घाव के कारण होने वाले दर्द को कम करने के लिए किया जाता है। साफ रूमाल या फलालेन के टुकड़ों की चार परत बना कर, उसे गर्म पानी में भिगोने के बाद निचोड़ लें। इसके बाद उसे प्रभावित अंग पर रख दें। यह मरहम-पट्टी जितने ज्यादा समय तक गर्म रखी जा सके, उतने समय तक रखनी चाहिए।

जानकारी- प्राथमिक उपचार के दौरान मरहम पट्टी करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ठंडे सेंक वाली मरहम-पट्टी के अलावा गर्म सेंक वाली मरहम-पट्टी को चोट-ग्रस्त अंग पर ही रखा जाए, अगर पट्टी उस स्थान से बाहर निकली रहेगी, तो वह बाहरी त्वचा के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है।।

सामान्य पट्टियां-

सामान्य पट्टियां कई प्रकार की होती है जैसे-

•लम्बी पट्टियां।
•तिकोनी पट्टियां।
•बहुपुच्छी पट्टियां।
•चिपकने वाली पट्टियां।
लपेटी जाने वाली लम्बी पट्टियां- इन पट्टियों को मारकीन के कपड़े द्वारा इच्छित लम्बाई तथा चौड़ाई में तैयार कराया जा सकता है। ऐसी पट्टियों को तैयार कराने के बाद गोलाई में लपेटकर, सुरक्षित रख देना चाहिए, ताकि उनमें बाहरी गन्दगी, धूल, कीटाणु आदि का प्रवेश न हो तथा जरूरत के समय प्रयोग करने में भी सुविधा बनी रहे।

          कैमिस्ट की दुकानों पर भी इस प्रकार की पट्टियां मिलती हैं। ये पट्टियां कीटाणु-रहित जालीदार पतले कपड़े (Gauze) बोरिक-वस्त्र (Boric-Lint) फलालेन आदि से बनी होती है। ये पट्टियां सामान्यतः 5 मीटर लम्बी होती हैं तथा विभिन्न चौड़ाईयों में आती हैं। ये रोल में लिपटी होती हैं, इसलिए इन्हें ‘लुढकी-पट्टी’ भी कहा जाता है।

          इन पट्टियों को मशीन या हाथ से लपेटकर सख्त कर दिया जाता है। जब पट्टी के थोड़े भाग को लपेट दिया हो तथा कुछ भाग खुला हो, तब लिपटे हुए भाग को ‘सिरे वाला हिस्सा’ तथा बाकी भाग को ‘खुला हिस्सा’ कहा जाता है।

          इन पट्टियों का प्रयोग करने से पहले अपने हाथों को साबुन या किसी कीटाणु-नाशक घोल से धोकर साफ कर लेना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पट्टी का प्रयोग करते समय आपकी श्वास-वायु उन पर सीधी न पड़े।

          प्रयोग करने के बाद जो पट्टी बाकी बचे, उसे कागज में लपेटकर, दुबारा इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित रख देना चाहिए।

          अचानक पड़ने वाली जरूरत के समय अगर बाजार में मिलने वाली या तैयार की गई पट्टियां उपलब्ध न हों तो घर के ही किसी बारीक, लेकिन साफ कपड़े को लम्बाई में फाड़कर भी पट्टी तैयार की जा सकती है। घरेलू कपड़ों से पट्टी तैयार करने के लिए सूती धोती या साड़ी का प्रयोग में लाना बहुत अच्छा रहता है। रेशमी या दूसरे किसी प्रकार के कपड़े की पट्टी का प्रयोग ठीक नहीं रहता है।

          धोती या साड़ी में से पट्टी निकालते समय उनके किनारे वाले भाग को छोड़ देना चाहिए।

          सामान्यतः कोहनी या भुजा पर बांधने के लिए ढाई इंच चौड़ी तथा पांच मीटर लम्बी पट्टी काफी रहती है। टांगों पर बांधी जाने वाली पट्टी की चौड़ाई तो ढाई इंच ही काफी रहेगी लेकिन उसकी लम्बाई आठ से दस मीटर होनी चाहिए। अगर एक ही पट्टी इतनी लम्बी न हो तो दो पट्टियों को जोड़कर उन्हें लम्बा बनाया जा सकता है।             

          पेट या छाती पर बांधने के लिए 5 इंच चौड़ी तथा 10-12 मीटर लम्बी पट्टी का होना जरूरी है। अगर लम्बाई के लिए दो पट्टियों को आपस में सुई-धागे से सीने की सुविधा न हो तो उस स्थिति में एक पट्टी के समाप्त हो जाने पर, उसी के ऊपर दूसरी पट्टी को लपेट देने के बाद पट्टी को आगे बांधना शुरू कर देना चाहिए। लेकिन दो पट्टियों को जोड़ने के लिए उनमें गांठ नहीं लगानी चाहिए क्योंकि इससे पीड़ित व्यक्ति को परेशानी हो सकती है तथा गांठ के कारण पट्टी के अपने स्थान से हट जाने की सम्भावना भी अधिक रहती है।

      लटकाने वाली तिकोनी पट्टी- बांह में चोट आ जाने पर उन्हें लटकाने के लिए इन पट्टियों का उपयोग किया जाता है। बांह की हड्डी के टूट जाने पर हाथ को पेट के या छाती के सहारे मुड़ा रखने की जरूरत होने पर या बांह, हथेली, अंगुली, अंगूठा आदि में कोई ऐसा जख्म हो जाने पर जिससे कि उसके नीचे लटकने पर खून अधिक निकलने की सम्भावना हो, तब उसे ऊंची रखने के लिए भी इस पट्टी का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में इस प्रकार की पट्टिय़ों को ‘स्लिंग’ (Sling) कहा जाता है।

         ऐसी पट्टियों को तैयार करने के लिए मजबूत कपड़े का होना जरूरी है, ताकि वह बांह के वजन को अच्छी तरह सहन कर सके। इसलिए इस कार्य के लिए लट्ठा या किसी ऐसे ही दूसरे मजबूत कपड़े को उपयोग में लेना चाहिए।

         38 इंच वाले कपड़े के चौकोर टुकड़ों को दोनों भागों में बांटकर कर्णवत् (Diognal) काटने से दो तिकोनी पट्टियां तैयार हो जाती हैं।        

         जरूरत अनुसार पट्टी को जितनी लटकाना हो, उसी के अनुसार छोटी-बड़ी पट्टी तैयार की जा सकती हैं।

तिकोनी पट्टी को निम्नलिखित तीन अंगों में बांटा जा सकता है-

•आधार (Base) या सबसे लम्बा किनारा।
•(साइड्स) (Sides) या दोनों किनारों के छोर।
इसके तीनों कोनों में से ऊपर वाले सिरों को ‘नोंक (Point) और बाकी कोनों को अन्तिम कोना’ (Ends)  कहा जाता है।

तिकोनी पट्टी का प्रयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

•खुली पट्टी के रूप में- इसे छाती या चौड़े भाग पर एक ही पट्टी के रूप में लगा दिया जाता है।
•चौड़ी पट्टी के रूप में- इस तरीके में पट्टी के सिरे के नीचे ‘बेस’ के बीच में लाकर, उसी दिशा में तह लगाकर बांध देते हैं।
•संकरी पट्टी के रूप में- इस तरीके में पूर्वोक्त चौडी़ पट्टी की एक तह दुबारा उसी दिशा में लगा दी जाती है।
•जरूरत अनुसार चौड़ी या संकरी पट्टी बनाने के लिए तिकोनी पट्टी के दोनों सिरों को मिलाकर आधा कर लिया जाता है।
बहुपुच्छी पट्टियां- इन पट्टियों को फलालेन या साफ कपड़ों द्वारा जरूरत अनुसार तैयार कर लिया जाता है। लेकिन कपड़ा चाहे जैसा sभी हो, वह इतना लम्बा जरूर होना चाहिए कि जिस अंग पर पट्टी लगानी हो, उसके चारों ओर उसे डेढ़ बार लपेटा जा सके तथा चौड़ा इतना हो कि घाव वाले स्थान की पूरी हड्डियों को ढक लें।

          कपड़े के दोनों सिरों को इस प्रकार से काटना चाहिए कि सभी पट्टियां चौड़ाई के बराबर तथा एक दूसरे के प्रति समानान्तर रेखा में कपड़े के बीचों-बीच से निकल जायें और वे सब चौड़ाई के बराबर की हों, लेकिन कपडों का मध्य भाग मुड़ा हुआ रहना चाहिए। बांधे जाने वाले अंग के आधार पर इसकी चौड़ाई 2 से 4 इंच तक रखी जा सकती है।

          बहुपुच्छी पट्टी तैयार करने की दूसरी विधि में कपड़े की पट्टियों को समानान्तर रेखा में इस प्रकार रख दिया जाता है कि हर पट्टी, दूसरी पिछली पास वाली पट्टी के एक तिहाई भाग को अपने नीचे दबाये रहे। इस तरह रखने के बाद पट्टियों को उनके केन्द्र के दोनों ओर कुछ दूर तक सिल दिया जाता है या पट्टियों को केन्द्र के आर-पार वैसे ही कपड़े को रखकर सिल देते हैं।   

          इस पट्टी को करने का मुख्य लाभ यह है कि घाव की जांच तथा मरहम-पट्टी बदलने की क्रिया रोगी को बिना किसी तरह का कष्ट पहुंचाए ही पूरी की जा सकती है।

चिपकाने वाली पट्टियां- ये पट्टियां Leuco Plast Blasto या Plast के रूप में मिलती है। इन्हें कैमिस्ट की दुकान से खरीदा जा सकता है। सामान्य फोड़े, फुन्सी आदि पर इन्हें वैसे ही चिपका दिया जाता है। अगर किसी अंग के घाव आदि पर रूई या गॉज आदि को सही स्थान पर बनाए रखना हो और वहां सामान्य पट्टी न बांधी जा सके तो इनका उपयोग अच्छा रहता है।

उदाहरण- अगर गाल पर कोई छोटी फुंसी पककर फूट गयी हो और उस स्थान पर दवाई लगाने के बाद रूई से ढक दिया गया हो तो उस रूई को सही स्थान पर बनाए रखने की बजाय चिपकने वाली पट्टी का प्रयोग करना अच्छा रहेगा।

पट्टी बांधने के प्रकार- पट्टी तीन प्रकार से बांधी जाती है-

(1) सख्त (Hard),

(2) सम (Uniform)

(3) ढीली (Loose)।

1. सख्त पट्टी बांधना- शरीर के जिन अंगों में अधिक दबाव (Pressure) की जरूरत होती है, वहां सख्त (Hard) पट्टी बांधी जाती है जैसे- नितंब, जंघामूल, बगल, बाहुमूल, सिर आदि मांसल भागों में,

2. सम पट्टी बांधना- पीठ, पार्श्व, गला, पेट, छाती, मुंह, लिंग तथा अंगुली आदि में सम (Uniform) प्रकार की पट्टी बांधी जाती है ताकि वह न अधिक ढीली और न ही अधिक सख्त ही रहे।

3. संक्षेप में जिस पट्टी को कसकर बांधा गया हो लेकिन वह पट्टी अपने कसाव के कारण रोग-ग्रस्त स्थान पर न तो दर्द पैदा करें और न उक्त-संचालन में ही बाधा डाले (अर्थात् जिसके कसाव के कारण अंग नीले न पड़ जाये) उसे ‘सख्त-बन्ध’ जो न ढीला और न कसा हो, उसे ‘सम-बन्ध’ तथा जो ढीला हो उसे ‘शिथिल-बन्ध’ कहा जाता है।

पट्टियों की गांठ बांधना- पट्टियों को लपेटने के बाद उनके आखिरी सिरे पर गांठ लगाई जाती है। गांठ को चोट-ग्रस्त स्थान से कुछ दूरी पर ही बांधना चाहिए, ताकि उसके कारण रोगी को कोई असुविधा न हो।

गांठ दो प्रकार की होती हैं-

1. रीफ गाँठ (Reef knot)

2. ग्रैनी गाँठ (Grainy knot)।      

रीफ गांठ- पट्टी के सिरों को स्थिर रखने के लिए यह ‘गोंठ’ सबसे अच्छी मानी जाती है। रीफ गांठ लगाने के लिए सबसे पहले पट्टी के दोनों सिरों को दोनों हाथों से पकड़ ले। फिर दाएं हाथ के सिरे को बाएं हाथ के सिरे के नीचे से निकालकर ऊपर ले आए तथा इसे चक्कर दे दें। इसके बाद फिर बाएं हाथ के सिरे को नीचे से निकालकर दूसरा चक्कर दे दें। इस प्रकार जो गांठ लगती है, उसे ‘रीफ-गांठ’ कहते हैं। 

     रीफ गांठ लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पीड़ित की त्वचा पर उसका अधिक दबाव न पड़े और न उसके कारण उसे किसी कष्ट का अनुभव हो। अगर गांठ लगाने पर पीड़ित को कष्ट होने की आशंका हो तो उसकी त्वचा के नीचे रूई आदि ही एक नर्म गद्दी भी लगा देनी चाहिए। गांठ लगाने के बाद उसके किनारों को अंदर की ओर मोड़कर अदृश्य कर देना चाहिए।

ग्रेनी-गांठ- यह सामान्य गांठ मानी जाती हैं। यह गांठ अक्सर जल्दी फिसल जाती है तथा शरीर में गढ़ती भी है, इसलिए इसे न बांधना ही ठीक है। अगर किसी विशेष परिस्थिति-वश यही गांठ लगानी पड़े तो इसे चोट वाले स्थान से दूर ही बांधना चाहिए।

          आजकल गांठ को स्थिर रखऩे के लिए गांठ बांधने की बजाय ‘सेफ्टी पिन’ तथा चिपकने वाली ‘टेप’ का प्रयोग किया जाता है।

स्लिंग (Sling)-  ऊपरी-भुजाओं को सहारा देने या आराम पहुंचाने तथा पीड़ित गर्दन, कन्धे और सीने के हिलने-डुलने से भुजाओं पर जो खिंचाव उत्पन्न होता है, उसे कम करने के लिए विभिन्न प्रकार की स्लिंग का प्रयोग किया जाता है। स्लिंग के लिए तिकोनी पट्टी प्रयोग में लायी जाती है।

भुजा लटकाने वाली स्लिंग- पसलियों की हड्डियां टूट जाने, घाव होने, हाथ या कन्धे में चोट लगने या भुजा की हड्डी टूट जाने की स्थिति में पीड़ित अंग पर खपच्चियां बांधी जाती हैं, तब इस स्लिंग को प्रयोग में लाया जाता है।   

          इस स्लिंग को लगाने के लिए सबसे पहले एक तिकोनी पट्टी लेकर पीड़ित व्यक्ति के मुंह की ओर खड़े हो जाएं। फिर पट्टी के एक किनारे को पीड़ित के उस कंधे पर रखें, जिस ओर चोट न लगी हो। इस किनारे का सिरा चोट-ग्रस्त कंधे की ओर रहना चाहिए। फिर उस किनारे को चोट-ग्रस्त भाग की ओर (गर्दन के ऊपर से) के कंधे पर से लाकर सामने लटका देना चाहिए। पट्टी का सिरा चोट-ग्रस्त भुजा की कोहनी तक पहुंच जाना चाहिए तथा उस भुजा के अगले हिस्से को पट्टी की स्लिंग के बिल्कुल मध्य भाग में रख दिया जाना चाहिए। फिर दूसरे किनारे को ऊपर उठाकर भुजा के अगले भाग को पट्टी में रखे तथा पहले सिरे से ‘रीफ गांठ’ लगाकर हंसली की हड्डी के ऊपर बांध दें।

          अब स्लिंग के कोहनी वाले सिरों को आगे की ओर लाकर सेफ्टीपिनों द्वारा स्लिंग के अगले भाग के साथ जोड़ दें। ऐसा करने से पट्टी के खिसकने की संभावना नहीं रहती। पट्टी को इस तरह से लगाना चाहिए कि उसका बेस हाथ की छोटी अंगुली के नाखून की जड़ तक जा पहुंच सके तथा बाकी अंगुलियों के नाखून खुले रहें। स्लिंग लगाने के बाद यह भी देख लेना चाहिए कि कलाई कोहनी की सीध में या उससे कुछ ऊंची रहे।

          बाकी अंगुलियों के झोली के बाहर निकले रहने का लाभ यह होता है कि उनके नाखूनों को देखकर चोट-ग्रस्त हाथ के रक्त परिभ्रमण का अनुमान लगाया जा सकता है।

हाथ की पतली स्लिंग- यह स्लिगं कलाई तथा हाथ को सहारा देने के लिए होती है, लेकिन इसके सहारे कोहनी भी अच्छी तरह से लटकी रहती है। कलाई, कंधे या हाथ में सामान्य चोट लगने पर इसे बांधा जाता है।

लगाने की विधि- स्वस्थ हाथ की ओर वाले कंधे की तरफ चौड़ी पट्टी का एक सिरा लेकर, उसे गर्दन के पीछे से इस तरह घुमाकर लाएं कि वह चोट-ग्रस्त कलाई वाले कंधे के ऊपर आ जाये।

          हाथ को कोहनी से मोड़कर चोट-ग्रस्त कलाई को पट्टी के मध्य-भाग में इस प्रकार रखना चाहिए कि छोटी उंगली का आधा भाग बाहर निकला रहे। इसके बाद लटकने वाले सिरे को पहले वाले सिरे से बांध दें।

कालर-कफ स्लिंग- इस प्रकार की स्लिंग का प्रयोग मुख्यतः हंसली की हड्डी टूट जाने पर कलाई को सहारा देने के लिए किया जाता है।

लगाने की विधि- रोगी की कोहनी को मोड़कर भुजा के अगले हिस्से को सीने पर इस तरह रखें कि उसके हाथ की अंगुलियां दूसरे कन्धे का स्पर्श करती रहें। फिर कलाई को ‘क्लोव-हिच-गांठ’ (Clove-Hitch knot) द्वारा रोगी की हड्डी के ऊपरी भाग में गांठ लगा दें।

          ‘क्लोव-हिच-गांठ’ (Clove-Hitch knot) लगाने के लिए सबसे पहले एक संकरी पट्टी लेकर फंदा बना लें। फिर एक और फंदा बनाकर उसे पहले फंदे के ऊपर रखें। इसके बाद दूसरे फंदे को पहले फंदे के पीछे की ओर घुमाएं। इस प्रकार ‘क्लोव-हिच-गांठ’ (Clove-Hitch knot) लग जाती है।

सेण्टजॉन झोली- हंसली की हड्डी टूट जाने पर हाथ को अच्छी तरह ऊपर उठाये रखने के लिए इस प्रकार की स्लिंग बांधने से पीड़ित व्यक्ति को बहुत आराम मिलता है तथा उसका हाथ भी ऊपर उठा रहता है।

लगाने की विधि- चोट-ग्रस्त ओर के हाथ को छाती पर इस प्रकार रखें कि उसकी हथेली छाती की हड्डी पर रहे तथा अंगुलियां स्वस्थ कंधे की ओर रहें।

          फिर तिकोनी पट्टी को खोलकर उसके बाकी भाग को दाएं हाथ में तथा पट्टी के एक सिरे को बाएं हाथ में पकड़कर, पट्टी को मोड़े हुए हाथ पर इस तरह रखें कि पट्टी का बाकी भाग कोहनी से दूर रहे तथा बाएं हाथ से पकड़ा हुआ सिरा दाएं कंधे पर रहें (यदि चोट बाँयी ओर लगी है, तो)।

          फिर नीचे लटकते हुए सिरे को कोहनी के नीचे से मोड़ते हुए पीठ की ओर ले जाएं तथा स्वस्थ कंधे पर ले जाकर, वहां पहले से रखे हुए सिरे में बांध दें। पट्टी की सिकुड़नों को सावधानी से दूर करके, शीर्ष भाग को कोहनी के सामने की ओर मोड़कर पिन लगा देनी चाहिए।

          यदि दुर्घटना-स्थल पर तिकोनी पट्टियां न मिले तो पीड़ित हिस्से वाली बांह को मोड़कर सावधानी से हथेली को छाती पर रखकर या कमीज की बांहों को सेफ्टीपिनों द्वारा कोट से अटका देना चाहिए.

अन्य प्रकार की स्लिंग- जरूरत अनुसार और भी कई प्रकार की स्लिंग तैयार की जा सकती है जैसे- आस्तीन के कपड़े से सेफ्टीपिन लगाकर चोट के निचले भाग को ऊपर उठाकर पिन लगा देना तथा रोगी के बटनदार कोट अथवा वास्केट में उसका हाथ रख देना। इस प्रकार की पट्टियों को ‘पिन-पट्टी’ कहा जाता है।

          इस प्रकार ही बैल्ट, रूमाल या टाई का प्रयोग भी स्लिंग के रूप में किया जा सकता है।

          आकस्मिक-दुर्घटना के स्थान पर जो भी वस्तु मिले उसी से स्लिंग बनाकर पीड़ित अंग को राहत पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए।

विभिन्न प्रकार की पट्टियां बांधना- जरूरत अनुसार शरीर के किसी भी भाग में पट्टी बांधी जा सकती है। अलग-अलग भागों में पट्टियां बांधने की विधि भी अलग-अलग है।

लम्बी पट्टी का प्रयोग- लम्बी पट्टी का प्रयोग करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

•पट्टी को प्रयोग करने से पहले यह देख लेना चाहिए कि वह बेलनाकार रूप में अच्छी तरह कसकर लपेटी गई हो।
•जिस स्थान पर पट्टी बांधनी हो, वहां उसके खाली छोर के बाहरी भाग को प्रयोग में लेना चाहिए।
•पट्टी का खुला हुआ भाग बाह्य-त्वचा के सम्पर्क में रहना चाहिए।
•पट्टी को नीचे से ऊपर की ओर भीतरी भाग से बाहरी भाग की ओर बांधना चाहिए, लेकिन सीने पर लम्बी पट्टी को नीचे से ऊपर की ओर तथा पेट पर ऊपर से नीचे की ओर बांधना चाहिए।
•सारी लम्बी पट्टियां चक्करदार तरीके से ही बांधी जाती हैं। बांधते समय पट्टी के हर चक्कर को इस प्रकार से डालना चाहिए कि वह पहले चक्कर की लगभग एक तिहाई सतह को ढकता चला जाये।   
•कुछ चक्करदार पट्टियों में पट्टी को हर चक्कर के बाद मोड़ते हुए लपेटा जाता है। ऐसी पट्टियों को बांधते समय हमेशा यह ध्यान में रखना चाहिए कि पट्टी को हमेशा एक ही स्थान पर मोड़ा जाए ये तथा मोड़ वाला स्थान हमेशा अंग के बाहरी भाग की ओर ही रहें। लपेटते समय पट्टी को कसकर पकड़ना चाहिए लेकिन मोड़ते समय कुछ ढ़ीला कर देना चाहिए। मोड़ने के बाद फिर कस लेना चाहिए। मोड़ते समय भी पट्टी को कुछ दूर तक ही खुला रहना चाहिए, अन्यथा वह ठीक से नहीं बंध सकेगी।
•पट्टी को कसते हुए समान रूप में बांधना चाहिए, लेकिन उसे इतना अधिक भी नहीं कसना चाहिए कि रक्त का संचारण ही रुक जाये। बंधी हुई पट्टी पर हाथ फेरने से अगर उसके किनारे मुड़ जाएं तो यह समझना चाहिए कि पट्टी ढीली बंधी है।
•रोगी के शरीर के बाएं तरफ वाले अंग में पट्टी बांधनी हो तो शुरुआत में पट्टी का बेलन बांधने वाले दाएं हाथ में तथा सिरा बाएं हाथ में होना चाहिए। इस प्रकार अगर दाएं अंग पर पट्टी बांधनी हो तो पट्टी का बेलन बाएं हाथ में तथा सिरा दाएं हाथ में रखना चाहिए। बांधते समय पट्टी के बेलन को बाएं हाथ से दाएं हाथ में रखना चाहिए। बांधते समय बेलन को बाएं से दाएं हाथ तथा दाएं से बाएं हाथ में बदलना भी पड़ता है।
•पट्टी बांधते समय पट्टी के बेलन को घुमाने की दिशा हमेशा ही अंग के अंदर की ओर से बाहर की ओर रहनी चाहिए।
•पट्टी को अगर किसी घाव आदि पर बांधना हो तो पहले उस पर दवाई आदि लगाने के बाद ही ऊपर से पट्टी बांधी जाती है।
•लम्बी पट्टी यदि बेलनाकार बनी हुई नहीं हो तो उसे बांधने में बहुत परेशानी हो सकती है और वह ठीक से बंध भी नहीं पाती। बेलनाकार पट्टी को अच्छी तरह फैलाकर बिना मोड़ के सीधा बांधा जा सकता है। लम्बी पट्टी को बेलनाकार बनाने का कार्य हाथ या मशीन द्वारा किया जा सकता है।      
नोट- कुछ दिनों के अभ्यास से पट्टी को हाथ द्वारा भी बेलनाकार लपेटने में निपुणता प्राप्त की जा सकती है।

लम्बी पट्टी बांधने के प्रकार-

•सामान्य घुमाव की पट्टी (Simple Spiral)।
•उल्टे घुमाव की पट्टी (Reversed Spiral)।
•अंग्रेजी के अंक 8 जैसी पट्टी (Figure-of 8 type Spiral)।
•अंक 8 की सुधरित रीति वाली ‘स्पाइका पट्टी’ (Spaica Spiral)।
सामान्य घुमाने की पट्टी- यह पट्टी शरीर के उस भाग पर बांधी जाती है, जिसकी मोटाई एक समान हो जैसे- अंगुली, कलाई, भुजा का अगला हिस्सा या टांग का निचला भाग।

           इस किस्म की पट्टी जिस स्थान पर भी बांधनी हो, पहले उसे सीधा कर लेना चाहिए। इसके बाद पट्टी बांधने की शुरूआत करनी चाहिए। फिर इस लपेट को आगे बढ़ाते जाना चाहिए, ताकि चोट-ग्रस्त भाग ढकता हुआ चला जाए।  

उल्टे घुमाव की पट्टी- इस प्रकार की पट्टी में कई घुमाव (पेच) देने की जरूरत पड़ती है। इन घुमावों में लम्बी पट्टी जब अंग के चारों ओर घूम जाती है, तब वह अपने ऊपर से मुड़ जाती है।

          इस प्रकार की पट्टी उन अंगों पर बांधी जाती है, जिनकी मोटाई एक जैसी नहीं होती या फिर कहीं कम और कहीं ज्यादा होती है।

           ऐसे अंगों पर सामान्य-घुमाव की पट्टी नहीं बांधी जा सकती और यदि बांध भी दी जाती है तो ठहर नही पाती है। इसलिए इन पर उल्टे घुमाव की पट्टी ही बांधनी चाहिए।

अंग्रेजी के अंक ‘आठ’ 8 जैसी पट्टी- इस विधि में पट्टी को रोग-ग्रस्त अंग के चारों ओर एक बार नीचे और फिर ऊपर ले जाते हुए तिरछा बांधा जाता है। इस प्रकार की पट्टी बाँधने से जो फंदे बनते हैं वे अंग्रेजी के अंक 8 जैसे आकार के होते हैं।

          इस प्रकार की पट्टी किसी अंग के जोड़ अथवा जोड़ के समीप वाले स्थान पर बांधी जाती है- जैसे कोहनी तथा घुटने।

          इस विधि में जोड़ के ऊपर तथा निचले भाग तक पट्टी का कपड़ा आ जाना चाहिए। इस प्रकार बांधने से पट्टी के खिसकने की सम्भावना कम रहती है। पट्टी को नीचे से ऊपर ले जाते समय कपड़े की दूरी जहां तक हो सके, अधिक रहनी चाहिए।

स्पाइका पट्टी- यह पट्टी भी अंग्रेजी के अंक आठ जैसी ही होती है, लेकिन इसे ज्यादा सुधरे रूप में अर्थात गेंहू की बाल जैसी रचना में बांधा जाता है।

          कंधे, जांघ, हाथ के अंगूठे तथा पांव के अंगूठे पर दबाव डालने के लिए इस प्रकार की पट्टी बांधी जाती है।

नोट- एक बार प्रयोग में लाई जा चुकी, गन्दी या उलझी हुई पट्टी को उपयोग में नहीं लेना चाहिए।

तिकोनी पट्टी का प्रयोग करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

•इस पूरी पट्टी को मोड़कर पहले पतली पट्टी बना लें। फिर उसे मेज या किसी दूसरी साफ जगह पर बिछाकर तथा दोनों किनारों को पकड़कर, इस प्रकार मोड़े कि दोनों सिरे पट्टी के बीच में एक-दूसरे से मिल जायें। इस विधि से मोड़ी हुई पट्टी के दोनों सिरों को एक बार दुबारा मोड़कर किसी डिब्बे आदि में सुरक्षित बन्द करके रख लें। इस विधि से मोड़कर रखी गई पट्टी को अपनी जेब में रखकर, कहीं बाहर भी आसानी से ले जाया सकता है।
•तिकोनी पट्टी को बांधने से पहले उसकी स्वच्छता एवं कीटाणु-शून्यता के बारे में निश्चित हो लेना चाहिए। गन्दी, मैली या बहुत पुरानी पट्टी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
•तिकोनी पट्टी को बांधने के बाद उसके सिरों में हमेशा ‘रीफ-गांठ’ ही लगानी चाहिए और यह ध्यान भी रखना चाहिए कि गांठ ठीक घाव वाले स्थान के ऊपर न लगाई जाये, अन्यथा वह घाव में चुभेगी और रोगी को कष्ट पहुंचाएगी।
•तिकोनी पट्टी को एकबार प्रयोग में लाने के बाद साबुन से धोकर तथा सुखाकर, दुबारा भी प्रयोग में लाया जा सकता है.
बहुपुच्छी पट्टियों का प्रयोग- बहुपुच्छी पट्टी को जरूरत के अनुसार विभिन्न आकार-प्रकारों में तैयार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए बहुपुच्छी पट्टी पेट पर बांधने के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है।

          इसे तैयार करने के लिए 12 इंच लम्बा तथा इतना ही चौड़ा एक मोटा कपड़ा ले लें। फिर उस कपड़े को दोनों तरफ से पांच-पांच पट्टियों की सिलाई द्वारा जोड़ दें। इनमें से हर पट्टी की लम्बाई 36 इंच से 48 इंच तक तथा चौड़ाई 5 इंच होनी चाहिए। पट्टियों की सिलाई करते समय यह विशेष ध्यान रखना चाहिए कि एक पट्टी के एक तिहाई भाग को छोड़कर, शेष दो तिहाई भाग के ऊपर दूसरी पट्टी की सिलाई पड़े। इसी में दो पट्टियां नीचे की ओर भी जोड़ देनी चाहिए।

          इस प्रकार की पट्टी को बांधने के लिए पीडित के दोनों बगलों में दो व्यक्तियों को खड़ा होना पड़ता है। पट्टी के मध्य भाग को पीड़ित के पेट पर रखने के बाद पहला व्यक्ति उसे अपनी ओर खींच लेता है। इसके साथ ही दूसरा व्यक्ति पट्टी को पीठ की मध्य रेखा से दूर पहुंचा देता है और दूसरा व्यक्ति पीड़ित को अपनी ओर खींचता है तथा पहला व्यक्ति पट्टी को पीठ की मध्य-रेखा से दूर पहुंचा देता है। इसी प्रकार हर बार पट्टी को पेट के ऊपर घुमाया जाता है। अन्त में हर पट्टी को अलग-अलग गांठ लगाकर या सेफ्टीपिन द्वारा बांध दिया जाता है। सबके अन्त में पट्टी के निचले दोनों सिरों को नीचे से घुमाकर, पीठ की ओर बांध दिया जाता है। इस विधि से पट्टी अपने स्थान से खिसकती नहीं है।

•सिर पर बांधने के लिए अंग्रेजी के अक्षर ’L’ टाइप की पट्टी अच्छी रहती है। इस प्रकार की पट्टी तैयार करने के लिए दो इंच चौड़ाई वाली दो इच्छित लम्बाई की पट्टियों को लेकर उनके दोनों सिरों को अंग्रेजी के ’L’ अक्षर की तरह सिलाई कर लिया जाता है।
•मलद्वार तथा लिंग के बीच वाले स्थान पर बांधने के लिए ’T Type’ की पट्टी अच्छी रहती है। इस पट्टी को बीच से सिलाई द्वारा जोड़ लिया जाता है। फिर सिले हुए भाग को पीड़ित की पीठ की मध्य रेखा के पास रखकर, ऊपर वाले सिरे को पेट पर घुमाकर बांधा जाता है तथा नीचे वाले सिरे को मलद्वार के ऊपर से लाकर पेट के सामने बांध दिया जाता हैः-
चिपकने वाली पट्टी का प्रयोग-

•चिपकने वाली पट्टियां अंग्रेजी दवाईयां तैयार करने वाली विभिन्न कम्पनियों द्वारा तैयार की जाती हैं, और उन्हें विभिन्न नामों जैसे- (Leuko Plast, Blasto plast, Flexo Plast, Adhesive Tape आदि) से बेचा जाता है। इन्हें अंग्रेजी दवा बेचने वालों की दुकान से खरीदा जा सकता है। ये पट्टियां अलग-अलग लम्बाइयों तथा चौड़ाईयों में प्राप्त होती हैं। इसलिए जरूरत अनुसार जिस आकार की पट्टी उचित हो, उसे ही लेना चाहिए।
•इस प्रकार की पट्टियों का मुख्य लाभ यह है कि बन्ध न हो तो ढीला हो पाता है और न अपने स्थान से खिसकता ही है। ये पट्टियां बन्ध वाले स्थान को अच्छा सहारा देती हैं।
•इनको प्रयोग करने के फलस्वरूप कभी-कभी त्वचा पर खुजली भी महसूस होती है तथा पट्टी को हटाते समय दर्द भी होता है।
•इस प्रकार की पट्टी को शरीर के उन्हीं स्थानों पर लगाना चाहिए, जहां पर बाल न हों। अगर बालों वाली जगह पर यह पट्टी लगानी हो तो पहले उसे स्थान से बालों को हटा देना चाहिए।       
•इस पट्टी को सूखी त्वचा पर ही लगाना चाहिए और इसको प्रयोग करते समय आयोडीन का घोल नहीं लगाना चाहिए।
•शरीर के जितने भाग पर यह पट्टी लगानी हो उस पर टिंक्चर बैजोइन को0  (Tr. Benzoin Co.) को फाहे में लगाकर सुखा लेना चाहिए। इसके बाद उस स्थान पर पट्टी चिपकानी चाहिए। ऐसा करने से उस स्थान की त्वचा पर फुंसी आदि उठ आने की सम्भावना नहीं रहती।
•पट्टी को निकालते समय उसे एक कोने से धीरे-धीरे छुड़ाना चाहिए ताकि पीड़ित को किसी तरह की परेशानी न हो।
•पट्टी को छुड़ाते समय (Zoff T.J. Cmith and Nephew) अथवा Antichaesin (Aline and Honburys) नामक औषधियों को प्रयोग में लाना उचित रहता है। इन औषधियों को रूई के फाहे में लगाकर पट्टी के मसालें में लगाने से मसाला गल जाता है, जिसके कारण पट्टी सरलता से खुल जाती है।
विभिन्न अंगों पर पट्टी बांधना-

लम्बी पट्टी बांधना- शरीर के विभिन्न अंगों पर लम्बी पट्टियों को निम्नलिखित विधि द्वारा बांधा जा सकता है-

सिर की पट्टी- सिर पर पट्टी बांधने के लिए सबसे पहले 5-6 सेंटीमीटर चौड़ी तथा 7-8 मीटर लम्बी दो पट्टियां ले लें। फिर पट्टियों को दोनों हाथों से पकड़कर उनके खुले सिरो को सुई द्वारा सिलकर आपस में मिला लें अर्थात दोनों पट्टियों को जोड़ लें। अब पीड़ित व्यक्ति को कुर्सी या चारपाई पर बैठाकर उसके पीछे खड़े हो जाएं तथा पट्टी के मध्य भाग को अर्थात् जिसे जोड़कर तैयार किया गया है उस हिस्से को, कपाल के बीच में ठीक भौहों के ऊपर रखें। इसके बाद दोनों पट्टियों को क्रमशः विपरीत दिशा में खोलते हुए कानों के ऊपर से सिर के पीछे ले जाकर मोड़ दें। मोड़ने के बाद पहली पट्टी को सिर के मध्य भाग से सामने की ओर लायें। फिर दूसरी पट्टी को पहले वाली पट्टी के ऊपर माथे के दाईं ओर लाएं। इस क्रम को तब तक चालू रखें, जब तक कि पूरा सिर न ढक जाए। अन्त में सिर के पीछे दोनों पट्टियों को एक-दूसरे पर मोड़कर, दोनों को माथे के मध्य भाग में बांध दें।

कंधे की पट्टी- कंधे पर पट्टी बांधने के लिए 2 इंच चौड़ी तथा 5-6 मीटर लम्बी पट्टी लेकर, उसे कंधे के पास भुजा पर इस प्रकार रखें कि पट्टी का खुला हुआ सिरा भुजा के भीतरी किनारे की ओर रहे।

          अब भुजा पर पट्टी का एक चक्कर लगा दें। इस तरह पट्टी भुजा तथा शरीर के बीच से निकलकर भुजा से ऊपर आ जायेगी। इसके बाद चित्र के अनुसार पट्टी को भुजा के ऊपर कुछ तिरछा ले जाते हुए दूसरी ओर की बगल के नीचे से निकालें। फिर पट्टी को छाती के ऊपर से ले जाते हुए चोट-ग्रस्त कंधे की ओर वाली भुजा के ऊपर ले आये। पट्टी के भुजा पर वापिस आने पर उसे भुजा पर चक्कर देते हुए भुजा तथा शरीर के बीच से निकालें। इस प्रकार पट्टी फिर अपने पहले वाले स्थान पर आ जायेगी। यहां से पट्टी को फिर पूर्वोंक्त प्रकार से चक्कर देते हुए लपेटें। यह ध्यान रखें कि हर चक्कर से पहले वाले चक्कर का एक तिहाई भाग ढकता चला जाये। इसी तरह से लपेटते हुए जब पूरा कंधा ढक जाये, तब आखिरी चक्कर में छाती की ओर से चोट-ग्रस्त कंधे के पास पट्टी के पहुंच जाने पर उसका सिरा वहीं मोड़कर सेफ्टीपिन लगा देनी चाहिए।

लम्बी पट्टी द्वारा 8 के आकार वाली हाथ की स्लिंग- इस प्रकार की पट्टी को बांधने के लिए लगभग 2 इंच चौड़ी तथा 8-10 गज लम्बी पट्टी ले लें।

          इसके बाद पहले चोट-ग्रस्त कोहनी को मोड़कर छाती पर रख दें। फिर पट्टी के खुले हुए सिरे को कोहनी के पास ऊपरी भुजा पर रखें तथा ऊपरी भुजा और अग्रभुजा के ऊपर से ले जाते हुए पट्टी को छाती के दूसरी ओर ले आयें। वहां से पट्टी की ओर घुमाकर, फिर चोट-ग्रस्त कोहनी के पास ले आएं। इसके बाद पट्टी को कोहनी के पास अग्रभुजा के ऊपर से निकाल कर विपरीत ओर के कन्धे के ऊपर लायें। इस प्रकार पट्टी का एक चक्कर पूरा हो जायेगा।

          अब पट्टी को दुबारा छाती के ऊपर से दूसरी ओर ले जाते हुए पहले की तरह बांधें। यह ध्यान रखें कि ऊपरी भुजा पर हर चक्कर पहले वाले चक्कर का एक तिहाई भाग ढकता हुआ कंधे की ओर बढ़ता हुआ रहे। इसी तरह अग्रभुजा पर पट्टी का हर चक्कर पहले वाले चक्कर के एक तिहाई भाग को ढकता हुआ तथा कलाई की ओर बढ़ता हुआ रहना चाहिए।

          जब दोनों ओर की कोहनी अच्छी तरह ढक जाये, जब आखिरी चक्कर में अग्रभुजा के पास पहुंचकर, वहां सेफ्टीपिन लगा देनी चाहिए।

अंगुलियों की पट्टी- अगर पट्टी सिर्फ एक अंगुली में बांधनी हो तो उसके लिए 4.5 फुट लम्बी पट्टी ले लें और अगर दो या अधिक अंगुलियों में पट्टी बांधनी हो तो उसकी लम्बाई को जरूरत अनुसार बढ़ा लें।

          सबसे पहले हथेली को नीचे की ओर करके चोट-ग्रस्त अंगुलियों को फैलाएं। फिर पट्टी को कलाई के पीछे वाले भाग पर इस प्रकार रखें कि उसका खुला हुआ सिरा अंगूठे की ओर रहे। अब पट्टी को कलाई पर दो बार इस तरह लपेटें कि उसके सिरे से कुछ दूरी तक का भाग लटकता रहे। इसके बाद पट्टी को हथेली के पीछे वाले भाग की ओर से अंगूठे तथा चोट-ग्रस्त अंगुली के ऊपर लाकर अंगुली पर एक घुमाव दे दें। फिर एक दूसरा घुमाव देकर पट्टी को अंगुली के नाखून के किनारे तक ले जाएं।

          इस स्थान पर एक चक्कर देने के बाद, फिर सादा चक्कर देते हुए पट्टी को इस सिरे से शुरु कर पूरी अंगुली में लपेट दें। हर चक्कर को इस तरह से लपेटना चाहिए कि वह अपने से पहले वाले चक्कर के एक तिहाई भाग को ढकता चला जाये। जब पूरी अंगुली पर पट्टी लपेटी जा चुके, जब पट्टी को अंगूठे की ओर से छोटी अंगुली की ओर, हाथ के पीछे वाले भाग के ऊपर से कलाई तक लाए और अन्त में पट्टी को कलाई पर एक या दो चक्कर देकर उसके इस सिरे को, पहले से लटकते हुए सिरे के साथ बांध दें।   

          इस विधि से एक अंगुली में पट्टी बांधी जाती है। अगर कई अंगुलियों में एकसाथ पट्टी बांधनी हो तो पहली अंगुली की पट्टी हो जाने पर, जब पट्टी कलाई पर पहुंचे तब कलाई पर, एक पूरा चक्कर देने के बाद फिर पहली अंगुली की ही तरह दूसरी अंगुली पर पट्टी बांधना शुरू करें। इसी क्रम से जितनी भी अंगुलियों में पट्टी बांधनी हो, बांधी जा सकती है।

अंगूठे की स्पाइका पट्टी- अंगूठे पर बांधी जाने वाली पट्टी 2 सेण्टीमीटर चौड़ी तथा 4.5 फुट लम्बी होनी चाहिए।

          सबसे पहले पूर्वोक्त अंगुली की पट्टी की तरह उसे कलाई के पीछे वाले भाग पर रखकर पहले कलाई पर पट्टी के दो चक्कर दें।

          फिर छोटी अंगुली की ओर से पट्टी को हथेली पर से ले जाते हुए अंगूठे के नाखून के पास लाएं और यहाँ पट्टी को एक बार अंगूठे पर लपेट दें। इस समय पट्टी अंगूठे के बाहरी किनारे की ओर होगी। यहां से उसे अंगूठे तथा हथेली के पीछे वाले भाग के ऊपर से ले जाकर छोटी अंगुली की ओर ले जाएं। इसके बाद हथेली पर से घुमाकर अंगूठे के बाहरी किनारे के पास ले आएं।

          यहां से पट्टी को अंगूठे पर इस प्रकार लपेंटे कि वह पिछले चक्कर के एक तिहाई भाग को ढक ले। अंगूठे पर घुमाकर पट्टी जब दुबारा अंगूठे के बाहरी भाग के किनारे पर पहुंचें. तब उसे दुबारा हथेली के पीछे वाले भाग के ऊपर से ले जाकर छोटी अंगुली की ओर लाएं तथा हथेली पर घुमाकर अंगूठे के बाहरी किनारे के पास ले जाएं।

          इस विधि द्वारा जब पूरे अंगूठे पर पट्टी बंध जाए, तब आखिरी चक्कर में कलाई के पास पहुंचने पर पट्टी को कलाई पर दो बार लपेट दें तथा उसके सिरे को सेफ्टीपिन द्वारा कलाई के पीछे वाले भाग पर अटका दें।  

          इस विधि द्वारा ही पांव के अंगूठे की पट्टी भी बांधी जाती है। पांव के अंगूठे के पट्टी को टखने से बांधना शुरु करें तथा वहीं पर उसे समाप्त करके सेफ्टीपिन या गांठ लगा दें।

हथेली की पट्टी- हथेली पर बांधने के लिए 1.5 इंच चौड़ी तथा 8 फुट लम्बी पट्टी लेनी चाहिए।

          पट्टी को हथेली पर इस प्रकार रखें कि उसका खुला सिरा छोटी अंगुली की ओर रहे। फिर उसे छोटी अंगुली की ओर से अंगूठे की ओर ले जाते हुए चारों अंगुलियों पर दो चक्कर लगा दें।

          दूसरे चक्कर के बाद पट्टी को अंगूठे तथा हथेली के बीच से निकालकर हथेली के पीछे वाले भाग के ऊपर से होकर कलाई के पास तक ले जाएं और कलाई के ऊपर पट्टी का एक चक्कर दे दें।

          अंगूठे तथा हथेली के पीछे वाले भाग पर से होते हुए पट्टी को छोटी अंगुली के नाखून तक ले आएं। इसके बाद उसे अंगुलियों के नीचे से घुमाकर छोटी अंगुली की ओर से अंगूठे की ओर ले जाते हुए दुबारा पहले वाली क्रिया दोहराते हुए 4-5 चक्कर लगा दें। यह याद रखें कि हर चक्कर के बीच में चित्र के अनुसार बराबर स्थान छूटे। आखिरी चक्कर के बाद कलाई पर पट्टी के एक या दो चक्कर लगाकर पट्टी को मोड़कर सेफ्टीपिन लगा दें।

अग्रभुजा की पट्टी- अग्रभुजा के लिए लगभग 2 इंच चौड़ी तथा 18 फुट लम्बी पट्टी की जरूरत होती है।

          पट्टी को कलाई पर इस प्रकार रखें कि उसका खुला हुआ सिरा अंगूठे की ओर रहे। फिर उसे अंगूठे की ओर से छोटी अंगुली की ओर ले जाते हुए कलाई पर दो चक्कर दें।

          दूसरे चक्कर के बाद जब पट्टी अंगूठे की ओर पहुंचे, तब उसे अंगूठे तथा हथेली के पीछे वाले भाग की ओर से छोटी अंगुली के किनारे तक पहुंचा दें।

          फिर हथेली पर एक चक्कर लगाकर पट्टी को दुबारा छोटी अंगुली की ओर कलाई के पास ही पहुंचा दें। इसी प्रकार से जरूरत अनुसार एक या दो चक्कर और भी देने चाहिए।

          अन्तिम लपेट के बाद जब पट्टी किनारे के पास पहुंचे तब उसे कलाई पर दो बार लपेटना चाहिए तथा यह ध्यान रखना चाहिए कि दूसरा चक्कर पहले चक्कर के एक तिहाई भाग को चौड़ाई से ढकता रहे।

          जब पट्टी भुजा के पीछे वाले भाग के बीच में पहुंच जाये, तब उसे भुजा के ऊपर कोहनी तक लपेटना चाहिए।   

          कभी-कभी हर चक्कर में पट्टी जब भुजा के पीछे वाले भाग पर होती है, तब उसे मोड़कर भी बांधा जाता है।

          जब पट्टी कोहनी के पास पहुंच जाये, तब उसे दो बार सामान्य तरीके से लपेटकर सेफ्टीपिन लगा देनी चाहिए।

          हथेली अथवा अग्रभुजा के किसी स्थान पर चोट लगने पर ही इस पट्टी को बांधा जाता है। यदि हथेली पर चोट न लगकर सिर्फ अग्रभुजा पर ही लगी हो तो पट्टी को कलाई से शुरु करके सीधे अग्रभुजा पर बांधना चाहिए।

टांग की पट्टी- टखने से लेकर घुटने के बीच टांग में अगर किसी प्रकार की चोट हो तो उसकी पट्टी भी अग्रभुजा की पट्टी की तरह ही बांधी जाती है। टांग में पट्टी बांधते समय, सामने की ओर हर चक्कर में उसे अग्रभुजा की पट्टी की तरह ही मोड़कर बांधा जाता है।

कोहनी की पट्टी- इसके लिए सबसे पहले दो-ढाई इंच चौड़ी तथा 10 फुट लम्बी पट्टी लेनी चाहिए।

          फिर चोट-ग्रस्त कोहनी को समकोण पर मोड़कर, पट्टी को ऊपर भुजा पर कोहनी से कुछ ऊपर, दो बार, लपेटें। पट्टी को इस प्रकार लपेटना आरम्भ करना चाहिए कि उसकी लपेटन बाहर से अंदर की ओर रहे।

          दो चक्कर पूरे हो जाने पर पट्टी को भुजा के अंदर से इस प्रकार घुमाना चाहिए कि वह कोहनी के नीचे अग्रभुजा के बाहरी ओर जा पहुंचे। इसी स्थान पर फिर दो बार चक्कर देने चाहिए। यहां से पट्टी को कोहनी के जोड़ की भीतरी सतह से लाते हुए ऊपरी भुजा की ओर ले जाना चाहिए और वहां एक चक्कर देकर दुबारा कोहनी के जोड़ से पहले की तरह लाकर अग्रभुजा पर पहुंचाना चाहिए। इस बार पट्टी अग्रभुजा के भीतरी ओर जा पहुंचेगी और कोहनी के जोड़ पर अंग्रेजी के अक्षर 8 या हिन्दी के अंक 4 का आकार बनाएगी।

          अब पट्टी के कई चक्कर इसी प्रकार लपेटें ताकि पूरी कोहनी ढक जाये। हर चक्कर अपने पहले चक्कर वाली पट्टी के चौड़ाई वाले भाग को एक तिहाई ढकता रहना चाहिए। जब आखिरी चक्कर ऊपरी भुजा पर पहुंचे तो वह एक चक्कर लगाकर सेफ्टीपिन लगा देनी चाहिए। सबके अन्त में, भुजा को एक पतली पट्टी द्वारा गले से लटका देना चाहिए।

घुटने तथा टखने की पट्टी- घुटने तथा टखने पर बांधने के लिए सबसे पहले 3 इंच चौड़ी तथा 5 मीटर लंबी पट्टी ले लेनी चाहिए।

           फिर पट्टी के खुले सिरे को जोड़ की भीतरी सतह पर रखकर दो-दो चक्कर लगायें। फिर क्रमशः जोड़ के ऊपर-नीचे लटकते हुए अंग्रेजी के 8 की आकृति में पट्टी को लपेटते हुए आगे बढ़ते जाएं।

एड़ी की पट्टी- एड़ी पर बांधने के लिए सबसे पहले इसके लिए 7 सेण्टीमीटर चौड़ी तथा जरूरत अनुसार लम्बी पट्टी ले लें।

          फिर चोट-ग्रस्त टांग को किसी चीज का सहारा देकर जमीन से थोड़ा ऊंचा कर दें, ताकि पट्टी बांधने में सुविधा रहे। फिर पट्टी को टखने के जोड़ से लपेटना शुरु करे और पांव की छोटी अंगुली वाली दिशा में घुमाते हुए एड़ी के ठीक ऊपर ले आयें। इसके बाद उसे सामने टखने के जोड़ पर ले जायें।

          पट्टी के दूसरे चक्कर को पहले चक्कर की तरह इस प्रकार लपेटे कि वह पहले चक्कर के एक तिहाई भाग को एड़ी के ऊपर की ओर ढक दें। फिर पट्टी के तीसरे चक्कर को इस प्रकार लगाएं कि वह एड़ी से नीचे तलुए की ओर रहे तथा पहले चक्कर से एक तिहाई भाग को ढक ले। 

          अब पट्टी को टखने के ऊपर से लाकर टांग का एक चक्कर पूरा कर दें। फिर पट्टी को तलुए के नीचे की ओर ले जाए। इस जगह तलुए के नीचे से घुमाकर, अंगूठे की ओर पहुंचाने पर, एड़ी पर पट्टी को तिरछा घुमा दें तथा टांग के पीछे से निकालकर सामने की ओर ले जाए। फिर पट्टी को अंगूठे की ओर से ले जाए। अब छोटी वाली ओर से एड़ी पर तिरछे चक्कर से लपेटते हुए टांग के पीछे की ओर घुमाते हुए सामने ले आए। इसी विधि से पट्टी को तीन चार बार लपेटें। ताकि टखना और एड़ी पूरी तरह से ढक जाए। आखिरी में टांग पर एक सादा चक्कर लगाकर सेफ्टीपिन लगा दें।

तलुए की पट्टी- तलुए पर पट्टी करने के लिए सबसे पहले इसके लिए 7 सेण्टीमीटर चौड़ी तथा जरूरत अनुसार लम्बी पट्टी ले लें।

          टखने के जोड़ पर पट्टी को इस तरह से रखें कि पट्टी का खुला हुआ सिरा अंगूठे की ओर रहे। फिर पट्टी को टखऩे तथा एड़ी से घुमाते हुए दो बार इस तरह लपेटें कि वह पूरी एड़ी को ढक ले। इसके बाद पट्टी को पांव के ऊपर से ले जाते हुए अंगुली के सिरे के पास ले जाए तथा वहां पांव के ऊपर एक सादा चक्कर देकर, अग्रभुजा तथा टांग की पट्टी की तरह, पट्टी को हर चक्कर पर बीच में मोड़ते हुए पांव के ऊपर लपेटें। इस प्रकार 5-6 चक्करों से ही तलुआ पूरी तरह ढक जाएगा। अब पट्टी को दुबारा सामने की ओर ले जाकर एक बार टखने के ऊपर लपेट कर सेफ्टीपिन लगा दें।

          अगर टांग पर भी पट्टी बांधने की जरूरत हो तो इसी पट्टी को टांग के ऊपर भी बढ़ाया जा सकता है।

छाती की पट्टी- छाती पर दो प्रकार की पट्टियां बांधने की जरूरत पड़ती है-

•सिर्फ एक भाग के लिए
•पूरी छाती के लिए।
          छाती पर बांधने के लिए पट्टी 3 इंच चौड़ी तथा जरूरत अनुसार लंबाई की होनी चाहिए।

          अगर छाती को एक ही तरफ से ढकना हो तो उसके लिए सबसे पहले पट्टी के एक सिरे को घाव के ऊपर रखें। फिर दूसरे सिरे को पहले कमर की बाईं ओर से चारों ओर को लपेटते हुए दाईं छाती के नीचे तथा बाएं कन्धे के ऊपर ले जाकर, दुबारा कमर के बाईं ओर लाकर चारों ओर लपेट दें। इस प्रकार छाती के अच्छी तरह ढक जाने पर पट्टी के दोनों सिरों को सेफ्टीपिन लगाकर बांध दें।

          अगर पूरी छाती को ढकना हो तो सबसे पहले पूर्वोक्त प्रकार की पट्टी लेकर उसे कमर के पीछे दाईं ओर से लपेटना आरम्भ करें। फिर उसे कमर के चारों ओर लपेटकर बाएं कंधे के ऊपर सामने की ओर लगाते हुए, कमर के दाईं ओर ले जाए, फिर कमर के चारों ओर लपेटते हुए उसे दाएं कंधे के ऊपर से लेकर कमर के बाईं ओर ले जाकर दुबारा कमर पर लपेट दें। इस प्रकार जब छाती के दोनों भाग अच्छी तरह ढक जायें, तब उसके सिरे को सेफ्टीपिन द्वारा पट्टी के साथ रोक दें।

          इस प्रकार की पट्टी को लिस्टर की बन्ध (Lister’s Bendage) भी कहा जाता है।

कंधे की स्पाइका पट्टी- यह पट्टी कन्धे पर दबाव डालने के लिए बांधी जाती है। इसके लिए सबसे पहले बाहुमूल से पट्टी बांधना आरम्भ करें। इसके बाद पट्टी के सिरे को बाहुमूल, बगल, कंधे, पीठ तथा दूसरी ओर की बगल के अंदर ही घुमाकर, पीड़ित की छाती पर घुमाते हुए फिर बाहुमूल तक ले आए। इस प्रकार से कई बार घुमाकर बन्ध को पूरा करें और आखिरी में सेफ्टीपिन लगा दें।

हंसली की पट्टी- हंसली की पट्टी करने के लिए सबसे पहले बगल में एक गद्दी रख लें, जो 2 इंच मोटी तथा 4 इंच लम्बी हो। फिर एक 4 इंच चौड़ी पट्टी का छोर लेकर, उसे भुजा में ऊपरी हिस्से के चारों ओर ले जाकर झोला-सा बनाकर सेफ्टीपिन लगा दें।

          अब पीड़ित की पीठ के चारों ओर ले जाकर पट्टी को नीचे बगल की ओर उतारकर छाती के चारों ओर लपेटें तथा चोट-ग्रस्त हिस्से को बगल तक बांधते जाए। फिर पहुंचे को ऊपर उठाकर बगल को सीने के पास तक सटा दें, ताकि गद्दी अच्छी तरह टिकी रहे। इसके बाद कंधे को उठाने तथा पहुंचे का सहारा देने के लिए पट्टी के चारों ओर तथा सुरक्षित कंधे के ऊपर और कोहनी के चारों ओर तीन बार क्रमशः लपेटें। फिर धड़ के चारों ओर तथा भुजा के निचले भाग पर होकर पट्टी को तीन बार ले जाए, ताकि कंधे उठे रहें। आखिरी में पट्टी से दूसरे छोर को भुजा के ऊपर वाले हिस्से के पास ले जाकर सेफ्टीपिन लगा दें।

जबड़े की पट्टी- इसके लिए सबसे पहले 3 इंच चौड़ी पट्टी का 5 फुट लम्बा टुकड़ा लेकर, उसके बीच में एक छेद कर दें। इसके बाद पट्टी को दोनों ओर से इतना फाड़ें कि फाड़ा हुआ हिस्सा छेद से डेढ़ इंच दूर ही रह जाये। इस प्रकार चार सिरे वाली पट्टी तैयार हो जायेगी। इस पट्टी को सही तरीके जबड़े पर बांध लें।

ठोड़ी का बैरेल-बन्ध- इसके लिए दो से ढाई इंच चौड़ी पट्टी ले लें। फिर पट्टी के मध्य भाग को ठोड़ी के नीचे जहां तक सम्भव हो सके, पीछे करके रखें। फिर पट्टी को घुमाते हुए सिरे के ऊपर लायें तथा बांध दें।

          इसके बाद गांठ को खोलकर पट्टी के एक भाग को कपोल के सामने लाए तथा दूसरे भाग को सिर के पीछे कर दें। अंत में सिर के ऊपर एक गांठ लगा दें।

          इस प्रकार की पट्टी को बैरल बन्ध (The Barrel Bendage) कहा जाता है।

कान के पिछले भाग की पट्टी- कान के पिछले भाग के लिए ‘मेस्टोयड बन्ध’ (Mastoid Bandage) बहुत अच्छा रहता है।

          इस पट्टी को चित्रानुसार बाँधना चाहिए।

जांघ पर पट्टी बांधना- इसके लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति को पीठ के बल लिटा दें और उसकी कमर के नीचे एक बर्तन को उलट कर रख दें।

          फिर पट्टी को 2-3 बार जंघा-मूल में घुमाकर उसके ऊपर लाएं तथा कमर के पीछे लाते हुए, दुबारा जांघ से घुमाएं। आखिरी में पट्टी को 2-3 बार पूरी कमर पर घुमाकर सेफ्टीपिन लगा दें।

आंख पर पट्टी बांधना- इसके लिए सबसे पहले जिस आंख की पट्टी बांधनी हो, उस पर साफ रूई रख दें। इसके बाद आसान विधि द्वारा रूई के ऊपर से पट्टी बांध दें।

गले की पट्टी- इसके लिए पहले पट्टी के सिरे का गले पर दो बार घुमाव दें। फिर उसे कंधे पर होकर विपरीत बगल के पास लायें और वहां से घुमाते हुए दूसरी बगल पर ले जाये। फिर, वहां से विपरीत कंधे पर ले जाकर, दुबारा पहले की तरह घुमाव दे। इस प्रकार जब पट्टी समाप्त हो जाये, तब सेफ्टीपिन लगा दें।

मलद्वार तथा लिंग के मध्य भाग की पट्टी- इसके लिए पहले बताई गई विधि द्वारा ‘टी’ टाइप की पट्टी तैयार कर लें। इस पट्टी को बीच में सिलाई करके जोड़ा जाता है।

            फिर सिलाई किये हुए भाग को रोगी की पीठ की मध्य-रेखा के पास रखकर ऊपरी सिरे को पेट पर घुमाकर बांध दें।

            अब दूसरे नीचे वाले सिरे को मलद्वार के ऊपर से लाकर पेट के सामने बांध दें।

           मलद्वार तथा लिंग के नीचे वाले स्थान पर पट्टी बांधने के लिए यह सबसे अच्छी विधि मानी जाती है।

खोपड़ी की पट्टी- खोपड़ी पर पट्टी बांधने के लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति को किसी कुर्सी या चारपाई पर बैठा दें। फिर एक तिकोनी पट्टी को पूरा फैलाकर, उसके पूरे आधार को चौड़ाई से 4 अंगुल मोड़ लें। अब पीड़ित व्यक्ति के सामने खड़े होकर उस पट्टी को सिर पर इस तरह से रखें कि पट्टी का आधार मस्तक पर भौंहों का स्पर्श करता रहे तथा उसका सिरा सिर के पीछे की ओर लटकता रहे। यह याद रहे कि पट्टी के आधार का मुड़ा हुआ किनारा अंदर की ओर रहना चाहिए।

          अब पट्टी के दोनों सिरों को कान के ऊपर से सिर के पीछे ले जाकर, दोनों हाथों के सिरों को परस्पर बदल दें। इसके बाद दोनों सिरों को सामने लाकर मस्तक के बीच में रीफ-गांठ बांध दें।

          पीड़ित व्यक्ति के पीछे की ओर जाकर पट्टी के लटकते हुए सिरे को धीरे से खींचना चाहिए, ताकि पट्टी में पड़ी हुई सिकुड़न आदि निकल जाये। अन्त में इस लटकते हुए भाग को मोड़कर तथा सिर की ओर लाकर सिरे को सेफ्टीपिन द्वारा कस देना चाहिए।

छाती और पीठ की पट्टी- छाती पर पट्टी बांधने के लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति को अपने सामने खड़ा कर देना चाहिए। फिर खुली हुई पट्टी के मध्य-भाग को छाती के चोट-ग्रस्त स्थान पर रखें। फिर पट्टी के सिरे को उसी ओर के कन्धे पर रखें, जिस ओर की छाती का भाग चोट-ग्रस्त हो। अब पट्टी के आधार को 2 इंच मोड़कर तथा घुमाकर पीठ के पीछे की ओर ले जायें। जिस कंधे पर पट्टी का सिरा हो, पीठ के उसी बगल की ओर इस प्रकार बांधे कि पट्टी के लटकने वाले दोनों सिरों में एक सिरा अधिक लम्बा रहे। आखिर में, इस लम्बे सिरे को कंधे पर लटकते हुए पट्टी के सिरे से बांध दें।

          पीठ की पट्टी भी ठीक इसी प्रकार से बांधी जाती है। इसमें अन्तर सिर्फ इतना रहता है कि पट्टी को पीड़ित व्यक्ति की छाती पर न रखकर, पीठ की ओर रखा जाता है।

कंधे की पट्टी- इसके लिए सबसे पहले एक पूरी तिकोनी पट्टी को फैलाकर उसके आधार को चौड़ाई से 4 अंगुल मोड़ दें। फिर चोट-ग्रस्त कंधे की ओर खड़े होकर, उसी ओर के हाथ पर पट्टी को इस प्रकार रखें कि उसके आधार का मध्य भाग कोहनी से थोड़ा ऊपर रहे तथा आधार का मुड़ा हुआ भाग भीतर की ओर रहे। पट्टी का सिरा कन्धे के ऊपर गर्दन के पास रहना चाहिए।

          अब पट्टी के दोनों सिरों को भुजा के नीचे से घुमाकर निकालें। इसी प्रकार भुजा के ऊपर इन सिरों को एकबार और घुमाकर सामने की ओर गांठ बांध दें। इसके बाद हाथ को एक दूसरी पतली पट्टी के द्वारा गले में इस प्रकार लटका दे कि उस पट्टी की गांठ पहले बंधी हुई पट्टी के सिरे के ऊपर रहे। अन्त में पहली पट्टी के सिरे को धीरे से खींचकर उसकी सिकुड़न निकाल दें। इससे पट्टी कस जायेगी। फिर सिरे को दूसरी पट्टी की गांठ के ऊपर से मोड़कर, कंधे पर सेफ्टीपिन द्वारा अटका दें।

कोहनी की पट्टी- इसके लिए सबसे पहले एक पूरी तिकोनी पट्टी को फैलाकर उसके आधार को पहले की तरह ही मोड़ लें। इसके बाद चोट-ग्रस्त कोहनी को समकोण से मोड़कर रखें। पट्टी के आधार को, जिसका मुड़ा हुआ किनारा भीतर की ओर रहें, कोहनी के नीचे भुजा के बाहरी ओर रखें तथा सिरे को कोहनी से ऊपर कंधे की ओर रखें।

          अब पट्टी के दोनों सिरों को भुजा पर से घुमाकर कोहनी के ऊपर ले जायें। वहां इन सिरों को पट्टी के ऊपर से घुमाकर, फिर वहीं सामने की ओर गांठ लगा दें। इस प्रकार कोहनी के भीतरी ओर पट्टी द्वारा अंग्रेजी के अंक 8 जैसा आकार बन जायेगा। फिर पट्टी के सिरे को सावधानी से खीचंकर तथा मोड़कर, कोहनी पर सेफ्टीपिन लगा दें। अन्त में हाथ की पूरी पट्टी द्वारा हाथ को गले से लटका दें।

हाथ की पट्टी- हाथ पर पट्टी करने के लिए सबसे पहले एक पूरी पट्टी को फैलाकर उसके आधार को दूसरी पट्टी की तरह ही मोड़ लें। इस फैली हुई पट्टी के ऊपर चोट-ग्रस्त हथेली को इस प्रकार रखें कि अंगुलियां पट्टी के सिरे की ओर तथा कलाई पर पट्टी के मुड़े हुए आधार से कुछ दूर रहे।

          अब पट्टी को शीर्ष भाग की अंगुलियों के ऊपर से मोड़ते हुए कलाई के ऊपर ले आयें। फिर पट्टी के दोनों सिरों को भी घुमाकर कलाई के ऊपर लायें और वहां एक घुमाव देकर रीफ-गांठ बांध दें।

          अन्त में, शीर्ष को खींचकर तथा गांठ के ऊपर से मोड़कर सेफ्टीपिन लगा दें।

जांघ तथा कूल्हे की पट्टी- इसके लिये दो पट्टियों की जरूरत होती है-

•तिकोनी पट्टी
•संकरी या पतली पट्टी।
          सबसे पहले पतली पट्टी को कमर में बैल्ट की तरह इस प्रकार बांधें कि उसकी गांठ चोट-ग्रस्त कूल्हे की ओर रहें।

        अब तिकोनी पट्टी लेकर उसके आधार को पीड़ित व्यक्ति के घाव के अनुसार मोड़ लें तथा मुड़े हुए किनारे को अंदर की ओर रखते हुए, पट्टी के आधार को चोट-ग्रस्त जांघ पर इस प्रकार रखें कि पट्टी का सिरा कमर के कूल्हे के ऊपर रहे।

          फिर पट्टी के दोनों सिरों को जांघ के चारों ओर घुमाकर बांध दें तथा शीर्ष भाग को कमर से बंधी हुई पट्टी के नीचे सावधानीपूर्वक निकालकर थोड़ा-सा खींचे। फिर उसे नीचे की ओर उलट कर सेफ्टीपिन से अटका दें।

घुटने की पट्टी- इस पट्टी को कोहनी की पट्टी की तरह ही बांधा जाता है। इनमें फर्क सिर्फ इतना ही है कि इसमें घुटने को कोहनी की तरह समकोण से न मोड़कर सिर्फ थोड़ा-सा ही मोड़ा जाता है।

          पट्टी के आधार को 8 सेण्टीमीटर के लगभग मोड़कर, उसके मध्य-भाग को घुटने के ठीक नीचे की ओर तथा शीर्षभाग को जांघ पर रखना चाहिए। फिर पट्टी के दोनों सिरों को घुटने के नीचे-ऊपर घुमाने के बाद जांघ के चारों ओर घुमाएं। इसके बाद दोनों सिरों में रीफ-गांठ लगाकर शीर्षभाग को सावधानी से नीचे की ओर खींच दें।

पांव की पट्टी- इस पट्टी को हथेली की पट्टी की तरह ही बांधा जाता है। इसके लिए सबसे पहले पूरी पट्टी को फैलाकर, उसके आधार को मोड़ लें। फिर चोट-ग्रस्त पांव की पट्टी इस प्रकार रखें कि एड़ी आधार से कुछ दूर तथा अंगुलियां सिरे की ओर रहे। अब सिरे को मोड़कर टखने के ऊपर की ओर ले जाए। फिर पट्टी के दोनों सिरों को पांव के ऊपर से घुमाकर टांग के पीछे की ओर लाए तथा दोनों सिरों को घुमाते हुए टखऩे के सामने की ओर लाकर गांठ बांध दें। अन्त में पट्टी के सिरे को धीरे से खीचकर गांठ के ऊपर मोड़ दें तथा सेफ्टीपिन लगा दें।

बहुपुच्छी पट्टी बांधना- यह पट्टियां एक से ज्यादा पट्टियों को जोड़कर तैयार की जाती है, इसलिए इन्हें जरूरत अनुसार अलग-अलग आकार-प्रकारों में तैयार किया जाता है। इन पट्टियों को डोमैटी, फलालेन या दूसरे साफ कपड़ों द्वारा तैयार किया जाता है।

चिपकने वाली पट्टी बांधना- चिपकने वाली पट्टियों का प्रयोग जरूरत अनुसार पूरी सूझ-बूझ के आधार पर किया जाता है। यहां कुछ चित्रों द्वारा इस पट्टी की प्रयोग-विधि को प्रदर्शित किया जा रहा है, इन्हें देखकर समझ लें।

अंगुली की पट्टी- ढाई इंच चौड़ाई वाली चिकनी पट्टी को अंगुली के दूनी लम्बाई लें। फिर उसे क्रमशः नीचे प्रदर्शित चित्र की तरह चिपकाकर, खोल-सा बना दें और बाकी काट दें।

बाकी अंगों की पट्टी- इन चित्रों के अनुसार चिपकने वाली पट्टी का शरीर के अन्य अंगों पर भी प्रयोग किया जा सकता है।

दुर्घटना तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय प्राथमिक चिकित्सा


FIRST AID AT THE TIME OF ACCIDENTS AND NATURAL DISASTER

          आधुनिक युग में औद्योगिक विस्तार तथा शहरीकरण के कारण दुर्घटनाओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। गाड़ियों तथा मशीनों के संचालन से दुर्घटनाओं की संख्या में और भी वृद्धि हो गई है। कई बार बड़ी दुर्घटनाओं जैसे- रेल, हवाई जहाज तथा बसों के अलावा प्राकृतिक आपदाएं जैसे- आग लग जाना, भूकंप आ जाना, बाढ़ आ जाना, महामारी का प्रकोप या झगड़े में घायलों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।

प्राथमिक सहायता के लिए सुविधाएं जुटाना- इन व्यवस्थाओं के लिए प्राथमिक चिकित्सा के प्रबन्ध बहुत लम्बे चौड़े मापदण्ड पर किए जायेंगे या जिनकी आवश्यकता है जैसा कि-

•स्कूलो, कालेजों तथा सार्वजनिक जगहों पर प्राथमिक सहायता डिब्बा, पट्टियों, खपच्चियों तथा स्ट्रेचरों की जरूरत।
•उपरोक्त जगहों पर सहायता देने के लिए प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षित कर्मचारियों का प्रबन्ध जो व्यक्तियों या घायलों को अस्पताल भेजने से पहले प्राथमिक सहायता दे सकें।
•इन व्यक्तियों का समय-समय पर जीवन बचाने की विधियों, कृत्रिम-श्वास क्रिया तथा सी.पी.आर. का अभ्यास करवाने का प्रबन्ध।
•उपरोक्त जगहों पर नियुक्त व्यक्तियों को नियमानुसार प्रशिक्षण देना।
•अतिरिक्त स्थान बनाने के लिए कमरे या बरामदों को ध्यान में रखना।
•अतिशीघ्र प्रशिक्षित प्राथमिक चिकित्सकों को बुलाना तथा और अधिक व्यक्तियों का प्रबन्ध करना।
•उन व्यक्तियों के लिए भोजन तथा पानी का प्रबन्ध करना।
•कम्बल, चादर, तकिए आदि का इन्तजाम करना।
•गाड़ियों तथा एम्बूलेन्स को इकट्ठा करना।
•खपच्चियों तथा स्ट्रेचर की प्राप्ति तथा साधनकुशलता का प्रयोग करना।
•सम्भव हो तो छोटे-छोटे खानपान का प्रबन्ध।
•घायलों के लिए बिस्तर बनाना तथा उनके कपड़े बदलने का अभ्यास करवाना।

Friday, April 1, 2016

अचानक प्रसव होने की दशा में क्या करें What to do while sudden delivery




          अक्सर होता है कि गर्भ ठहरने के कुछ समय बाद स्त्रियां अपना नाम प्रसव कराने के लिए किसी अस्पताल या प्राइवेट नर्सिंग होम में दर्ज करा लेती है या फिर किसी दाई आदि से बात करके रखती है कि डाक्टर ने इस दिन की बच्चे के जन्म की तारीख दे रखी है। लेकिन कभी ऐसा हो कि अचानक ही प्रसव का दर्द उठने लगे या अस्पताल आदि ले जाने से पहले ही बच्चा पैदा होने लगे तो ऐसी हालत में घबराना नहीं चाहिए बल्कि तसल्ली से काम लेना चाहिए।

ऐसी अवस्था पैदा होने पर निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए और इस प्रकार से करना चाहिए-

•सबसे पहले एक बिस्तर का इंतजाम कर लेना चाहिए जो कि बिल्कुल भी गुदगुदा नहीं होना चाहिए। अगर जल्दबाजी में इस तरह का बिस्तर उपलब्ध न हो पाए तो जमीन पर चटाई आदि बिछा लेनी चाहिए। इस बिस्तर के ऊपर एक मोमजामा डालकर सफेद चादर बिछा लेनी चाहिए।
•इसके बाद गर्भवती स्त्री को पीठ के बल इस बिस्तर पर लेट जाना चाहिए और बिल्कुल भी नहीं घबराना चाहिए।
•गर्भवती स्त्री के पैर इस समय एक-दूसरे से अलग रहेंगें और उसके घुटने मुड़ें रहेंगें। जब प्रसव के दौरान बच्चे का सिर नजर आने लगे तो स्त्री को अपने पैरों को उठा लेना चाहिए। इस समय स्त्री द्वारा जोर लगाना जरूरी है लेकिन इसके लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसा स्वयं ही हो जाता है।
•अगर घर में डिटोल मौजूद हो तो उसे गर्भवती स्त्री के योनिद्वार पर लगा दें। इससे स्त्री को किसी तरह का इंफैक्शन होने की गुंजाइश नहीं रहती।
•बच्चे का जन्म होने के बाद उसे वहीं नीचे बिछाए हुए बिस्तर पर लिटा देना चाहिए। कभी-कभी नाल काफी छोटी होती है। आंवल जब तक बाहर न निकल आए तब तक बच्चे को ज्यादा दूर नहीं रखना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से नाल खिंचने का डर रहता है।
•अक्सर बच्चा पैदा होते ही रोना शुरू कर देता है। उसकी आंख, कान और मुंह तुरंत साफ करने चाहिए।
•बच्चे का सिर स्त्री के सामने नहीं होना चाहिए क्योंकि बच्चा पैदा होने के बाद स्राव तेज हो जाता है। ऐसी हालत में तेज स्राव से बच्चे को बचाना चाहिए।
•प्रसव कराने वाले कमरे में उबलता हुआ पानी तैयार रहना चाहिए और उस पानी में नाल काटने का सामान जैसे- एक कैंची और कई परतों में धागे के दो टुकड़े भी उबलते रहने चाहिए।
•ऊपरी सफाई करने के बाद बच्चे को तुरंत किसी कंबल या तौलिए से ढक देना चाहिए। मां के गर्भ का अंधेरा छोडकर बच्चा बाहर खुले में आ जाता है तो उसे यहां नितांत अलग तापमान का सामना करना पड़ता है। ऐसी हालत में उसकी सुरक्षा का पूरा प्रबंध करना चाहिए।
•अगर डाक्टर या नर्स या दाई आदि प्रसव कराने के लिए उपलब्ध न हो तो किसी चिमटी आदि से खौलते पानी में से धागे को पकड़कर निकाल लेना चाहिए। इसके बाद नाभि से लगभग 8 इंच की दूरी पर नाल को बांध लेना चाहिए। एक बात का ध्यान रखें कि नाल में दो जगह गांठ पड़ेगी, दूसरी गांठ आंवल की दिशा में पड़नी चाहिए। दोनों ही गांठें मजबूत और कसकर बंधी हुई होनी चाहिए।
•इसके बाद उबलते हुए पानी में से कैंची को निकालकर नाल काट लेनी चाहिए। एक बात का ध्यान रखें कि इन सारे कामों को करते समय बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए।
•नाल कटने के बाद बच्चे को अलग किया जा सकता है। इसके बाद आंवल निकलने का इंतजार कीजिए। आंवल को बाहर निकालते समय गंदे हाथों का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे संक्रमण होने का डर रहता है।
•आंवल के निकलने के बाद गर्भाशय ऊपर से गेंद की तरह उभरा हुआ नजर आता है। उसकी मालिश करनी चाहिए।
•इस समय अगर प्रसूता स्त्री की इच्छा किसी गर्म पेय पदार्थ पीने का करती है तो उसे हरीरा आदि पिलाया जा सकता है।

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प्रसव के बाद स्त्रियों के शरीर में हमेशा के लिए बदलाव Permanent changes in women body after delivery


          प्रसव अर्थात बच्चे के जन्म के बाद के बाद स्त्रियों के शरीर में कुछ बदलाव आना स्वाभाविक है। इन बदलावों के लिए अगर स्त्री अपने शरीर की शुरु से ही देखभाल करें तो यह बदलाव इतन कम होते हैं कि कोई स्त्री को देखकर यह बता ही नहीं सकता कि वह पहले कभी गर्भवती रह चुकी है। स्त्रियों के शरीर में छोटे-छोटे बदलाव निम्नलिखित है-

एनीमिया (खून की कमी)-

बच्चे को जन्म देने के बाद स्त्री के शरीर में रक्त की कमी होने के दो प्रमुख कारण होते हैं-

1. प्रसव के समय रक्त का अधिक मात्रा में निकल जाना।

2. स्त्री द्वारा गर्भावस्था में अपने रक्त की जांच न करवाना।

          गर्भावस्था का समय बढ़ने के साथ-साथ स्त्री को सन्तुलित आहार न मिलने के कारण उसके चेहरे पर कभी-कभी झाईंयां भी पड़ जाती हैं। ऐसी अवस्था में स्त्री को प्रसव के 3 महीने बाद तक लौह पदार्थयुक्त भोजन देना बहुत जरूरी होता है। इसके साथ ही उसे कैप्सूल, गोलियां या पीने की दवा भी सेवन के लिए दी जा सकती हैं।

प्रसव के बाद त्वचा में बदलाव-

          जिन स्त्रियों की त्वचा खुश्क होती है उनकी त्वचा बच्चे को जन्म देने के बाद और भी अधिक खुश्क हो जाती है। इसके लिए त्वचा पर किसी अच्छे तेल का प्रयोग करना चाहिए। जिन स्त्रियों का वजन अधिक होता है, उनके शरीर पर पके हुए लाल रंग के घाव दिखाई पड़ने लगते हैं। इस कारण अपने वजन को बढ़ने नहीं देना चाहिए।

वजन-ba

          गर्भावस्था के दौरान लगभग सभी स्त्रियों को वजन पहले से अधिक बढ़ जाता है। इस अवस्था में स्त्रियों का वजन 8 किलो से 12 किलो तक बढ़ता है, जिसमें शरीर पर चर्बी का जमाव, शरीर में अधिक पानी का जमाव, बच्चे, बच्चेदानी और एमनीओटिक द्रव का वजन प्रमुख होता है। प्रसव के बाद भी स्त्री का वजन अधिक बना रहता है। बच्चे के जन्म के 3 महीने तक यदि स्त्री लगातार अपने बच्चे को स्तनपान कराती है तो उसका बढ़ा हुआ वजन पहले जैसा हो जाता है। परन्तु अधिक चिकनाईयुक्त भोजन करने, मेवे आदि के सेवन के कारण स्त्री का वजन बढ़ता चला जाता है। यदि स्त्री व्यायाम आदि नहीं करती हैं तो भी उसका शरीर भारी और भद्दा दिखने लगता है।

          दूसरी ओर कुछ स्त्रियां अपने शरीर के आकार और सुन्दरता को बनाये रखने के लिए बच्चे को दूध पिलाना पसन्द नहीं करती हैं। इसके साथ ही वे भोजन भी कम मात्रा में करती हैं।

शौचक्रिया-

          प्रसव के बाद सामान्य तौर पर स्त्रियों को कब्ज की शिकायत रहती है। भोजन करने के तौर-तरीकों में बदलाव लाकर कब्ज की शिकायत हमेशा के लिए दूर की जा सकती है। कब्ज को दूर करने के लिए ईसबगोल की भूसी या गोलियों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि आप जैसा अपनी आन्तों को देते रहेंगे, आन्ते वैसी ही बन जाएगी। अधिक मात्रा में तरल पदार्थों, हरी सब्जियां, दही, दाले तथा अन्य द्रवों का प्रयोग करने से कब्ज की शिकायत दूर हो जाती हैं।

प्रसव के बाद स्त्रियों के बाल-

          प्रसव के बाद बालों का टूटना, पतला होना, बालों का सफेद होना, बालों का न बढ़ना आम बात है। लेकिन प्रतिदिन बालों की अच्छी तरह से देख-भाल करने से बालों के यह सभी दोष दूर किये जा सकते हैं।

प्रसव के बाद स्त्रियों के दांतों की स्थिति-

          प्रसव के बाद स्त्री के दांतों की चमक में कमी आ जाती है। दांतों में दरारे पड़ना, दांतों में छेद हो जाना, मसूड़ों का सूजना व मवाद का आना आदि स्त्री के लिए प्रमुख समस्याएं होती है। इससे बचने के लिए गर्भावस्था में मसूड़ों की मालिश तथा दांतों को साफ रखना चाहिए। इससे दांतों के विकारों से छुटकारा मिलता है।

वेरीकोस धमनियां-

          स्त्री में गर्भावस्था के समय हर बार वेरीकोस धमनियां बनती है। लगातार गर्भावस्था के कारण यह काफी बढ़ जाती है तथा शरीर में हानि देती हैं। पैरों में वेरीकोस धमनियां ठीक होने में अधिक समय लगता है परन्तु फिर भी गुनगुने नमकीन पानी की सिंकाई, पैरों को सदैव ऊपर करके बैठना, सोते समय पैरों के नीचे तकिया रखकर सोना, शौच क्रिया के लिए अधिक देर तक न बैठना तथा अधिक देर तक खड़े रहने से लाभ होता है। वेरीकोस धमनियों का आपरेशन करके तथा इंजेक्शन द्वारा भी ठीक किया जा सकता है।

प्रसव के बाद शरीर की त्वचा पर दाग-

          गर्भावस्था में स्त्री के स्तन, पेट और जांघों की त्वचा खिंच जाती है। इस खिंचाव के कारण स्त्री के शरीर की त्वचा पर हल्के रंग के दाग दिखाई पड़ने लगते हैं। जिन स्त्रियों का वजन अधिक होता है या जिन स्त्रियों के दो बच्चे होते हैं, उन स्त्रियों के शरीर की त्वचा पर दाग बहुत अधिक मात्रा में दिखाई पड़ते हैं।

          प्रतिदिन व्यायाम और शरीर की मालिश करने से स्त्रियों का वजन नियन्त्रित रहता है। वजन नियन्त्रित होने से त्वचा पर दाग कम मात्रा में होते हैं। त्वचा के दाग-धब्बों को दूर करने के लिए प्लास्टिक सर्जरी भी की जा सकती है।

स्तनों में बदलाव-

          गर्भावस्था में लगातार हार्मोन्स में परिवर्तन के कारण स्त्रियों के स्तन भारी और लम्बे हो जाते हैं। इस अवस्था में अगर स्तनों की ठीक प्रकार से देखभाल न की जाए तो इनका आकार बदल जाता है। स्तन ढीले या लटक जाने पर दुबारा पहले जैसे नहीं हो पाते हैं। इसलिए स्तनों की सही तरीके से देखभाल करनी चाहिए।

          इससे स्तनों के निप्पल का रंग गहरा होना तथा उसके पास की त्वचा पर दाग का रंग हमेशा के लिए ठीक हो जाता है।

पैरों में बदलाव-

          अधिक शारीरिक थकान, देर तक खड़े होकर काम करना, ज्यादा दूरी तक पैदल चलना तथा ढके जूते पहनने के कारण स्त्री के पैर खराब हो जाते हैं। गर्भावस्था में शरीर के लिंगामेंट मांसपेशियों तथा दो हडि्डयों के बीच बांधने वाली नलिकाएं ढीली हो जाती है जिससे पैरों के आकार में बदलाव हो जाता है।

चाल में बदलाव-

          गर्भावस्था में हार्मोन्स के कारण तथा प्रसव के बाद हडि्डयों का आकार बदल जाता है। इस कारण स्त्री की चाल में भी परिवर्तन आ जाता है। इसकी वजह से उसकी कमर तथा कूल्हों में दर्द रहता है। इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए प्रसव के बाद स्त्री को हल्का व्यायाम करने से लाभ मिलता है।

बवासीर-

          गर्भावस्था के समय स्त्रियों में बवासीर उभर आते हैं। वैसे तो यह साधारण बात है। प्रसव के समय यह बवासीर अधिक बढ़ जाते हैं लेकिन प्रसव के बाद धीरे-धीरे खुद ही कम भी हो जाते हैं। बवासीर के कारण स्त्री को उठने-बैठने तथा दैनिक कार्यों में अधिक दर्द तथा कष्ट होता है। यदि प्रसव के बाद भी बवासीर बना रहता है तो इसकी चिकित्सा शीघ्र ही करानी चाहिए। बवासीर की चिकित्सा इन्जैक्शन, ऑपरेशन, लेजर चिकित्सा तथा अधिक साफ-सफाई व दवाईयों द्वारा किया जा सकती है।

मूत्र की शिकायत-

          गर्भावस्था के बाद ज्यादातर स्त्रियों का अपने मूत्र पर से नियन्त्रण खो जाता है। खांसने या छींकने पर भी उनका मूत्र निकल जाता है। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए स्त्रियों को रोजाना हल्के व्यायाम करने चाहिए।

पैरानियम-

          पैरानियम वहीं जगह है जहां प्रसव होने के बाद स्त्री को टांके लगाये जाते हैं। टांकों के दाग, मांसपेशियों का मोटापन और दर्द कुछ दिनों तक बना रहता है। धीरे-धीरे समय बीतने और व्यायाम करने पर टांकों का दर्द समाप्त हो जाता है। इसके बावजूद भी कुछ स्त्रियों को संभोग क्रिया के समय दर्द महसूस होता है। इस प्रकार की समस्या होने पर अपने डॉक्टर को तुरन्त दिखाना चाहिए।

          यदि बच्चे के जन्म के बाद स्त्री को टांके लगते हैं तो टांकों के निशान इसके किनारों पर देखे जा सकते हैं। योनि में बच्चे के जन्म के बाद घाव होने से छाले आदि देखे जा सकते हैं। इन घावों से पानी की तरह एक तरल पदार्थ रिस-रिसकर निकलता रहता है जिससे जलन और सूजन भी होती है।

बच्चेदानी-

          प्रसव के बाद स्त्री की बच्चेदानी भी पहले की तुलना में बड़ी और मोटी हो जाती है। प्रथम मासिक स्राव होने के समय अधिक रक्त निकलता है। इसी तरह लगभग 6 महीने तक अधिक रक्तस्राव तथा अधिक समय तक मासिक स्राव होने के कारण धीरे-धीरे बच्चेदानी का आकार सामान्य हो जाता है। यह हार्मोन्स के बदलाव के कारण होता है। कुछ स्त्रियों को मासिकस्राव के समय कुछ दर्द होता है तथा कुछ स्त्रियों में दर्द नहीं होता है।

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